-सीमेंट, सरिया और मजदूरी की बढ़ती कीमतों से रियल एस्टेट सेक्टर बेहाल: प्रदीप गुप्ता
-सीमेंट, सरिया और डीजल की बढ़ती कीमतों ने निर्माण लागत को पहुंचाया रिकॉर्ड स्तर पर
-दिल्ली-एनसीआर में लाखों आवासीय परियोजनाएं प्रभावित, घटती खरीद क्षमता बनी बड़ी चिंता
उदय भूमि संवाददाता
दिल्ली। देशभर में लगातार बढ़ती महंगाई का असर अब रियल एस्टेट कारोबार पर साफ दिखाई देने लगा है। चुनावी माहौल समाप्त होने के बाद निर्माण सामग्री की बढ़ती कीमतों और श्रमिक खर्च में भारी बढ़ोतरी ने भवन निर्माण क्षेत्र की रफ्तार को धीमा कर दिया है। मकान बनवाना हो या नया घर खरीदना, हर स्तर पर लोगों की जेब पर बोझ बढ़ता जा रहा है। ऐसे में बिल्डर, निवेशक और आम खरीदार सभी आर्थिक दबाव महसूस कर रहे हैं। व्यापार एकता समिति संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष प्रदीप गुप्ता ने कहा कि वर्तमान समय में भवन निर्माण क्षेत्र सबसे कठिन दौर से गुजर रहा है। निर्माण लागत लगातार बढ़ रही है, जबकि लोगों की खरीद क्षमता घटती जा रही है। इससे मांग और आपूर्ति के बीच बड़ा अंतर पैदा हो गया है, जो पूरे क्षेत्र के लिए गंभीर चिंता का विषय बनता जा रहा है।
उन्होंने कहा कि पिछले एक वर्ष में निर्माण सामग्री की कीमतों में भारी उछाल आया है। सीमेंट, जो पहले लगभग 400 रुपये प्रति बोरी मिलता था, अब 450 रुपये से अधिक में बिक रहा है। वहीं सरिया की कीमत 65 हजार रुपये प्रति टन से बढ़कर 78 हजार रुपये प्रति टन के पार पहुंच गई है।
डीजल के दाम बढऩे का असर परिवहन खर्च पर भी पड़ा है, जिससे रेत, गिट्टी और ईंट की ढुलाई करीब 25 प्रतिशत तक महंगी हो गई है। निर्माण लागत में बढ़ोतरी का सीधा असर बिल्डरों पर पड़ रहा है। परियोजनाओं की लागत बढऩे से कई बिल्डर आर्थिक दबाव में आ गए हैं। प्रदीप गुप्ता ने कहा कि बिल्डरों के सामने सबसे बड़ी समस्या यह है कि यदि वे मकानों की कीमत बढ़ाते हैं तो खरीदार पीछे हट जाते हैं और यदि कीमत नहीं बढ़ाते तो परियोजना लागत और बैंक की मासिक किस्तों का दबाव बढ़ता जाता है। उन्होंने बताया कि श्रमिकों की मजदूरी में भी तेजी से वृद्धि हुई है। पहले जो कारीगर 500 रुपये प्रतिदिन में काम करता था, वह अब 650 रुपये या उससे अधिक की मांग कर रहा है। मजदूरी बढऩे से निर्माण कार्यों की कुल लागत और अधिक बढ़ गई है। इसका सबसे ज्यादा असर छोटे और मध्यम स्तर के बिल्डरों पर दिखाई दे रहा है। दिल्ली-एनसीआर क्षेत्र की स्थिति को लेकर भी चिंता जताई गई।
एक अनुमान के अनुसार इस क्षेत्र में करीब 1.9 लाख आवासीय इकाइयां अभी भी देरी का सामना कर रही हैं। कई परियोजनाएं समय पर पूरी नहीं हो पा रही हैं, जिससे खरीदारों में असंतोष बढ़ रहा है। वहीं दूसरी ओर बिल्डरों पर बैंक ऋण और निवेशकों का दबाव लगातार बढ़ता जा रहा है। दुनिया की जानी-मानी भवन निर्माण सलाहकार कंपनी अनारॉक के हालिया आंकड़ों का हवाला देते हुए प्रदीप गुप्ता ने बताया कि देश के सात बड़े शहरों में किफायती आवासों की बिक्री वर्ष 2025 में लगभग 20 प्रतिशत तक गिर गई है। इसका अर्थ साफ है कि मध्यमवर्गीय परिवार अब मकान खरीदने में पहले की तुलना में अधिक कठिनाई महसूस कर रहे हैं।
उन्होंने कहा कि मौजूदा आर्थिक हालात में भवन निर्माण क्षेत्र दोहरी मार झेल रहा है। एक तरफ निर्माण लागत लगातार बढ़ रही है, वहीं दूसरी ओर लोगों की आय और खरीद क्षमता उस गति से नहीं बढ़ रही। परिणामस्वरूप बाजार में मांग कमजोर पड़ रही है और नई परियोजनाओं की गति भी धीमी होती जा रही है। प्रदीप गुप्ता ने सरकार से भवन निर्माण क्षेत्र को राहत देने के लिए ठोस कदम उठाने की मांग की। उन्होंने कहा कि यदि निर्माण सामग्री की कीमतों पर नियंत्रण, सस्ती ब्याज दरों पर ऋण और बिल्डरों के लिए विशेष राहत पैकेज दिए जाएं तो इस क्षेत्र को दोबारा मजबूती मिल सकती है। उन्होंने कहा कि भवन निर्माण क्षेत्र केवल कारोबार नहीं, बल्कि देश की अर्थव्यवस्था और रोजगार का बड़ा आधार है। ऐसे में इस क्षेत्र को स्थिर बनाए रखना बेहद जरूरी है।
















