विश्व ऑटिज्म जागरूकता दिवस पर सेमिनार का आयोजन
गाजियाबाद। विश्व ऑटिज्म जागरूकता दिवस के अवसर पर गाजियाबाद में भागीरथ सेवा संस्थान द्वारा संचालित कैंमकुस कॉलेज ऑफ स्पेशल एजुकेशन एंड रिसर्च में एक दिवसीय सेमिनार का आयोजन किया गया। इस सेमिनार में ऑटिज्म के विभिन्न पहलुओं पर रोशनी डालने के साथ ही इस विषय पर भी विचार किया गया कि कैसे ऑटिस्टिक बच्चों को समाज की मुख्यधारा में शामिल किया जाए और उनके जीवन स्तर को ऊंचा उठाया जाए। हर साल 2 अप्रैल को मनाया जाता है। इस दिन ऑटिज्म से पीडि़त बच्चों के जीवन में बेहतरी और सुधार को लेकर विभिन्न प्रकार के कार्यक्रम का आयोजन किया जाता है। संयुक्त राष्ट्र महासभा ने साल 2007 में 2 अप्रैल को विश्व ऑटिज्म जागरूकता दिवस की घोषणा की थी।
सेमिनार का संचालन कॉलेज से आटिज्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर में डिप्लोमा इन स्पेशल एजुकेशन का कोर्स कर रहे सेकंड ईयर के छात्र मोहम्मद अहमद और खुशबू कौशिक ने किया। इस सेमिनार में प्रथम और द्वितीय वर्ष के छात्र छात्राओं ने अपने विचार रखें।
छात्रा ख़ुशबू कौशिक ने बताया कि ऑटिज्म (स्वलीनता), एक ऐसी मानसिक स्थिति है, जिससे ग्रस्त लोगों में व्यवहार से लेकर कई तरह की दिक्कतें होती हैं। ऑटिज्म के शुरुआती लक्षण 1-3 साल के बच्चों में नजर आते हैं। सामान्य तौर पर ऐसे बच्चों को उदासीन माना जाता है, लेकिन कुछ मामलों में ये लोग अद्भुत प्रतिभा वाले होते हैं। माना जाता है कि सेंट्रल नर्वस सिस्टम को नुकसान पहुंचने से यह दिक्कत होती है। कई बार गर्भावस्था के दौरान खानपान सही नहीं होने से भी बच्चे को ऑटिज्म का खतरा हो सकता है।
प्रथम वर्ष की छात्रा स्वाति ने बताया कि इस बीमारी के लिए अनुवांशिक और पर्यावरण संबंधी कई कारण जिम्मेदार होते हैं। इस बीमारी से ग्रसित बच्चे अपने आप में खोए से रहते हैं।
अहमद ने बताया कि जिन बच्चों में ऑटिज्म की शिकायत होती है, उनके विकास की गति धीमी होती है। आमतौर पर छह माह के बच्चे मुस्कुराना, उंगली पकडऩा और आवाज पर प्रतिक्रिया देना सीख लेते हैं, लेकिन जिन बच्चों में ऑटिज्म की शिकायत होती है वह ऐसा नहीं कर पाते हैं।
छात्र निवेश ने बताया कि ऑटिज्म से बचाव के लिए गर्भवती महिलाओं को गर्भावस्था के दौरान नियमित तौर पर मेडिकल चेकअप कराना चाहिए। बच्चे के पैदा होने से छह माह तक उनकी आदतों पर गौर करें।
कार्यक्रम में बतौर मुख्य अतिथि आए संस्थान के निदेशक अनादि सुकुल ने कहा कि बच्चों में ऑटिज्म की समस्या लगातार बढ़ रही है। ऑटिज्म से ग्रसित बच्चों को सोशलाइजेशन में काफी समस्याएं आती हैं इसलिए इन्हें मुख्यधारा में लाने के लिए विशेष प्रयास की जरूरत है। कॉलेज की कोर्स कोऑर्डिनेटर माहेश्वरी चौधरी और फैकेल्टी मेंबर्स प्रियंका भनोट ने स्पेशल एजुकेटर होने के नाते अपनी प्रतिबद्धता जताते हुए कहा कि ऑटिज्म से ग्रसित बच्चों को स्वावलंबी बनाए जाने के लिए भागीरथ सेवा संस्थान विशेष रूप से कटिबद्ध है और इसके लिए संस्थान अपने स्तर पर हर संभव प्रयास कर रहा है।
















