Karnataka – बीएस येदियुरप्पा ने डाले हथियार

Karnataka में नेतृत्व परिवर्तन की अटकलों पर आखिरकार विराम लग गया है। CM BS Yediyurappa ने आखिरकार इस्तीफा देने का ऐलान कर दिया है। इसके साथ नए मुख्यमंत्री की तलाश शुरू हो गई है। इसे महज इत्तेफाक कहें अथवा कुछ और Karnataka में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की सरकार को 2 साल हो गए हैं। सरकार की कमान अब तक येदियुरप्पा के हाथों में थी। वह भाजपा के काफी पुराने एवं सक्रिय कार्यकर्ता हैं। इस राज्य में भाजपा की जड़ें मजबूत करने में उनके योगदान को कतई नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। भाजपा और कमल को घर-घर तक पहचान दिलाने में उन्होंने किसी समय में साइकिल पर सवार होकर संघर्ष की शुरुआत की थी। वर्तमान में पार्टी वहां बेहद मजबूत हो चुकी है। लंबे राजनीतिक जीवन में येदियुरप्पा ने अनेक उतार-चढ़ाव का सामना किया है। हालाकि वह कभी थके नहीं।

Karnataka में पिछले कुछ दिनों से नेतृत्व में बदलाव होने की चर्चाएं जोरों पर शुरू हो गई थीं। भाजपा के शीर्ष नेतृत्व की तरफ से इस प्रकार के संकेत मिल गए थे। येदियुरप्पा को भी कुर्सी जाने का आभास हो गया था, मगर अंतिम समय तक वह अपनी ताकत का प्रदर्शन करते रहे। अच्छी बात यह है कि भाजपा के शीर्ष नेतृत्व के फैसले को उन्होंने मान लिया। BS Yediyurappa जैसे पुराने, वरिष्ठ एवं प्रभावशाली नेता को मनाकर कर्नाटक में सत्ता परिवर्तन का रास्ता साफ हो सका है। यदि ऐसा न होता और येदियुरप्पा पद न छोड़ने की जिद पर अड़ जाते तो भाजपा की मुश्किलें बढ़ना तय था।

भाजपा के शीर्ष नेतृत्व की मंशा के अनुरूप मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देने का ऐलान कर येदियुरप्पा ने अच्छा राजनीतिज्ञ होने की छवि को गढ़ा है। हालाकि इस जिम्मेदारी से मुक्त होने की घोषणा करते समय वह भावुक नजर आए। उन्होंने पार्टी में अपने योगदान और संघर्ष का भी जिक्र किया। आखिर उन्हें यह पद क्यूं छोड़ना पड़ा ? इसे लेकर पार्टी की ओर से कोई आधिकारिक बयान तो नहीं आया है, मगर चर्चाओं के मुताबिक BS Yediyurappa की बढ़ती उम्र और खराब स्वास्थ्य को इसका कारण माना जा रहा है। दरअसल उनकी उम्र 78 वर्ष हो गई है। भाजपा में 75 प्लस के नेताओं को सक्रिय राजनीति से दूर रखने की परंपरा चल रही है। 2014 में केंद्र में मोदी सरकार आने के बाद से यह परंपरा शुरू हुई है। पूर्व उप-प्रधानमंत्री एवं वरिष्ठ नेता लाल कृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी आदि को भी बढ़ती उम्र की वजह से भाजपा में साइड लाइन कर दिया गया। जबकि किसी समय आडवाणी को प्रधानमंत्री पद की दौड़ में माना जाता था।

Karnataka में BS Yediyurappa को भरोसे में लेकर पार्टी ने किसी प्रकार के विवाद को उत्पन्न नहीं होने दिया है। चर्चा है कि उनके नजदीकी और पसंदीदा व्यक्ति को सीएम पद सौंपा जाएगा। फिलहाल कुछ नाम सुर्खियों में इनमें बासवराज बोम्मई, प्रहलाद जोशी और विश्वेश्वरा हेगड़े कगेरी का नाम सबसे आगे चल रहा है। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा ने Karnataka प्रभारी अरुण सिंह से बातचीत की है। अगले सीएम के चुनाव के लिए जल्द प्रेक्षक के नाम का ऐलान संभव है। माना जा रहा है कि मुख्यमंत्री कोई भी बने, बीएस येदियुरप्पा की सहमति उसके लिए आवश्यक होगी।

7 बार विधायक चुने गए येदियुरप्पा ने सीएम पद से इस्तीफा देने का ऐलान करने के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह का भी आभार व्यक्त किया है। Karnatakaके शिवमोगा से राजनीतिक कैरियर की शुरुआत करने वाले येदियुरप्पा आज किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं। Karnataka की सियासत में वह मजबूत पकड़ रखते हैं। Karnataka में नेतृत्व परिवर्तन की कवायद निर्विवाद और शांति पूर्ण तरीके से संपन्न होती देख भाजपा के शीर्ष नेतृत्व ने भी राहत की सांस ली है। नए मुख्यमंत्री को अपनी कार्यशैली को साबित करने के लिए 3 साल का समय होगा। इस अवधि में यदि वह सही प्रकार से सरकार का संचालन कर जनता के बीच पकड़ बनाने में कामयाब रहते हैं तो भविष्य में भाजपा और मजबूत हो सकेगी। अन्यथा Karnataka में नेतृत्व परिवर्तन की चाल पार्टी के लिए उल्टी पड़ सकती है।

भाजपा ने Karnataka से पहले उत्तराखंड में नेतृत्व परिवर्तन की रणनीति को अंजाम दिया था। उत्तराखंड में अगले साल विधान सभा चुनाव होने हैं। 4 साल के भीतर वहां भाजपा को 3 बार मुख्यमंत्री फेस को बदलना पड़ा है। 2017 में त्रिवेंद्र सिंह रावत को भाजपा ने मुख्यमंत्री की कमान सौंपी थी। करीब 3 साल वह पद पर बने रहे। 2021 के मार्च में भाजपा ने रावत को हटाकर तीरथ सिंह रावत को सीएम पद की जिम्मेदारी सौंपी थी, मगर वह ज्यादा समय तक इस पर टिके नहीं रह सके। जुलाई के प्रथम सप्ताह में भाजपा ने तीरथ सिंह को हटाकर पुष्कर सिंह धामी को कमान सौंपी। फिलहाल धामी के भरोसे उत्तराखंड में भाजपा की नाव चल रही है।

2017 के विधान सभा चुनाव में कांग्रेस को पराजित कर भाजपा ने सत्ता संभाली थी। त्रिवेंद्र सिंह रावत पर पार्टी ने जो भरोसा जताया था, उस पर वह खरे नहीं उतर पाए। अंतत: उन्हें कुर्सी गंवानी पड़ी थी। कुछ माह पहले उत्तर प्रदेश में भी भाजपा ने रद्दोबदल की थी। पूर्व नौकरशाह अरविंद कुमार शर्मा को संगठन में अह्म जिम्मेदारी सौंपी गई। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के करीबी शर्मा को योगी सरकार में महत्वपूर्ण पद मिलने की चर्चाएं कई दिनों तक चली थीं। इसके चलते मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और भाजपा के शीर्ष नेतृत्व में भी टकराव होने की चर्चाओं ने खूब सुर्खियां बटोरी थीं, मगर देश के इस सबसे बड़े राज्य में पार्टी ने चतुराई का परिचय देकर किसी प्रकार के विवाद को बढ़ने से पहले रोक लिया था। फिलहाल Karnataka में नेतृत्व परिवर्तन की योजना को अमलीजामा पहनाने में भाजपा सफल होती दिखाई दे रही है।