अटल बिहारी वाजपेयी: अजातशत्रु नेता की पुण्यतिथि पर अमर स्मरण

लेखक : तरुण मिश्र
(समाजसेवी एवं राजनीतिक चिंतक हैं। राजनीतिक और सामाजिक विषयों पर लिखते हैं। देश-विदेश में आयोजित होने वाले व्याख्यानों में एक प्रखर वक्ता के रूप में जाने जाते हैं। पूर्व में अखिल भारतवर्षीय ब्राह्मण महासभा के राष्ट्रीय महामंत्री हैं।)

आज पूरा देश भारत रत्न और पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को उनकी सातवीं पुण्यतिथि पर श्रद्धापूर्वक नमन कर रहा है। सात साल पहले आजके दिन वह महान शख्सियत इस दुनिया से विदा हो गई थी, लेकिन उनके विचार, उनके आदर्श और उनकी कर्तव्यनिष्ठा आज भी जीवंत हैं। जब आज देश कर्तव्य पथ और कर्तव्य भवन का निर्माण कर रहा है, तब अटल जी का जीवन सबसे बड़ी मिसाल बनकर सामने आता है। उन्होंने कभी कर्तव्यों से समझौता नहीं किया। उनके विचार छोटे मन से कोई बड़ा नहीं होता, टूटे मन से कोई खड़ा नहीं होता आज भी हर भारतीय के लिए प्रेरणा का स्रोत हैं। अटल बिहारी वाजपेयी भारतीय राजनीति में ऐसे नेता रहे जिन्हें विरोधी भी सम्मान की दृष्टि से देखते थे। उनका व्यक्तित्व इतना प्रभावशाली था कि पहली ही मुलाकात में वे सामने वाले को अपना बना लेते थे। मधुर व्यवहार, सहजता और विनम्रता उनकी पहचान थी। यही कारण है कि उन्हें अजातशत्रु नेता कहा गया। उन्होंने अपने पूरे राजनीतिक जीवन में प्रतिद्वंद्वी बनाए, पर कभी शत्रु नहीं। आज जब राजनीति आरोप-प्रत्यारोप और कटुता में उलझी है, तब अटल जी की शैली और भी प्रासंगिक प्रतीत होती है। अटल बिहारी वाजपेयी ने तीन बार प्रधानमंत्री पद संभाला। पहली बार 1996 में उनकी सरकार मात्र 13 दिन चली, दूसरी बार 1998 से 1999 तक और तीसरी बार 1999 से 2004 तक उन्होंने देश का नेतृत्व किया। उनके कार्यकाल में भारत ने नई ऊंचाइयां हासिल कीं।

पोखरण परमाणु परीक्षण ने भारत को दुनिया की परमाणु शक्ति के रूप में स्थापित किया। स्वर्णिम चतुर्भुज जैसी महत्वाकांक्षी सड़क परियोजना ने देश की अर्थव्यवस्था को गति दी। प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना और सर्व शिक्षा अभियान जैसी योजनाओं ने गांव-गांव तक विकास की किरण पहुँचाई। विपक्षियों ने एक बार उन पर आरोप लगाया कि उन्हें सत्ता से प्रेम है। इस पर अटल जी ने लोकसभा में दृढ़ स्वर में कहा कि वे मरने से नहीं डरते, डरते हैं तो केवल बदनामी से। उनके इस कथन ने पूरे सदन को मौन कर दिया और साबित कर दिया कि सत्ता उनके लिए साधन मात्र थी, लक्ष्य नहीं। उनका वास्तविक लक्ष्य था राष्ट्र का गौरव और जनता का उत्थान। अटल बिहारी वाजपेयी अपने भाषणों के लिए विशेष रूप से याद किए जाते हैं। उनकी वक्तृता शैली में गंभीरता और सहजता का अद्भुत मेल था। जब वे बोलते थे तो विपक्षी दल भी ध्यान से सुनते और अक्सर सहमति जताते। उनके भाषण केवल तर्कपूर्ण नहीं होते थे बल्कि उनमें साहित्यिक रंग भी झलकता था। यही कारण था कि उनका हर भाषण संसद के इतिहास में दर्ज हो जाता था। अटल बिहारी वाजपेयी का पाकिस्तान के प्रति नजरिया बेहद स्पष्ट था। उन्होंने कहा था कि आप दोस्त बदल सकते हैं, लेकिन पड़ोसी नहीं। इस विचार के साथ उन्होंने पाकिस्तान के साथ संबंध सुधारने की कोशिश की।

उनकी लाहौर बस यात्रा इसका उदाहरण है। लेकिन कारगिल युद्ध की घटना ने उन्हें भीतर तक विचलित किया। इसके बावजूद उन्होंने संयम नहीं खोया और दृढ़ नेतृत्व का परिचय दिया। कारगिल युद्ध भारत की राजनीति और सुरक्षा के लिए बड़ा मोड़ था। युद्ध के समय अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति ने उन्हें चेतावनी दी कि पाकिस्तान परमाणु हमला करने की योजना बना रहा है। अटल जी ने धैर्यपूर्वक सुना और स्पष्ट शब्दों में कहा कि अगर पाकिस्तान ऐसा करेगा तो उसे अपने अस्तित्व के मिट जाने के गंभीर परिणाम भुगतने होंगे। उनका यह साहसिक उत्तर उनके राष्ट्रप्रेम और दृढ़ संकल्प को दर्शाता है। आज जब दिल्ली का राजपथ बदलकर कर्तव्य पथ हो गया है, तो यह नाम अटल जी की स्मृतियों को और गहरा कर देता है। उनका पूरा जीवन कर्तव्य के प्रति समर्पित रहा। उनके लिए सत्ता कभी भी निजी महत्वाकांक्षा नहीं रही। वे हमेशा मानते थे कि सत्ता केवल जनसेवा और राष्ट्रहित का माध्यम है। अटल बिहारी वाजपेयी केवल राजनीतिज्ञ ही नहीं बल्कि संवेदनशील कवि भी थे। उनकी कविताओं में राष्ट्रभक्ति, संवेदनशीलता और करुणा झलकती है। उनकी पंक्तियाँ आज भी लोगों को प्रेरित करती हैं। राजनीति में रहते हुए भी उन्होंने अपने भीतर के कवि को जीवित रखा और यही उन्हें औरों से अलग बनाता है।

आज के दौर की राजनीति में जब कटुता, वैमनस्य और आरोप-प्रत्यारोप का बोलबाला है, तब अटल बिहारी वाजपेयी का जीवन और भी प्रासंगिक हो जाता है। वे विपक्ष को सुनते थे, सम्मान देते थे और सटीक जवाब देकर विवादों को बढ़ने नहीं देते थे। उनका मानना था कि लोकतंत्र में संवाद सबसे बड़ा हथियार है। अटल बिहारी वाजपेयी का जीवन जितना लिखा जाए, उतना कम है। उन्होंने अपना पूरा जीवन देश और समाज के उत्थान के लिए समर्पित कर दिया। सात वर्ष पहले भले ही वे शारीरिक रूप से इस दुनिया से चले गए हों, लेकिन उनके विचार आज भी जीवंत हैं। वे सचमुच ऐसे नेता थे जिनका कोई शत्रु नहीं था। उनका कर्तव्यनिष्ठ जीवन, उनकी स्पष्ट सोच और उनका संवेदनशील हृदय आने वाली पीढ़ियों के लिए मार्गदर्शक बना रहेगा। अटल जी की पुण्यतिथि पर पूरा देश उन्हें श्रद्धापूर्वक नमन करता है। आज जब भारत आत्मनिर्भरता और विश्वगुरु बनने की ओर अग्रसर है, तब हर भारतीय को अटल बिहारी वाजपेयी के आदर्शों को आत्मसात करने की आवश्यकता है। वे सिर्फ एक राजनेता नहीं बल्कि युगपुरुष थे, जिन्होंने हमें सिखाया कि सच्चा नेता वही है जो सत्ता से ऊपर उठकर राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखे।

एक कवि और साहित्यकार होने के नाते वे संस्कृति और भाषा को भी उतना ही महत्व देते थे जितना राजनीति को। उनकी कविताएँ देशभक्ति और संवेदनशीलता से भरी होती थीं। अटल जी की विनम्रता और सरलता प्रधानमंत्री पद पर रहते हुए भी उनकी जीवनशैली बेहद सादगीपूर्ण रही। यही कारण है कि आम जनता खुद को उनसे जुड़ा हुआ महसूस करती थी। वे केवल भारत में ही नहीं बल्कि अंतरराष्ट्रीय मंच पर भी आदरणीय नेता माने जाते थे। उनकी भाषण कला और संयमित नेतृत्व शैली ने विदेशों में भी उन्हें सम्मान दिलाया। अटल जी का स्वास्थ्य और अंतिम समय आखिरी वर्षों में उनकी बीमारी और राजनीति से दूरी के बावजूद देशवासियों के दिलों में उनकी लोकप्रियता कम नहीं हुई।