अंकों से आगे: बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य के लिए भावनात्मक रूप से सुरक्षित विद्यालय क्यों जरूरी हैं?

लेखक-रेनू गुप्ता
शिक्षिका, एवं मेंटर टीचर शिक्षा निदेशालय, दिल्ली सरकार (राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली सरकार)

आज के प्रतिस्पर्धी दौर में शिक्षा का मूल्यांकन अक्सर परीक्षा के परिणाम, प्राप्त अंकों, रैंक और प्रतियोगी परीक्षाओं में सफलता के आधार पर किया जाता है। अभिभावकों की चिंता बच्चे के अंक बढ़ाने पर केंद्रित रहती है और विद्यालयों पर बेहतर परिणाम देने का दबाव लगातार बढ़ता जा रहा है। लेकिन इस पूरी दौड़ में एक बेहद महत्वपूर्ण सवाल पीछे छूट जाता है-क्या अच्छे अंक ही बच्चे के उज्ज्वल भविष्य की गारंटी हैं? शायद नहीं। शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य केवल ऐसे विद्यार्थी तैयार करना नहीं है, जो परीक्षा में अच्छे अंक प्राप्त करें, बल्कि ऐसे संवेदनशील, आत्मविश्वासी और संतुलित इंसान तैयार करना है, जो जीवन की कठिन परिस्थितियों का सामना मजबूती से कर सकें। इसके लिए बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य और भावनात्मक बुद्धिमत्ता पर उतना ही ध्यान देना जरूरी है, जितना उनकी पढ़ाई और शैक्षणिक उपलब्धियों पर। भावनात्मक बुद्धिमत्ता यानी भावात्मक बुद्धि का अर्थ केवल अपनी भावनाओं को पहचान लेना नहीं है। इसमें अपनी भावनाओं को समझना और नियंत्रित करना, दूसरों की भावनाओं के प्रति संवेदनशील होना, सकारात्मक संबंध बनाना, सही निर्णय लेना और तनावपूर्ण परिस्थितियों में संतुलित रहना भी शामिल है।

एक बच्चा परीक्षा में शानदार अंक हासिल कर सकता है, लेकिन यदि वह असफलता को स्वीकार नहीं कर पाता, छोटी-सी आलोचना से टूट जाता है, अपनी परेशानी किसी से साझा नहीं कर पाता या मित्रों के साथ स्वस्थ संबंध बनाने में कठिनाई महसूस करता है, तो उसकी शिक्षा कहीं न कहीं अधूरी है। आज बच्चों पर पढ़ाई, प्रतियोगिता, करियर, सोशल मीडिया और साथियों के बीच बेहतर प्रदर्शन करने का दबाव लगातार बढ़ रहा है। ऐसे में विद्यालय को केवल पढ़ाई कराने का स्थान न मानकर ऐसा सुरक्षित वातावरण बनाना होगा, जहां बच्चा अपनी बात खुलकर रख सके। बच्चे अपने दिन का बड़ा हिस्सा विद्यालय में बिताते हैं। ऐसे में स्कूल का वातावरण उनके व्यक्तित्व और मानसिक स्वास्थ्य पर गहरा प्रभाव डालता है। ऐसा विद्यालय जहां गलती करने पर बच्चे का मजाक न उड़ाया जाए, सवाल पूछने पर उसे डांट न मिले और अपनी बात रखने पर उसे गंभीरता से सुना जाए, सीखने के लिए कहीं अधिक प्रभावी वातावरण तैयार करता है।

यदि शिक्षक कक्षा की शुरुआत केवल उपस्थिति दर्ज कराने से न करके एक छोटे से सवाल से करें- ‘आज आप कैसा महसूस कर रहे हैं? ‘-तो यह बच्चों को एक महत्वपूर्ण संदेश देता है कि उनकी भावनाएं भी मायने रखती हैं। हर समस्या का समाधान शिक्षक के पास होना जरूरी नहीं है। लेकिन बच्चे की बात ध्यान से सुनना, उसकी परेशानी को समझना और जरूरत पडऩे पर उसे उचित मार्गदर्शन या विशेषज्ञ सहायता तक पहुंचाना शिक्षक की महत्वपूर्ण भूमिका हो सकती है। हर बच्चा अपनी भावनाओं को शब्दों में व्यक्त नहीं कर पाता। कोई बच्चा अचानक चुप रहने लगता है, कोई बार-बार गुस्सा करता है, कोई पढ़ाई से दूरी बनाने लगता है तो कोई लगातार शरारत करता है। कई बार इन व्यवहारों को केवल अनुशासनहीनता मानकर बच्चे को डांट दिया जाता है।

लेकिन उसके पीछे असफलता का डर, परीक्षा का तनाव, पारिवारिक परिस्थितियां, साथियों का दबाव, आत्मविश्वास की कमी या स्वयं को दूसरों से कम समझने की भावना हो सकती है। इसलिए शिक्षक के लिए यह देखना जितना जरूरी है कि बच्चा क्या कर रहा है, उससे कहीं ज्यादा जरूरी यह समझना है कि वह ऐसा क्यों कर रहा है। व्यवहार के पीछे छिपी भावनाओं को पहचानना ही भावनात्मक रूप से सुरक्षित शिक्षा व्यवस्था की पहली सीढ़ी है। विद्यार्थियों के मानसिक स्वास्थ्य की चर्चा करते समय अक्सर शिक्षक स्वयं इस चर्चा से बाहर रह जाते हैं। जबकि शिक्षक भी लगातार बदलते पाठ्यक्रम, प्रशासनिक जिम्मेदारियों, परीक्षाओं, मूल्यांकन, अभिभावकों की अपेक्षाओं और अलग-अलग सीखने की क्षमताओं वाले विद्यार्थियों के बीच काम करते हैं। लगातार तनाव और भावनात्मक थकान से गुजर रहा शिक्षक लंबे समय तक धैर्यपूर्ण और सकारात्मक कक्षा वातावरण बनाए रखने में कठिनाई महसूस कर सकता है।

इसलिए विद्यार्थी और शिक्षक का मानसिक स्वास्थ्य एक-दूसरे से गहराई से जुड़ा हुआ है। शिक्षक प्रशिक्षण में केवल विषय-वस्तु और नई शिक्षण पद्धतियों को शामिल करना पर्याप्त नहीं है। तनाव प्रबंधन, भावनात्मक जागरूकता, संवाद कौशल, संघर्ष समाधान और आत्म-देखभाल जैसे विषयों पर भी शिक्षकों को नियमित प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए। जब शिक्षक स्वयं मानसिक रूप से स्वस्थ और संतुलित होंगे, तभी वे बच्चों को सुरक्षित और सहयोगात्मक वातावरण दे पाएंगे। बच्चे के भावनात्मक विकास में परिवार की भूमिका विद्यालय से कम नहीं है। घर और स्कूल दोनों जगह मिलने वाले संदेशों में सामंजस्य होना जरूरी है। हर बार कम अंक आने पर बच्चे की तुलना दूसरे बच्चों से करना, लगातार परिणाम का दबाव बनाना या उसकी परेशानी को  ‘छोटी-सी बात’ कहकर टाल देना उसके आत्मविश्वास को कमजोर कर सकता है। इसके विपरीत बच्चे के प्रयास की सराहना करना, उसकी बात बिना तुरंत निर्णय दिए सुनना और असफलता की स्थिति में उसका साथ देना उसे भावनात्मक रूप से मजबूत बनाता है। अभिभावकों को यह समझना होगा कि बच्चे का मूल्य केवल उसके रिपोर्ट कार्ड से तय नहीं होता। एक परीक्षा में कम अंक जीवन की असफलता नहीं हैं।

महत्वपूर्ण यह है कि बच्चा उस अनुभव से क्या सीखता है और अगली चुनौती के लिए खुद को कैसे तैयार करता है। विद्यालयों में मानसिक स्वास्थ्य को लेकर सबसे महत्वपूर्ण कदम नियमित और विश्वसनीय काउंसलिंग व्यवस्था विकसित करना हो सकता है। योग्य काउंसलर या मनोवैज्ञानिक की उपलब्धता बच्चों और शिक्षकों को अपनी समस्याएं साझा करने का सुरक्षित मंच दे सकती है। इसके साथ ही विद्यालयों में मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े विषयों पर खुलकर चर्चा होनी चाहिए। तनाव, चिंता या भावनात्मक परेशानी को कमजोरी समझने की सोच बदलनी होगी। बच्चों को यह विश्वास दिलाना जरूरी है कि मदद मांगना कमजोरी नहीं, बल्कि अपनी स्थिति को बेहतर बनाने की दिशा में उठाया गया समझदारी भरा कदम है। शिक्षा को केवल परीक्षा केंद्रित रखने के बजाय समग्र विकास पर जोर देना समय की जरूरत है।

खेलकूद, योग, कला, संगीत, ध्यान और रचनात्मक गतिविधियां बच्चों को तनाव से बाहर निकलने और अपनी भावनाओं को बेहतर ढंग से व्यक्त करने में मदद कर सकती हैं। विद्यालय में ऐसा वातावरण होना चाहिए जहां बच्चा केवल किताबों से नहीं, बल्कि अनुभवों, गतिविधियों और सामाजिक संबंधों से भी सीख सके। आज समय आ गया है कि हम सफलता की परिभाषा को केवल अंकों और रैंक से आगे ले जाएं। अच्छा विद्यार्थी वह नहीं है जो केवल परीक्षा में सबसे अधिक अंक प्राप्त करे, बल्कि वह भी है जो असफलता के बाद दोबारा प्रयास करना जानता हो, दूसरों की भावनाओं का सम्मान करता हो, अपनी परेशानियों को समझता हो और मुश्किल परिस्थितियों में संतुलन बनाए रखता हो। एक स्वस्थ, संवेदनशील और समर्थ समाज के निर्माण के लिए जरूरी है कि हम बच्चों को केवल  ‘सफल’ नहीं, बल्कि मानसिक और भावनात्मक रूप से  ‘सशक्त’ बनाएं। इसके लिए परिवार, विद्यालय, शिक्षक और समाज-सभी को मिलकर जिम्मेदारी निभानी होगी। क्योंकि शिक्षा का अंतिम लक्ष्य केवल अच्छे अंक वाली रिपोर्ट तैयार करना नहीं, बल्कि ऐसे इंसान तैयार करना है जो जीवन की परीक्षा में भी मजबूती से खड़े रह सकें।