-उपहार सिनेमा त्रासदी को भूल गया सिनेमा, 29 साल बाद भी नहीं मिला सम्मान
-तरुण मिश्र का सवाल-क्या करोड़ों की कमाई में इंसानियत की कोई हिस्सेदारी नहीं?
-देशभक्ति के शोर में दब गई 59 बेगुनाहों की चीखें
उदय भूमि संवाददाता
नई दिल्ली। 13 जून 1997 का दिन भारतीय सिनेमा के इतिहास का सबसे काला अध्याय बन गया था। साउथ दिल्ली के उपहार सिनेमा में लगी आग और दम घुटने से 59 लोगों की मौत ने पूरे देश को झकझोर दिया था। यह हादसा उस वक्त हुआ, जब देशभक्ति से ओत-प्रोत फिल्म बॉर्डर देखने के लिए लोग सिनेमाघरों में उमड़े थे। 29 साल बीत चुके हैं, लेकिन आज भी उपहार सिनेमा त्रासदी के घाव हरे हैं। अब जब बॉर्डर-2 सिनेमाघरों में आई है और देशभक्ति के नाम पर रिकॉर्ड तोड़ कमाई कर रही है, तब एक बार फिर वही सवाल उठ खड़ा हुआ है-क्या सिनेमा सिर्फ मुनाफे का जरिया बनकर रह गया है? गणतंत्र दिवस सप्ताह में रिलीज हुई बॉर्डर-2 ने अब तक देश में 235 करोड़ रुपये से अधिक और वर्ल्डवाइड 322 करोड़ रुपये की कमाई कर ली है।
दर्शकों का जोश वही है, तालियां वही हैं, लेकिन संवेदना कहीं खो गई है। फिल्म के शुरुआती क्रेडिट में सनी देओल द्वारा अपने पिता, दिवंगत अभिनेता धर्मेंद्र देओल को समर्पण जरूर दिखाई देता है, लेकिन उपहार सिनेमा त्रासदी में मारे गए 59 लोगों के लिए एक पंक्ति तक नहीं लिखी गई। इसी मुद्दे को लेकर सामाजिक कार्यकर्ता जनसेवक तरुण मिश्र ने तीखा सवाल उठाया है। जनसेवक तरुण मिश्र ने कहा कि सिनेमा समाज का आईना होता है। जब बॉर्डर-2 जैसी फिल्म देशभक्ति का पाठ पढ़ाती है, तो क्या उसकी जिम्मेदारी नहीं बनती कि वह इतिहास के सबसे दर्दनाक सिनेमाघर हादसे को भी याद करे? अगर क्रेडिट में उपहार सिनेमा के मृतकों को श्रद्धांजलि दी जाती, तो यह मानवता के पक्ष में एक बड़ा संदेश होता। उन्होंने कहा कि सवाल सिर्फ श्रद्धांजलि का नहीं, बल्कि संवेदनशीलता का है। आज जब फिल्म सैकड़ों करोड़ कमा रही है, तो क्या सनी देओल या निर्माता पीडि़त परिवारों की मदद के बारे में सोचेंगे? देशभक्ति सिर्फ पर्दे पर नहीं, ज़मीन पर भी दिखनी चाहिए।
तरुण मिश्र का कहना है कि उपहार सिनेमा त्रासदी के पीडि़त परिवार आज भी हर साल श्रद्धांजलि सभाएं आयोजित करते हैं, लेकिन फिल्मी दुनिया ने उन्हें भुला दिया है। यह विडंबना है कि जिस फिल्म ने भीड़ खींची, उसी भीड़ में मारे गए लोग आज सिनेमा की याददाश्त से गायब हैं। बॉर्डर-2 भले ही बॉक्स ऑफिस पर मजबूत साबित हो रही हो, लेकिन उपहार सिनेमा त्रासदी की अनदेखी ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या यह फिल्म बॉर्डर पर तो मजबूत है, मगर इंसानियत के मोर्चे पर कमजोर पड़ गई है।
















