चीन और पाकिस्तान अपनी बेजां हरकतों से बाज नहीं आए हैं। भारत के प्रति दोनों मुल्कों का छल-कपट और द्वेषपूर्ण भरा रवैया बरकरार है। ऐसे में भारत को ज्यादा सावधान रहने की जरूरत है। सीधा मुकाबला करने की बजाए वह पीठ में छुरा घोंपने की रणनीति अपनाने में माहिर हैं। चीन की चालबाजी और पाकिस्तान के छल-कपट से निपटने के लिए मजबूत रणनीति पर काम करना होगा। दोनों देशों के विदेश मंत्रियों की मुलाकात के बाद जारी संयुक्त बयान में जम्मू-कश्मीर का उल्लेख दूसरे मुल्क के अंदरूनी मामले में टांग अड़ाने जैसा है।
चीन-पाकिस्तान के विदेश मंत्रियों द्वारा जम्मू-कश्मीर पर संयुक्त बयान देने के बाद भारत ने सख्त रूख अपनाने में देरी नहीं की है। भारत ने अपने स्पष्ट रूख से उन्हें अवगत करा दिया है। नई दिल्ली ने इस मुद्दे पर पहले से कहीं ज्यादा सख्त बयान दिया है। गुलाम कश्मीर में गैरकानूनी तरीके से चुनाव कराए जाने और वहां चीन के प्रोजेक्ट पर काम जारी रहने पर आपत्ति जाहिर की गई है। समूचा जम्मू-कश्मीर और लद्दाख क्षेत्र भारत का अभिन्न अंग है। गुलाम कश्मीर पर पाकिस्तान ने और अक्साई चीन पर चीन ने अवैध कब्जा कर रखा है। मोदी सरकार समय-समय पर अखंड भारतवर्ष की बात करती रही है। अखंड भारत में गुलाम कश्मीर और अक्साई चीन भी जुड़ जाता है।
गुलाम कश्मीर में पाकिस्तान ने पिछले दिनों चुनाव कराए थे। चुनाव में प्रधानमंत्री इमरान खान की पार्टी को बहुमत मिला है। इमरान की पार्टी मामूली अंतर से सत्ता पर पहुंचने में कामयाब रही है। चुनाव प्रक्रिया में धांधली होने के भी आरोप लग रहे हैं। इस बीच चीन ने तिब्बत में एकाएक दिलचस्पी दिखानी शुरू कर दी है। चीन के नए फरमान से तिब्बती नागरिकों की बेचैनी बढ़ी हुई है। चीन ने आदेश में कहा है कि तिब्बत के प्रत्येक परिवार से एक सदस्य को पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए) से अनिवार्य रूप से जुड़ना होगा।
बीजिंग अब अपने फायदे के लिए तिब्बती नागरिकों का इस्तेमाल करना चाहता है। तिब्बती नागरिकों को सेना का प्रशिक्षण देने के बाद उन्हें लद्दाख, उत्तराखंड और अरुणाचल प्रदेश के सामने तिब्बत बॉर्डर पर तैनात करने की योजना है। सेना में भर्ती से पहले वहां के नागरिकों का विभिन्न स्तर पर टेस्ट लिया जाएगा। इसके अंतर्गत तिब्बतियों को चीन की मंडारिन भाषा भी सीखनी होगी। उन्हें तिब्बत को पूर्णत: चीन का अभिन्न हिस्सा मानना होगा। तिब्बती नागरिकों को पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए) में लाने के पीछे चीन की मंशा को जानना भी जरूरी है। विभिन्न बिंदुओं को ध्यान में रखकर यह निर्णय लिया गया है। इनमें सबसे पहला और अह्म कारण हिमालय का बेहद सर्द और कठोर मौसम है।
हिमालय के सर्द मौसम का सामना करना हर किसी के लिए संभव नहीं है। पीएलए के सैनिक इस मौसम की मार को सहन नहीं पाते हैं। तिब्बती नागरिक वहां के मूल निवासी होने के कारण इस मौसम के अभ्यस्त होते हैं। वह खुद को मौसम के अनुकूल ढालने में सक्षम हैं। वह दुर्गम से दुर्गम रास्तों पर भी आसानी से चढ़ सकते हैं। जबकि पीएलए के सैनिकों के लिए दुर्गम रास्तों पर सफर करना भी टेड़ी खीर होता है। तिब्बती नागरिकों को पीएलए ज्वाइन कराकर चीन की योजना भारत के खिलाफ स्पेशल ऑपरेशन शुरू कराने की भी है। इस योजना में यदि तिब्बती सैनिक जान गंवाते हैं तो चीन के लिए दुनिया को यह कहना आसान होगा कि तिब्बती अपनी मातृभूमि चीन को बचाने के लिए शहीद हो गए हैं। इससे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चीन के पक्ष में संदेश पहुंच सकेगा। रिपोर्ट के मुताबिक चीन ने फरवरी 2021 से तिब्बती नागरिकों को पीएलए में सम्मिलित करने का काम आरंभ किया है। इस दांव के जरिए बीजिंग तिब्बत पर अपना कब्जा मजबूत करने के अलावा धर्मगुरु दलाई लामा के असर को तिब्बत में कम किए जाने की आकांक्षा पाले है।
चीन को अब भारत से माकूल जबाव मिल रहा है। वह जान चुका है कि नई दिल्ली की विचाराधारा में बदलाव आ रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कुछ दिन पहले दलाई लामा को फोन कर जन्मदिन की बधाई दी थी। बाद में पीएम मोदी ने सोशल मीडिया पर ट्वीट कर इस बात की जानकारी सार्वजनिक की थी। हालाकि इसके पहले ऐसा कभी नहीं हुआ था। नई दिल्ली में हाल ही में अमेरिका के विदेश मंत्री ने बौद्ध धर्मगुरु दलाई लामा के प्रतिनिधि से वार्ता की थी। इन 2 घटनाक्रम ने चीन की टेंशन बढ़ा दी है। इसके अलवा चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के सौ साल पूरे होने के उपलक्ष्य में पिछले दिनों भव्य स्तर पर समारोह आयोजित किया गया था। इस मौके पर विभिन्न देशों ने चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग को बधाई संदेश भेजे थे, मगर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दूरी बनाए रखी। ऐसा कर पीएम मोदी ने चीनी राष्ट्रपति को कड़ा संदेश देने की कोशिश की है।
दरअसल लद्दाख क्षेत्र में चीन ने बेवजह सीमा विवाद पैदा कर रखा है। कई दौर की वार्ता के बावजूद वह मामले को गंभीरता से निपटाने में रूचि नहीं ले रहा है। नतीजन भारत को अपनी नीति में परिवर्तन करने पर मजबूर होना पड़ा है। गुलाम कश्मीर में चीन ने अपने महत्वपूर्ण सड़क प्रोजेक्ट को भारत की कड़ी आपत्ति के बावजूद जारी रखा है। अफगानिस्तान में वह तालिबान के साथ अपनी दोस्ती को गाढ़ा करने के प्रयासों में लगा है। इसके मद्देनजर भारत को भी ठोस रणनीति बनाने पर विवश होना पड़ रहा है। चीन को मालूम है कि लद्दाख क्षेत्र में वह ताकत के बल पर मनमानी नहीं कर सकता है। इसलिए वह अब तिब्बती नागरिकों को सेना में लाकर भारत के खिलाफ हथियार के तौर पर इस्तेमाल करना चाहता है। भारत को चीन के नापाक इरादों से दिन-रात सतर्क रहना होगा।















