लेखक- राकेश कुमार भट्ट
(लेखक सामाजिक विश्लेषक है। डेढ दशक से प्रकृति, पर्यावरण और मानव संसाधन प्रबंधन क्षेत्र से जुड़े हुए है और कई शोध पत्र तैयार किया है। इन विषयों पर अक्सर लिखते रहते है। यह लेख उदय भूमि के लिए लिखा है)
Flood के कारण देश को प्रत्येक वर्ष बड़ा नुकसान झेलना पड़ता है। बाढ़ की वजह से बड़ी संख्या में नागरिकों की जान खतरे में पड़ जाती है। इसके अलावा आशियाने उजड़ने से उन्हें पलायन के लिए मजबूर होना पड़ता है। करोड़ों-अरबों रुपए का नुकसान Flood की वजह से होता है। Flood में फंसे नागरिकों की जिंदगी बचाने के लिए विभिन्न एजेंसियों को खासी कसरत तक करनी पड़ती है। City Flood का प्रमुख कारण अनियोजित शहरीकरण को माना जाता है। देश में शहरों का विकास सामान्यत: अव्यवस्थित एवं गैर-नियोजित तरीके से किया गया है। शहरों के विकास में प्लानिंग की अनदेखी का खामियाजा निरंतर उठाना पड़ रहा है।
योजनाओं की स्थिति बेहद खराब
शहरी भूमि पर औद्योगिक, वाणिज्यिक, आवासीय एवं मनोरंजनात्मक गतिविधियों की काफी मांग होती है। इसे ध्यान में रखकर विभिन्न कार्यों हेतु भूमि की उपलब्धता सुनिश्चित करने को वैज्ञानिक सिद्धांतों की जरूरत रेखांकित की गई। भविष्य की यातायात सघनता को ध्यान में रखकर चौड़ी सड़कों का निर्माण किया जाने लगा। इमारतों की ऊंचाई को सड़कों की चौड़ाई के अनुसार निर्धारित किया गया। भारत के अधिकांश शहरों, खासकर बड़े महानगरों में संचालित योजनाओं की स्थिति बेहद खराब है। ये शहर योजनाबद्ध जल निकासी और अपशिष्ट प्रबंधन प्रणाली के लाभ के बिना विकसित कर दिए गए हैं। शहरों में बारिश के पानी की निकासी और दैनिक जीवन में इस्तेमाल नालियां अक्सर एक होती है, जो शहरों के सीवेज को बाहर निकालती हैं। इससे बारिश के पानी का पुनर्चक्रण, Flood की रोकथाम और बाढ़ के पानी को जल्द से जल्द हटा देना असंभव होता है।
प्लास्टिक के अंधाधुंध उपयोग के कारण समस्या बढ़ी
प्लास्टिक के अंधाधुंध उपयोग के कारण भी जल निकासी में अवरोध उत्पन्न होता है। नतीजन इन समस्याओं के कारण शहरों में बाढ़ जैसी गंभीर समस्या पैदा होने लगती है। बाढ़ एक प्राकृतिक आपदा है और विकास प्रक्रिया की खामियों के कारण इसका स्वरूप विनाशकारी है, मगर तमाम कठिनाइयों के बावजूद Flood की रोकथाम संभव है। यदि ठोस प्लानिंग की जाए तो बाढ़ की समस्या से निपटना आसान है। विभिन्न विभागों के बीच समन्वय और पूर्वाभ्यास न होने के कारण भी शहरों में बाढ़ जैसी समस्या उत्पन्न होने पर शासन और नागरिक बस यही उम्मीद करते हैं कि बारिश रूके और धीरे-धीरे पानी निकल जाए। रियल एस्टेट सेक्टर की मनमानी, खराब नगर नियोजन, जल स्त्रोतों पर अतिक्रमण, सरकारी एवं राजनीतिक स्तर पर जबावदेही की कमी के कारण यह समस्या और विकराल बन जाती है।
जलवायु परिवर्तन की वजह से मानसून का मिजाज अस्थिर
जलवायु परिवर्तन के कारण बेमौसम या मानसून के दौरान जब अचानक भारी बारिश होती है तो शहरों में पानी निकासी का कोई स्थान नहीं बचता है। लिहाजा बाढ़ और विनाश का खतरा बढ़ जाता हैं। जलवायु परिवर्तन की वजह से मानसून का मिजाज भी बेहद अस्थिर हो गया है। किसी सीमित क्षेत्र में एकाएक तेज बारिश के बढ़ते चलन के कारण शहरों में Flood की चुनौती बढ़ती जा रही है। किसी शहर मे कोई आपदा आने पर सरकार का पहला और अंतिम कदम राहत कार्य करना होता है। यह तात्कालिक उपाय तो होता है, मगर आपदा के कारणों पर स्थाई रूप से रोक लगाने में सफल नहीं होता। खराब शहरी नियोजन और अतिक्रमण की भरमार शहरी बाढ़ के लिए सबसे ज्यादा जिम्मेदार कारण है। मानसून का मौसम सिर पर है। अगले कुछ दिनों में भारी बारिश के अनुमान को देखकर आशंका है कि कई शहरों में बाढ़ की विकट समस्या पैदा हो सकती है। लापरवाह शहरीकरण तथा नगर निगमों एवं सरकारों की उदसीनता के कारण सामान्य से ज्यादा बरसात से जन-जीवन थम जाता है। ऐसे में दैनिक कार्य प्रभावित होते हैं।
एकीकृत बाढ़ प्रबंधन प्रणाली अपनाने की आवश्यकता
चुनौतियों से निपटने के लिए एकीकृत बाढ़ प्रबंधन प्रणाली अपनाने की आवश्यकता है। City Flood से निपटने के लिए नगर-निगमों को ज्यादा सक्रियता दिखानी होगी। भूमि के उपयोग एवं निर्माण कार्यों के लिए बेहतर नियोजन पर ध्यान देना होगा। केंद्रीय जल आयोग को बाढ़ पूवानुर्मान के लिए वास्तविक आंकड़ों के साथ समयबद्ध कार्रवाई योजना तैयार करनी चाहिए। इसके अलावा सभी बड़े बांधों के लिए आपदा प्रबंधन योजनाओं को तैयार करने और उनके कार्यान्वयन को समयबद्ध तरीके से पूरा किया जाना चाहिए। छोटी और मैदानी नदियों को तटबंधों के सहारे नियंत्रित किया जा सकता है, मगर बड़ी और पहाड़ी नदियों को खासकर मानसून के समय में तटबंधों के सहारे रोकना बेहद मुश्किल है। पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार में पिछले कुछ साल के भीतर जब कभी बाढ़ आई है तो इसके पीछे एक प्रमुख कारण तटबंधों का टूटना भी रहा है।
सेंदाई फ्रेमवर्क आपदा से निपटने में कारगर
18 मार्च 2015 को जापान के सेंदाई शहर में आपदा जोखिम में कमी को लेकर तीसरे संयुक्त राष्ट्र विश्व सम्मेलन का आयोजन किया गया। इस दौरान सेंदाई फ्रेमवर्क को अपनाया गया। इस फ्रेमवर्क में यह स्वीकार किया गया कि आपदा जोखिम को कम करने के लिए प्राथमिक भूमिका सरकार की होती है, मगर इसमें स्थानीय सरकार, निजी क्षेत्र और अन्य हितधारकों की भी जिम्मेदारी होती है। सेंदाई फ्रेमवर्क में आपदा से निपटने के लिए तमाम गाइड लाइंस बताई गई हैं। भारत को इसके दिशा-निर्देशों को अपनाने की दिशा में आगे बढ़ना चाहिए। अलबत्ता बाढ़ की रोकथाम के लिए समय के हिसाब से रणनीति में बदलाव लाने की जरूरत है। अन्यथा Flood के कारण प्रतिवर्ष जोखिम उठाना पड़ेगा। इसके चलते नागरिकों की जानें जाती रहेंगी और करोड़ों-अरबों रुपए का नुकसान सरकारों को उठाना पड़ेगा। 21वीं सदी के भारत में बाढ़ की समस्या से गंभीरता से निपटने की आवश्यकता है। बाढ़ के पानी का कुछ जरूरी कार्यों में इस्तेमाल भी संभव है, मगर यह सब प्लानिंग कर लेने के बाद हो पाएगा।















