लेखक- तरुण मिश्र
(लेखक समाजसेवी एवं राजनैतिक चिंतक हैं। विभिन्न सम सामयिक मुद्दों पर बेबाकी से राय रखते हैं।)
देश में कोरोना संक्रमण की दूसरी लहर ने त्राहिमाम मचा रखा है। इलाज के अभाव में मरीजों की मौत का सिलसिला बरकरार है। आंखें के सामने अपनों को दम तोड़ता देखने की विवशता प्रतिदिन सामने आ रही है। कोविड अस्पतालों के भीतर चीख-पुकार और बाहर अफरा-तफरी मची हुई है। हालात बेकाबू होने पर सुप्रीम कोर्ट, केंद्र सरकार, निर्वाचन आयोग एवं राज्य सरकारें आनन-फानन में प्रयास करते दिखाई दे रही हैं। यदि समय रहते सभी सरकारें सजग हो जाती और ठोस कदम उठा लिए जाते तो आज देश की यह हालात नहीं होती। अब पछताए होत क्या, जब चिड़िया चुग गई खेत… जैसी स्थिति हो गई है। कोरोना संक्रमण की मार से प्रभावित जरूरतमंदों की मदद के लिए अब न तो सिने अभिनेता और ना ही अवार्ड वापसी गैंग के सदस्य सामने आ रहे हैं। जरा-जरा सी बात पर सरकार को घेरने और अवार्ड वापसी का ढ़ोंग करने वाले अब घरों में दुबके बैठे हैं। उन्हें सिर्फ अपनी और अपने परिवार की चिंता है। कोरोना महामारी से लड़ने के लिए समय रहते तैयारियां न किए जाने का परिणाम आम जनता को भुगतना पड़ रहा है। विभिन्न राजनीतिक दल पिछले कुछ माह से चुनावी तैयारियों में व्यस्त थे। वर्तमान में भी राजनीति हो रही है। विभिन्न दल एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप मढ़कर जनता को गुमराह करने की कोशिश कर रहे हैं। मौजूदा परिस्थितियों के लिए सभी राजनीतिक दल बराबर के जिम्मेदार हैं। इन दलों ने जनता को उसके हाल पर छोड़ दिया है। कोरोना काल में चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली भी सवालों के घेरे में है। चुनाव आयोग सम्मानित संस्था है, मगर कोरोना काल में विभिन्न राज्यों में चुनाव कराने का इस संस्था का निर्णय आत्मघाती साबित हो रहा है। किसी भी नागरिक की जिंदगी के साथ खिलवाड़ कर चुनाव नहीं हो सकता है। चुनाव से ज्यादा जरूरी नागरिकों की जिंदगी है। पश्चिम बंगाल में जनता की जान को दांव पर लागकर आठ चरणों में चुनाव कराना कतई हितकर नहीं माना जा सकता। पश्चिम बंगाल समेत अन्य राज्यों में कोरोना के प्रकोप को देखकर चुनाव को स्थगित किया जा सकता था। जब विभिन्न बोर्डों की परीक्षाएं रूक सकती सकती हैं तो फिर चुनाव को क्यों नहीं रोका जा सकता? कोरोना प्रोटोकॉल भी सिर्फ आम नागरिकों के लिए है। पश्चिम बंगाल व अन्य राज्यों में चुनावी मौसम में कोरोना प्रोटोकॉल लागू होने के बावजूद बाहरी नागरिकों का प्रवेश हो रहा है। दिल्ली और उत्तर प्रदेश से बड़ी संख्या में विभिन्न दलों के कार्यकर्ता पश्चिम बंगाल पहुंचे हैं। जिन्हें किसी ने वहां जाने से नहीं रोका। चुनावी रैलियों में कई बड़े नेताओं को मास्क पहने देखा गया। यह कद्दावर नेता समय-समय पर नागरिकों से कोविड प्रोटोकॉल का पालन करने की अपील करते हैं लेकिन खुद उस पर अमल नहीं करते। कोरोना काल में मीडिया ने भी ईमानदारी नहीं बरती है। कोरोना संकट काल में अच्छे कार्य करने वालों को प्रमुखता से नहीं दिखाया गया बल्कि न्यूज चैनलों पर निगेटिव स्टोरी की भरमार है। देश की राजधानी दिल्ली की स्थिति बेहद चिंताजनक हैं। कभी गैस सिलेंडर के लिए लंबी-लंबी लाइनें लगती थीं। आज आॅक्सीजन सिलेंडर के लिए दिल्ली में लंबी कतारें देखने को मिल रही हैं। आॅक्सीजन और जीवन रक्षक दवाओं की कालाबजारी चरम पर है। आज आॅक्सीजन को एअरलिफ्ट करना पड़ रहा है। ग्रीन कॉरिडोर बनाकर रेल मार्ग से आॅक्सीजन मंगाया जा रहा है। क्या यह तैयारियां पहले नहीं की जा सकती थीं ? क्या डब्ल्यूएचओ ने पहले सरकार को आगाह नहीं किया था कि कोरोना की दूसरी लहर भी आ सकती है। यदि डब्ल्यूएचओ ने आगाह किया था तो फिर सरकार ने समय रहते समुचित कदम क्यों नहीं उठाए। इसके लिए जिम्मेदार कौन है ? मीडिया का रोल भी सकारात्मक नहीं कहा जा सकता है। मीडिया सिर्फ और सिर्फ नकारात्मक चीजें दिखा रही है। क्या कोई सकारात्मक खबर नहीं है। रेलवे के एक कर्मचारी ने जिस तरह अपनी जान पर खेलकर एक गरीब दृष्टिहीन महिला के बेटे और उसकी जान बचाई क्या यह खबर दिखाने लायक नहीं थी। मीडिया को भी सोचना चाहिए, उसकी भी कई जिम्मेदारी हैं। जिस रेल कर्मचारी ने किसी के जीवन बचाने के लिए अपने जीवन को दांव पर लगा दिया उसके लिए रेल मंत्रालय ने मात्र 50 हजार रुपए प्रोत्साहन राशि देने की घोषणा कर कर्तव्य की इतिश्री कर ली, मगर उस कर्मचारी ने विभाग को दो टूक जबाव देकर मानवता का परिचय दिया। कर्मचारी ने कहा कि वह आधा पैसा उस बच्चे और उसकी मां को देगा, क्योंकि उसकी स्थिति मेरे से कहीं अधिक खराब है। इसी प्रकार मुंबई के एक व्यक्ति ने जरूरतमंदों को आॅक्सीजन सिलेंडर पहुंचाने के लिए अपनी एक्सयूवी गाड़ी बेच दी, लेकिन किसी मीडिया हाउस ने इस खबर को तवज्जो नहीं दी। मीडिया को सकारात्मक चीजें भी दिखाने चाहिए ताकि नागरिकों को प्रोत्साहित किया जा सके। वहीं, छोटी-छोटी बातों पर जो अवार्ड वापस करने की घोषणा करते थे, वह आज कहीं दिखाई नहीं दे रहे हैं। अवार्ड वापसी गैंग की तरफ से कोई प्रतिक्रिया भी सामने नहीं आ रही है। दरअसल अवार्ड वापसी गैंग का सिर्फ एक एजेंडा है राजनीतिक करना। क्या जनमानस के लिए उनका कोई नैतिक दायित्व नहीं है। सिनेमा और क्रिकेट जगत से जुड़े लोगों को भारत सरकार द्वारा इतनी सुविधाएं, इतनी छूट दी जाती है, मगर वह आज कहां हैं? क्या पूरे फिल्म इंडस्ट्री में सोनू सूद ही एकमात्र ऐसे कलाकार हैं जिनके अंदर मानवता शेष है। अभी भी बीसीसीआई और क्रिकेट के वर्तमान और पूर्व खिलाड़ी आईपीएल में व्यस्त हैं। वर्तमान में जो हालात हैं, उसमें इलाज के लिए सबसे जरूरी है लोगों को प्रोत्साहित करना। उनका मोटिवेशन बहुत जरूरी है। यदि लोगों को जागरूक कर उन्हें मोटिवेट किया गया तो काफी हद तक इस बीमारी से निपटने में मदद मिलेगी। भारत सरकार ने देश में विभिन्न प्रकार के स्वयं सेवी संस्थाओं को टैक्स में छूट दे रखा है। आज जरूरत के समय में इन स्वयं सेवी संस्थाओं से आम जनमानस को कोई मदद नहीं मिल रहा है। क्या भारत सरकार को इन सभी संस्थाओं को मिलने वाली छूट खत्म नहीं कर देना चाहिये? सबसे जरूरी बात कि आम लोगों को हर हाल में दो गज की दूरी और मास्क है जरूरी के नियम का पालन करना चाहिये।















