लेखक : मणिकांत झा
(आईटी विशेषज्ञ)
एक खबर जापान के तोयोआके शहर से आई है जहां अब लोग प्रतिदिन केवल दो घंटे ही स्मार्टफोन का उपयोग कर सकेंगे। तोयोआके के मेयर मासामी कोकी ने घोषणा की कि शहर की विधानसभा जल्द ही एक मसौदा अध्यादेश पर मतदान करेगी, जो निवासियों को काम और स्कूल के दायित्वों के अलावा इलेक्ट्रॉनिक गैजेट्स पर दो घंटे तक ही समय बिताने की अनुमति देगा। दूसरी खबर भारत के रायपुर शहर की है। सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल छत्तीसगढ़ के रायपुर शहर के इस वीडियो में नाबालिग छात्रा स्मार्ट फोन को लेकर जिद करती दिखाई देती है। छात्रा पर स्मार्ट फोन के मानसकि दुष्परिणाम का असर साफ-साफ दिखाई दे रहा है। यह दोनों खबरें इलैक्ट्रानिक गजैट्स के लगातार बढ़ते इस्तेमाल से होने वाली गंभीर परेशानियों की ओर इशारा कर रही है।
कनाडियन जर्नल ऑफ कार्डियोलॉजी में प्रकाशित एक रिसर्च पेपर के मुताबिक मोबाइल फोन पर लंबी बात करना अपने और अपनों के लिए खतरा पैदा करना है। बड़े पैमाने पर किये गये इस सर्वे में लगभग 5 लाख लोगों को शामिल किया गया है। स्टडी रिपोर्ट में कहा गय है कि जितनी देर आप मोबाइल फोन पर बात करेंगे, उतना ज्यादा आपको हार्ट डिजीज जैसे कि हार्ट अटैक, हार्ट फेल्योर या स्ट्रोक का खतरा बढ़ जाता है। मोबाइल फोन पर बात करने से भावनात्मक परेशानी, नींद में खलल और नसों संबंधित परेशानियां पैदा हो जाएगी। रिसर्च में बताया कि एक दिन में अगर कोई व्यक्ति आधा घंटे तक मोबाइल पर बात करता है तो दिल की बीमारियों का जोखिम 3 प्रतिशत ज्यादा है। वहीं अगर कोई व्यक्ति 1 से 3 घंटे तक कोई बात करता है तो इससे हार्ट डिजीज का खतरा 15 प्रतिशत तक बढ़ जाता है।
फोन पर लंबी-लंबी बातें करना स्वास्थ्य, संबंध और समय तीनों के लिए खतरे की घंटी है। सबसे पहले स्वास्थ्य की दृष्टि से देखें तो फोन पर लंबे समय तक बात करने से कान और दिमाग पर रेडिएशन का असर पड़ता है। यह न केवल सिरदर्द और अनिद्रा जैसी समस्याएं बढ़ाता है, बल्कि कई शोध इसके दीर्घकालिक दुष्परिणामों की ओर भी इशारा करते हैं। साथ ही लगातार मोबाइल कान पर लगाए रखने से गर्दन और रीढ़ की हड्डी पर भी दबाव पड़ता है। दूसरी ओर, लंबी बातचीत समय की बबार्दी है। जो समय रचनात्मक काम में या परिवार के साथ बिताया जा सकता था, वह बेवजह की चचार्ओं में खत्म हो जाता है। यही नहीं, पारिवारिक और सामाजिक दृष्टि से भी लंबे फोन कॉल रिश्तों में तनाव ला सकते हैं। आपके द्वारा लंबे समय तक फोन पर बात करने के दुष्परिणाम आपके बच्चों को भी भुगतना पड़ता है। हमें समझना होगा कि फोन संवाद का साधन है, न कि समय और ऊर्जा का भक्षक। यदि जरूरी हो तो बातचीत सीमित और कम समय में पूरा करें।
मानव शरीर के लिए दशमलव 60 वाट प्रति किलोग्राम से ज्यादा का रेडिएशन खतरनाक होता है जबकि स्मार्टफोन से निकलने वाला रेडिएशन इससे दोगुना ज्यादा होता है। आज की दुनिया में मोबाइल फोन जीवन का अभिन्न हिस्सा बन चुका है। शिक्षा, व्यापार, संचार, मनोरंजन और आपात स्थिति-हर जगह मोबाइल हमारी जरूरत बन गया है। लेकिन यह सुविधा धीरे-धीरे हमारे जीवन के लिए अभिशाप का रूप भी ले रही है। यह सच है कि मोबाइल फोन आवश्यक शैतान है। जिसे हम अपने काम में साधन के रूप में इस्तेमाल करते हैं, वही भष्मासुर बनकर हमारी दिनचर्या, मानसिक शांति और स्वास्थ्य को निगलने लगता है। घंटों सोशल मीडिया पर स्क्रॉल करना, गेम्स खेलना या बेवजह बातचीत करना हमारी उत्पादकता को खत्म कर रहा है। यही नहीं, मानसिक तनाव और अवसाद का बड़ा कारण भी यह लगातार स्क्रीन पर नजरें गड़ाए रहना है।
शोध बताते हैं कि अत्यधिक मोबाइल उपयोग से नींद की समस्या, आंखों की कमजोरी और एकाग्रता में कमी आती है। सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि मोबाइल धीरे-धीरे आदत नहीं बल्कि लत बनता जा रहा है। यह लत नशे की तरह काम करती है, जिससे बाहर निकलना मुश्किल होता है। इसलिए आवश्यक है कि हम मोबाइल का इस्तेमाल संयम और सजगता के साथ करें। मोबाइल हमारे काम का साधन बने, जीवन का स्वामी नहीं। मोबाइल फोन निश्चित ही आधुनिक युग की जरूरत है, लेकिन यह तभी वरदान है जब हम इसे अपने नियंत्रण में रखें। अगर यह हमें नियंत्रित करने लगे, तो यह भस्मासुर बनकर हमारे भविष्य को निगल जाएगा। यह कहना गलत नहीं कि मोबाइल से दूरी सेहत के लिए बेहद जरूरी है। इसका प्रयोग जितना कम किया जाएगा, वह फायदेमंद साबित होगा।
















