-छुट्टी न मिलना, लगातार फटकार, निलंबन और सेवा समाप्ति की धमकी ने ली एक युवा कर्मचारी की जान; तहसीलों में उबल पड़ा गुस्सा, प्रशासन पर गंभीर सवाल
उदय भूमि संवाददाता
गाजियाबाद। फतेहपुर जिले में 2024 बैच के युवा लेखपाल सुधीर कुमार की हृदय विदारक मृत्यु ने प्रदेश भर में लेखपालों तथा राजस्व कर्मचारियों के बीच जबरदस्त आक्रोश पैदा कर दिया है। महज कुछ दिनों बाद शादी होने वाली थी, तैयारियों का दबाव था, लेकिन छुट्टी के लिए की गई उनकी बार-बार की विनती को तहसील प्रशासन ने अनसुना कर दिया। घटनाक्रम की कडिय़ां देखकर परिजन, सहकर्मी और लेखपाल संगठन इसे साधारण आत्महत्या नहीं बल्कि प्रशासनिक संवेदनहीनता द्वारा कारित ‘मजबूर मृत्यु’ बता रहे हैं, जिसने एक ही दिन में दो परिवारों की खुशियां उजाड़ दीं।
सूत्रों तथा परिजनों के अनुसार सुधीर की शादी 26 नवंबर 2025 को तय थी। वे लगभग दो सप्ताह से छुट्टी के लिए निवेदन कर रहे थे, लेकिन स्थानीय अधिकारियों ने एसआईआर कार्य का हवाला देते हुए छुट्टी देने से स्पष्ट इंकार कर दिया। 22 नवंबर को वे एसआईआर की बैठक में शामिल नहीं हो सके, जिसके बाद उपजिलाधिकारी के निर्देश पर निर्वाचन पंजीकरण अधिकारी ने उनका निलंबन करा दिया। इस निर्णय ने सुधीर को मानसिक रूप से बुरी तरह तोड़ दिया। इसके बावजूद अगले ही दिन अधिकारियों द्वारा घर पर राजस्व निरीक्षक भेजकर उनसे कहा गया कि या तो सारा कार्य तुरंत पूरा करो, या किसी अन्य व्यक्ति से पैसे देकर करवा लो, अन्यथा निलंबन के बाद सेवा समाप्ति की कार्रवाई भी की जा सकती है। यह चेतावनी सुधीर के मन में बसे भय और तनाव को और गहरा कर गई।
विवाह, पारिवारिक जिम्मेदारियों, निलंबन और नौकरी जाने जैसी आशंकाओं ने मिलकर उन्हें ऐसे चक्रव्यूह में धकेल दिया जहां से वे बाहर न निकल सके। 25 नवंबर की सुबह सुधीर ने यह अनचाहा कदम उठा लिया। परिवार का आरोप है कि सुधीर पहले से ही अवसाद और अत्यधिक तनाव में थे तथा अधिकारियों की कठोरता और अमानवीय दबाव ने उनकी मानसिक स्थिति को पूरी तरह अस्त-व्यस्त कर दिया। उनका कहना है कि यह ‘प्रशासनिक उत्पीडऩ से हुई मौत’ है, जिसके लिए जिम्मेदार अधिकारियों पर कठोर कार्रवाई अनिवार्य है। परिजनों ने थाने में शिकायत दी, लेकिन 30 घंटे तक प्राथमिकी दर्ज नहीं की गई। जब परिजनों ने अंतिम संस्कार से मना कर दिया तब प्रशासन ने कथित रूप से तहरीर बदलवाकर प्राथमिकी दर्ज की और इसमें मुख्य आरोपी माने जा रहे उपजिलाधिकारी संजय कुमार सक्सेना का नाम शामिल नहीं किया गया। केवल राजस्व निरीक्षक को नामजद कर दिया गया, जिसे लेखपाल संघ ‘कपटपूर्वक मामला कमजोर करने की कोशिश’ बता रहा है।
इस पूरे घटनाक्रम ने प्रदेशभर के लेखपालों को झकझोर कर रख दिया। शुक्रवार को सभी जिलों की तहसीलों में जोरदार धरना और विरोध प्रदर्शन हुआ। गाजियाबाद में तीनों तहसीलों में सामूहिक विरोध देखा गया। सदर तहसील में प्रदेश उपाध्यक्ष सिद्धार्थ कौशिक के नेतृत्व में बड़े पैमाने पर लेखपाल एकत्र हुए। उनके साथ तहसील अध्यक्ष राकेश कुमार शर्मा, तहसील सचिव निशांत त्यागी और बड़ी संख्या में लेखपाल मौजूद थे। सिद्धार्थ कौशिक ने प्रशासन पर तीखा प्रहार करते हुए कहा कि सुधीर की मौत केवल एक कर्मी की मौत नहीं, बल्कि वर्षों से जारी उस उत्पीडऩ और दबाव की पराकाष्ठा है जिसे लेखपाल प्रतिदिन झेल रहे हैं। उन्होंने कहा कि अधिकारियों द्वारा अमानवीय व्यवहार, डांट-फटकार, बिना कारण निलंबन, वेतन रोकना और धमकाने की प्रवृत्ति लगातार बढ़ती जा रही है। उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा कि यदि दोषी अधिकारियों पर कार्रवाई नहीं की गई तो आंदोलन और उग्र होगा तथा पूरे प्रदेश में कार्य बहिष्कार पर भी विचार किया जाएगा।
लेखपाल संघ के पदाधिकारी राकेश शर्मा और निशांत त्यागी ने भी कहा कि अन्य विभागों के कार्यों का भार लेखपालों पर थोप दिया जाता है, जो न तो न्यायसंगत है और न ही व्यवहारिक। किसी भी समस्या को सुनने के बजाय अधिकारी केवल डांट-फटकार और दबाव बनाकर काम करवाना चाहते हैं। यही कारण है कि बीपी, शुगर, अवसाद, घबराहट और हृदय रोग जैसी गंभीर समस्याएं लेखपालों में तेजी से बढ़ रही हैं। संघ ने शासन से मांग की है कि दोषी अधिकारियों को नामजद कर कठोर कार्रवाई की जाए, मृतक की माता को 50 लाख रुपये की आर्थिक सहायता प्रदान की जाए तथा परिवार के एक सदस्य को सरकारी नौकरी दी जाए।
साथ ही एसआईआर की अंतिम तिथि बढ़ाने, अधिकारियों को संवेदनशीलता और संवाद बढ़ाने के निर्देश जारी करने तथा अतिरिक्त कार्यों के लिए उचित प्रोत्साहन राशि देने की भी मांग उठाई गई। इस बीच पूरे प्रदेश में माहौल तनावपूर्ण है और लेखपाल समुदाय एकजुट होकर न्याय की मांग कर रहा है। उनका कहना है कि इस बार किसी प्रकार का आश्वासन नहीं, बल्कि वास्तविक न्याय चाहिए। परिजन भी अड़े हैं कि जब तक दोषियों पर कार्रवाई नहीं होती, वे पीछे नहीं हटेंगे। सुधीर की मौत ने न केवल एक परिवार की खुशियां छीन लीं, बल्कि प्रदेश की प्रशासनिक कार्यप्रणाली पर भी बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं। यह मामला अब कानून व्यवस्था, मानवता और प्रशासनिक जिम्मेदारी-तीनों की परीक्षा बन गया है।

















