लोकप्रिय समाजसेवी का 29 जनवरी को हो गया था निधन
गाजियाबाद। सुप्रसिद्ध समाजसेवी एवं पूर्व विधायक सुरेश बंसल की तेरहवीं 7 फरवरी को है। श्रद्धांजलि एवं प्रसादम कार्यक्रम उनके कविनगर केएम-23 आवास पर दोपहर 12 बजे ये आयोजित किया जाएगा। बंसल के पुत्र दीपक बंसल ने यह जानकारी दी। वरिष्ठ समाजसेवी एवं पूर्व विधायक सुरेश बंसल का गत 29 जनवरी को आकस्मिक निधन हो गया था। कोरोना संक्रमण की चपेट में आने के बाद उन्हें निजी अस्पताल में भर्ती कराया गया था। जहां डॉक्टरों के अथक प्रयास के बावजूद उन्हें बचाया नहीं जा सका।
दीपक बंसल के मुताबिक उनके पिता सुरेश बंसल का त्रयोदशी संस्कार 7 फरवरी को दोपहर 12 बजे से कविनगर आवास पर आयोजित किया जाएगा। उधर, सुरेश बंसल बेशक अब संसार में नहीं हैं, मगर उनसे जुड़ी यादें हमेशा जीवित रहेंगी। यूपी विधान सभा चुनाव के मद्देनजर बसपा ने उन्हें गाजियाबाद सदर सीट से प्रत्याशी भी घोषित कर दिया था। इसके पहले भी वह बसपा के टिकट से गाजियाबाद सीट से चुनाव जीते थे। बंसल बेहद मिलनसार, मृदुभाषी और व्यवहार कुशल थे। इसके चलते कम समय में उन्होंने आमजन के बीच अपनी अच्छी छवि कायम कर ली थी। विधायक भले ही वह बसपा से रहे हों, मगर उन्होंने कभी किसी असहाय व जरूरतमंद को निराश नहीं किया था।
फरियाद किसी जाति-बिरादरी अथवा राजनीतिक विचाराधारा से संबंध रखता है, इससे उन्हें कोई लेना-देना नहीं था। वह प्रत्येक जरूरतमंद व्यक्ति के साथ हमेशा तन, मन व धन से साथ रहे। उनकी यही छवि उन्हें अन्य राजनीतिज्ञों से जुदा करती थी। विपक्ष के नेताओं से भी उनके ताल्लुकात बेहद बेहतर रहे। भाजपा-कांग्रेस व सपा के दिग्गज नेता भी उन्हें पूरा सम्मान देते थे। 2012 में भाजपा प्रत्याशी अतुल गर्ग को हराकर सुरेश बंसल पहली बार गाजियाबाद शहर सीट से विधायक बने थे।
इस चुनाव में बंसल को 64,485 एवं उनके प्रतिद्वंद्वी अतुल गर्ग को 52,364 वोट मिले थे। 2017 के विधान सभा चुनाव में पुन: सुरेश बंसल की टक्कर भाजपा प्रत्याशी अतुल गर्ग से थी, मगर इस बार गर्ग ने उन्हें पराजित कर दिया था। भाजपा प्रत्याशी अतुल गर्ग को 1,24,201 और सुरेश बंसल को 53,696 वोट मिले थे। चुनाव में हार के बावजूद बंसल की लोकप्रियता में कोई कमी नहीं आई।
गाजियाबाद शहर सीट से विधायक निर्वाचित होने से पहले वह दादरी म्युनिसिपल बोर्ड के चेयरमैन भी रहे। पेशे से कारोबारी सुरेश बंसल ने अपना राजनीतिक सफर कांग्रेस से शुरू किया था। वे कांग्रेस की ओर से दादरी म्युनिसिपल बोर्ड के चेयरमैन निर्वाचित हुए थे। बाद में वह गाजियाबाद शहर आ गए। हालांकि उन्हें लोगों का जबर्दस्त समर्थन मिला।
















