परीक्षाओं का मजाक, नए कदम से उम्मीद

लेखक-तनुजा
शिक्षाविद्
(समाजसेवी एवं राजनीतिक चिंतक हैं। राजनीतिक और सामाजिक विषयों पर लिखते हैं। जनसेविका के रुप में प्रख्यात है।)

देश में पेपर लीक का पैटर्न रोकने के लिए पुराने कानून में संशोधन कर देना क्या पर्याप्त है? क्या प्रभावी कानून से ये बीमारी जड़ से खत्म हो जाएगी? क्या आगे से किसी महत्वपूर्ण परीक्षा का पेपर लीक नहीं होगा? क्या विद्यार्थियों के सपने टूटने का सिलसिला थम जाएगा? अभिभावकों के मन में इस प्रकार के सवाल उठना स्वाभाविक बात है। उत्तर प्रदेश में एक समय ऐसा था जब यूपी बोर्ड की परीक्षाओं में सामूहिक नकल होना आम बात थी। परीक्षा सेंटरों पर नकल माफिया का दबदबा कायम रहता था। परीक्षाओं में खुलेआम नकल होने से यूपी की छवि देशभर में खराब होती थी, मगर मुख्यमंत्री पद पर कल्याण सिंह के आने के बाद नकल माफिया पर ऐसी नकेल कसी गई, जिसे अब तक याद किया जाता है। सवाल यह है कि यदि सरकार में इच्छाशक्ति हो तो बड़ी से बड़ी समस्या का स्थाई समाधान संभव है। वर्तमान में पेपर लीक माफिया पर नकेल कसने के लिए कानून को और अधिक प्रभावी बनाने का प्रयास काबिले तारीफ है। वक्त की नजाकत को देखकर पुराने कानून में संशोधन करना जरूरी था। नए कानून के तहत दोषियों को अधिकतम दस साल की सजा और दस करोड़ रुपए जुर्माने का प्रावधान भविष्य में विद्यार्थियों के हित में मील का पत्थर साबित होगा।

इस कदम से मोदी सरकार की प्रतिबद्धता का भी पता चलता है। देश में पिछले लगभग दो साल के भीतर सौ से ज्यादा छोटी-बड़ी परीक्षाओं के प्रश्नपत्र लीक होने की घटनाएं यह साबित करने को पर्याप्त हैं कि पेपर लीक माफिया का सिंडिकेट कितना मजबूत हो चुका है। यह सिंडिकेट देश के सभी राज्यों में सक्रिय नजर आता है। गैरकानूनी तरीके से पैसा कमाने की लालसा में माफिया यह भूल जाते हैं कि पेपर लीक होने से उन विद्यार्थियों और उनके अभिभावकों पर क्या गुजरती होगी, जिन्होंने परीक्षा में पास होने के लिए दिन-रात मेहनत की थी। निश्चित रूप से पेपर लीक होने का यह गोरखधंधा बंद होना चाहिए। हालांकि महज कानून को कठोर कर देने से काम नहीं चलेगा। कानून को प्रभावी तरीके से लागू करने के लिए सरकार को समय-समय पर मॉनिटरिंग करनी होगी। भविष्य में पेपर लीक का कोई मामला सामने आने पर दोषियों को जल्द से जल्द कड़ी से कड़ी सजा दिलाने के प्रयास तेज करने होंगे।

दरअसल भारत में यह धारणा आम बन चुकी है कि कोई गलत काम करने पर यदि फंस भी गए तो रसूख और दौलत के दम पर बचाव के अनेक रास्ते उपलब्ध हैं। यह धारणा बदलनी होगी। देश एवं समाज विरोधी व्यक्तियों में नए कानून का डर होना जरूरी है। वैसे असल कसौटी अब परीक्षा व्यवस्था है। प्रश्न पत्र सुरक्षा में सेंध महज प्रशासनिक त्रुटि नहीं, लाखों युवाओं के समय, धन और भविष्य पर प्रहार है। पेपर लीक के निरंतर सामने आए प्रकरण बताते हैं कि समस्या व्यक्तियों से बड़ी है, इसलिए नए शिक्षा मंत्री के सामने सबसे पहला काम परीक्षा प्रणाली में छात्रों का भरोसा लौटाना है। प्रश्न पत्र निर्माण से परीक्षा केंद्र तक एंड-टू-एंड सुरक्षा, डिजिटल ट्रैकिंग, एजेंसियों का स्वतंत्र सुरक्षा ऑडिट, जिम्मेदार अधिकारियों की व्यक्तिगत जवाबदेही, समयबद्ध जांच और सार्वजनिक अनुपालन रिपोर्ट आवश्यक हैं। सिर्फ दोषियों की गिरफ्तारी पर्याप्त नहीं, ऐसी व्यवस्था चाहिए, जिसमें प्रश्न पत्र चुराना कठिन और पकड़ा जाना लगभग निश्चित हो।

जंतर मंतर पर कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के आंदोलन को सफलता मिलने के पीछे कहीं न कहीं सरकार की उदासीन कार्यप्रणाली भी कसूरवार है। यदि समय रहते राजनीतिक उत्तरदायित्व स्वीकार किया जाता तो सरकार दबाव में झुकने के बजाय संवेदनशीलता और जवाबदेही के उदाहरण के रूप में प्रस्तुत कर विरोधियों को बैकफुट पर ला सकती थी। देर ने आंदोलन को राष्ट्रीय फलक पर फैलने, नैतिक बल और विपक्ष को संसदीय हथियार दिया। शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा विपक्ष द्वारा संसद में इस मुद्दे को जोरदार ढंग से उठाने और आंदोलन के राजनीतिक संकट बनने की पृष्ठभूमि में आया है। यह इस्तीफा नैतिक उत्तरदायित्व के साथ राजनीतिक क्षति-नियंत्रण भी है। शिक्षा मंत्री के इस्तीफे से मानसून सत्र में सरकार को तत्काल राहत अवश्य मिली और विधायी कामकाज की गुंजाइश बढ़ी है, मगर विपक्ष का दबाव समाप्त नहीं हो सका है।

सरकार की छवि भी इस्तीफे से नहीं, उसके बाद होने वाले सुधारों से बदलेगी। अलबत्ता नए कानून का असर भी दिखाई देना बेहद जरूरी है। परीक्षाओं में सेंध लगाने वाले तत्वों के खिलाफ कठोर कार्रवाई करने के साथ यह आवश्यक ही नहीं, अनिवार्य था कि परीक्षा प्रणाली में आमूलचूल सुधार किए जाएं। सुधार का यह दायरा सिर्फ केंद्र और राज्यों की संस्थाओं की तरफ से आयोजित की जाने वाली प्रतियोगी परीक्षाओं तक ही नहीं सीमित रहना चाहिए। इसका दायरा स्कूली परीक्षाओं तक भी जाना चाहिए, क्योंकि इन परीक्षाओं में नकल एक सामाजिक बुराई बन गई है। नीट में सुधारों के लिए राधाकृष्णन समिति ने जो सुझाव दिए थे, उन सभी का सही प्रकार से पालन नहीं किया जा सका और संभवत: इसी के नतीजे में इस परीक्षा के प्रश्न पत्र बार-बार लीक हुए। सरकार ने पिछले कुछ दिनों में परीक्षा में सुधार के लिए जो अनेक फैसले लिए, उनसे यह प्रतीति हो रही है कि वे कॉकरोच जनता पार्टी के धरना-प्रदर्शन से उपजी परिस्थितियों के बाद लिए गए।