- थैलेसीमिया के खिलाफ गोरखपुर में शारदाकेयर-हेल्थसिटी का जीवन बचाने वाला अभियान, बीएमटी ओपीडी की भी घोषणा
- राष्ट्रीय चिकित्सक दिवस पर विशेषज्ञों का मंथन, बोन मैरो ट्रांसप्लांट की आधुनिक तकनीकों पर हुई विस्तृत चर्चा
- 30 थैलेसीमिया पीडि़त बच्चों की एचएलए टाइपिंग, 120 रक्त नमूनों से होगी उपयुक्त स्टेम सेल डोनर की पहचान
- गोरखपुर में जल्द शुरू होगी बोन मैरो ट्रांसप्लांट ओपीडी, पूर्वांचल के मरीजों को मिलेगा अपने शहर में विशेषज्ञ उपचार
उदय भूमि संवाददाता
गोरखपुर। राष्ट्रीय चिकित्सक दिवस के अवसर पर शारदाकेयर-हेल्थसिटी, ग्रेटर नोएडा ने पूर्वी उत्तर प्रदेश के मरीजों के लिए एक महत्वपूर्ण स्वास्थ्य पहल करते हुए गोरखपुर में सोमवार को दो दिवसीय चिकित्सा कार्यक्रम का आयोजन किया। इस कार्यक्रम के तहत एक ओर जहां हीमैटोलॉजी एवं बोन मैरो ट्रांसप्लांट (बीएमटी) पर कंटीन्यूइंग मेडिकल एजुकेशन (सीएमई) आयोजित कर चिकित्सकों को नवीनतम चिकित्सा तकनीकों से अवगत कराया गया, वहीं दूसरी ओर थैलेसीमिया से पीड़ित बच्चों के लिए एचएलए टाइपिंग शिविर आयोजित कर जीवनरक्षक बोन मैरो ट्रांसप्लांट की दिशा में ठोस कदम बढ़ाया गया। कार्यक्रम का सबसे बड़ा आकर्षण गोरखपुर में जल्द ही शारदाकेयर-हेल्थसिटी की बोन मैरो ट्रांसप्लांट (बीएमटी) ओपीडी शुरू करने की घोषणा रही, जिससे पूर्वांचल के हजारों मरीजों को विशेषज्ञ उपचार अपने क्षेत्र में ही उपलब्ध हो सकेगा। दो दिवसीय कार्यक्रम के पहले दिन रेडिसन ब्लू, गोरखपुर में आयोजित सीएमई में प्रदेश के वरिष्ठ चिकित्सकों, हीमैटोलॉजिस्ट, मेडिकल विशेषज्ञों और स्वास्थ्य क्षेत्र से जुड़े पेशेवरों ने भाग लिया। इस शैक्षणिक सत्र में रक्त संबंधी गंभीर बीमारियों की पहचान, बोन मैरो ट्रांसप्लांट की आधुनिक तकनीकों, हेमेटो-ऑन्कोलॉजी, जटिल मरीजों के उपचार तथा बहु-विषयक चिकित्सा प्रणाली पर विशेषज्ञों ने विस्तार से विचार साझा किए।
विशेषज्ञों ने कहा कि आधुनिक चिकित्सा विज्ञान में तेजी से हो रहे शोध और तकनीकी विकास का लाभ तभी मरीजों तक पहुंचेगा, जब चिकित्सक लगातार नई जानकारियों और उपचार पद्धतियों से स्वयं को अपडेट रखेंगे। इस दृष्टि से सीएमई जैसे कार्यक्रम चिकित्सा शिक्षा और मरीजों की बेहतर देखभाल के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। कार्यक्रम को संबोधित करते हुए शारदाकेयर-हेल्थसिटी के वाइस चेयरमैन (हीमैटोलॉजी एवं बोन मैरो ट्रांसप्लांट) डॉ. पवन कुमार सिंह ने कहा कि थैलेसीमिया जैसी गंभीर आनुवंशिक बीमारी से पीडि़त बच्चों के लिए बोन मैरो ट्रांसप्लांट ही स्थायी और प्रभावी उपचार है। उन्होंने बताया कि सफल प्रत्यारोपण के लिए सबसे पहला और महत्वपूर्ण चरण एचएलए टाइपिंग है, जिसके माध्यम से मरीज के लिए उपयुक्त स्टेम सेल डोनर की पहचान की जाती है। उन्होंने कहा कि समय पर जांच और सही डोनर मिलने से न केवल बच्चों का जीवन बचाया जा सकता है, बल्कि उन्हें बार-बार रक्त चढ़ाने की पीड़ा से भी मुक्ति मिल सकती है।
उन्होंने यह भी कहा कि शारदाकेयर-हेल्थसिटी का उद्देश्य केवल इलाज उपलब्ध कराना नहीं, बल्कि परिवारों को बीमारी, उपचार विकल्पों और आधुनिक चिकित्सा सुविधाओं के प्रति जागरूक बनाना भी है। कार्यक्रम के दूसरे दिन बीआरडी मेडिकल कॉलेज, गोरखपुर में सीआरसी सेंटर, बीआरडी मेडिकल कॉलेज तथा पूर्वांचल थैलेसीमिया चैरिटेबल ट्रस्ट के सहयोग से एचएलए टाइपिंग शिविर आयोजित किया गया। शिविर में 30 थैलेसीमिया पीडि़त बच्चों की एचएलए टाइपिंग की गई, जबकि मरीजों एवं उनके परिजनों से कुल 120 रक्त नमूने एकत्र किए गए। इन नमूनों के आधार पर विशेषज्ञ मरीजों के लिए उपयुक्त स्टेम सेल डोनर की पहचान करेंगे, जिससे भविष्य में बोन मैरो ट्रांसप्लांट की प्रक्रिया को सफलतापूर्वक पूरा किया जा सके। चिकित्सकों ने बताया कि समय पर डोनर की पहचान होने से उपचार की सफलता की संभावना कई गुना बढ़ जाती है। कार्यक्रम के दौरान शारदाकेयर-हेल्थसिटी ने गोरखपुर में नियमित बोन मैरो ट्रांसप्लांट (बीएमटी) ओपीडी शुरू करने की घोषणा भी की।
इस ओपीडी के माध्यम से थैलेसीमिया, ल्यूकेमिया, एप्लास्टिक एनीमिया, सिकल सेल रोग तथा अन्य गंभीर रक्त विकारों से पीडि़त मरीजों को विशेषज्ञ परामर्श, प्री-ट्रांसप्लांट मूल्यांकन, डोनर काउंसलिंग और फॉलो-अप सेवाएं स्थानीय स्तर पर उपलब्ध कराई जाएंगी। इससे गोरखपुर और पूर्वांचल के मरीजों को इलाज के लिए दिल्ली, लखनऊ अथवा अन्य महानगरों का रुख नहीं करना पड़ेगा, जिससे समय, धन और मानसिक तनाव तीनों में कमी आएगी। शारदा हॉस्पिटल एवं शारदाकेयर-हेल्थसिटी की ग्रुप सीईओ डॉ. कौसर शाह ने कहा कि गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवाओं का उद्देश्य केवल अस्पताल तक सीमित नहीं होना चाहिए। उन्होंने कहा कि संस्थान शिक्षा, जागरूकता और सामुदायिक स्वास्थ्य अभियानों के माध्यम से समाज के अंतिम व्यक्ति तक आधुनिक चिकित्सा सुविधाएं पहुंचाने के लिए प्रतिबद्ध है। एचएलए टाइपिंग शिविर और बीएमटी ओपीडी की शुरुआत इसी सोच का परिणाम है, जिससे थैलेसीमिया से जूझ रहे बच्चों को समय पर विशेषज्ञ उपचार उपलब्ध कराया जा सकेगा।
इस अवसर पर डॉ. पवन कुमार सिंह के साथ गोरखपुर के महापौर डॉ. मंगलेश श्रीवास्तव, मुख्य चिकित्सा अधिकारी डॉ. राजेश झा, बीआरडी मेडिकल कॉलेज के प्राचार्य डॉ. धर्मेंद्र कुमार, एम्स गोरखपुर की निदेशक मेजर जनरल विभा दत्ता (सेवानिवृत्त), आईएमए गोरखपुर के अध्यक्ष डॉ. आशीष शुक्ला, हनुमान प्रसाद पोद्दार स्मारक समिति के संयुक्त सचिव राजेंद्र फोगला तथा पूर्वांचल थैलेसीमिया चैरिटेबल ट्रस्ट के अध्यक्ष संजय गर्ग सहित अनेक वरिष्ठ चिकित्सक, स्वास्थ्य विशेषज्ञ, सामाजिक कार्यकर्ता और चिकित्सा क्षेत्र से जुड़े गणमान्य लोग उपस्थित रहे। डॉ. पवन कुमार सिंह ने बताया कि उन्हें हेमेटो-ऑन्कोलॉजी एवं बोन मैरो ट्रांसप्लांट के क्षेत्र में 15 वर्षों से अधिक का अनुभव है तथा वे एक हजार से अधिक सफल बोन मैरो ट्रांसप्लांट कर चुके हैं। उन्होंने ल्यूकेमिया, लिंफोमा, मल्टीपल मायलोमा, एप्लास्टिक एनीमिया, सिकल सेल रोग, थैलेसीमिया, ऑटोइम्यून बीमारियों तथा जटिल बोन मैरो ट्रांसप्लांट मामलों के उपचार में उल्लेखनीय विशेषज्ञता हासिल की है।
उन्होंने कहा कि आधुनिक तकनीक, समय पर जांच और विशेषज्ञ उपचार के माध्यम से रक्त संबंधी गंभीर बीमारियों से पीडि़त मरीजों को नया जीवन दिया जा सकता है। दो दिवसीय इस आयोजन ने यह स्पष्ट संदेश दिया कि चिकित्सा शिक्षा, सामुदायिक सहभागिता और अत्याधुनिक स्वास्थ्य सेवाओं का समन्वय ही गंभीर बीमारियों से लडऩे का सबसे प्रभावी माध्यम है। गोरखपुर में बीएमटी ओपीडी की शुरुआत और थैलेसीमिया बच्चों के लिए एचएलए टाइपिंग अभियान पूर्वांचल में स्वास्थ्य सेवाओं के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि माना जा रहा है, जिससे आने वाले समय में हजारों मरीजों और उनके परिवारों को नई उम्मीद और बेहतर उपचार का रास्ता मिलेगा।

















