“भारत रत्न की बहस में भूले ‘मैथिल कोकिल’: जनसेवक तरुण बोले- विद्यापति को राष्ट्रीय सम्मान मिलना ही सच्ची सांस्कृतिक श्रद्धांजलि

-राजनीतिक और फिल्मी हस्तियों के बीच साहित्यिक महापुरुषों की अनदेखी पर उठे सवाल
-मैथिली-संस्कृत परंपरा को समृद्ध करने वाले विद्यापति के योगदान को राष्ट्रीय स्तर पर मान्यता की मांग
-भारतीय संस्कृति, भक्ति साहित्य और लोकधारा को जीवंत रखने वाले संत-कवि को सम्मान दिलाने की पहल

उदय भूमि संवाददाता
नई दिल्ली। देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न को लेकर एक बार फिर विभिन्न क्षेत्रों के दिग्गजों के नामों की चर्चा तेज हो गई है। फिल्म जगत से लेकर राजनीति तक कई हस्तियों के नाम सामने आ रहे हैं। इसी बीच सामाजिक कार्यकर्ता एवं जनसेवक तरुण ने इस बहस को नई दिशा देते हुए महान कवि विद्यापति को भारत रत्न देने की मांग उठाई है। उनका कहना है कि भारत की सांस्कृतिक आत्मा को शब्द देने वाले संत-कवियों और साहित्यकारों को नजरअंदाज करना हमारी विरासत के साथ अन्याय है। जनसेवक तरुण ने कहा कि आज भारत रत्न की मांग राजनीतिक समीकरणों और लोकप्रियता के आधार पर उठती दिखाई देती है, जबकि देश की भाषाई और सांस्कृतिक विरासत को समृद्ध करने वाले महापुरुषों को उचित सम्मान नहीं मिल पा रहा है। उन्होंने कहा कि मैथिली और संस्कृत के अमर कवि विद्यापति, जिन्हें ‘मैथिल कोकिल’ के नाम से जाना जाता है, ने भारतीय भक्ति साहित्य, संगीत और लोकसंस्कृति को नई दिशा दी। उनके पद आज भी मिथिला, बिहार, बंगाल, ओडिशा और नेपाल के सांस्कृतिक जीवन में गूंजते हैं।

तरुण ने बताया कि विद्यापति केवल कवि ही नहीं थे, बल्कि वे संगीतकार, दार्शनिक, लेखक और दरबारी विद्वान भी थे। उनकी रचनाओं में भक्ति, प्रेम, लोकजीवन और दर्शन का अद्भुत समन्वय मिलता है। विशेष रूप से राधा-कृष्ण भक्ति पर आधारित उनके पदों ने भक्ति आंदोलन को व्यापक जनआंदोलन का रूप देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनकी भाषा सरल, भावपूर्ण और लोकजीवन से जुड़ी हुई थी, जिसने साहित्य को राजदरबार से निकालकर जनमानस तक पहुंचाया। उन्होंने कहा कि विद्यापति की रचनाओं का प्रभाव केवल मैथिली तक सीमित नहीं रहा। बंगाली, ओडिय़ा और असमिया साहित्य पर भी उनकी काव्य परंपरा का गहरा प्रभाव पड़ा। मिथिला की विवाह परंपराओं से लेकर लोकगीतों तक आज भी उनके पद गाए जाते हैं। यह उनकी सांस्कृतिक जीवंतता का प्रमाण है कि सदियों बाद भी उनकी वाणी जनजीवन का हिस्सा बनी हुई है।

जनसेवक तरुण ने यह भी प्रश्न उठाया कि क्या केवल लोकप्रियता या राजनीतिक प्रभाव के आधार पर ही सर्वोच्च सम्मान तय होना चाहिए। उन्होंने कहा कि भारत रत्न ऐसे व्यक्तित्वों को मिलना चाहिए जिन्होंने राष्ट्र की आत्मा को मजबूत किया हो। विद्यापति ने भारतीय संस्कृति, भक्ति और भाषा परंपरा को जिस तरह समृद्ध किया, वह उन्हें इस सम्मान का सशक्त दावेदार बनाता है। उन्होंने सरकार और सांस्कृतिक संस्थाओं से आग्रह किया कि विद्यापति जैसे महापुरुषों के योगदान को राष्ट्रीय विमर्श का हिस्सा बनाया जाए। विद्यालयों और विश्वविद्यालयों में उनके साहित्य का व्यापक अध्ययन हो तथा उनकी जयंती पर राष्ट्रीय स्तर पर कार्यक्रम आयोजित किए जाएं।

तरुण ने कहा कि यदि भारत अपनी सांस्कृतिक जड़ों को सशक्त बनाना चाहता है, तो उसे उन महान विभूतियों को सम्मान देना होगा जिन्होंने भाषा, साहित्य और आध्यात्मिक चेतना के माध्यम से समाज को दिशा दी। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि विद्यापति को भारत रत्न देने की मांग देशभर में सांस्कृतिक जागरण का कारण बनेगी और आने वाली पीढिय़ों को अपनी परंपराओं से जुडऩे की प्रेरणा मिलेगी। उन्होंने अंत में कहा कि भारत की पहचान उसकी सांस्कृतिक विविधता और साहित्यिक विरासत से है, और विद्यापति इस विरासत के उज्ज्वल प्रतीक हैं। ऐसे महापुरुष को सर्वोच्च सम्मान देना केवल सम्मान नहीं, बल्कि भारतीय आत्मा का गौरव पुनर्स्थापित करना होगा।