– मजबूत चरित्र निर्माण के बिना विकसित भारत का सपना अधूरा: डॉ नीति तोमर
-ई-सिगरेट प्रतिबंध के बावजूद बच्चों तक पहुंच रहे निकोटीन उत्पाद, संयुक्त कार्रवाई की जरूरत
– अभिभावक, स्कूल और समाज मिलकर ही रोक सकते हैं वैपिंग का बढ़ता खतरा
उदय भूमि संवाददाता
नई दिल्ली। बच्चों और युवाओं में तेजी से बढ़ती वैपिंग और निकोटीन उत्पादों की लत को रोकने तथा शिक्षा व्यवस्था में नैतिक मूल्यों को मजबूत करने के उद्देश्य से ‘मदर्स अगेंस्ट वैपिंग’ (एमएवी) द्वारा राजधानी दिल्ली में एक उच्चस्तरीय सेमिनार आयोजित किया गया। ‘मूल्यों की शिक्षा, हमारे बच्चों की सुरक्षा : नए निकोटीन उत्पादों को बच्चों से दूर रखना’ विषय पर आयोजित इस सेमिनार में शिक्षा जगत के नीति-निर्माता, शिक्षाविद, स्वास्थ्य विशेषज्ञ, सामाजिक कार्यकर्ता और अभिभावक प्रतिनिधि एक मंच पर आए। कार्यक्रम में वक्ताओं ने स्पष्ट कहा कि यदि भारत को वर्ष 2047 तक विकसित राष्ट्र बनाने का लक्ष्य हासिल करना है, तो केवल आर्थिक प्रगति पर्याप्त नहीं होगी, बल्कि नई पीढ़ी में अनुशासन, नैतिकता और जिम्मेदारी जैसे मूल्यों का विकास भी उतना ही आवश्यक है। विशेषज्ञों ने शिक्षा प्रणाली में ‘मूल्य आधारित शिक्षा’ को और अधिक प्रभावी तरीके से शामिल करने पर जोर दिया।
सेमिनार में वक्ताओं ने चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि आधुनिक डिजिटल दौर में बच्चे तेजी से नई चुनौतियों के संपर्क में आ रहे हैं, जिनमें ई-सिगरेट और वैपिंग जैसे उत्पाद सबसे बड़ी चिंता बनकर उभरे हैं। भारत में ‘इलेक्ट्रॉनिक सिगरेट निषेध अधिनियम (पीईसीए) 2019’ लागू होने के बावजूद ये उत्पाद अनौपचारिक और अवैध माध्यमों से स्कूली छात्रों तक पहुंच रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यह केवल कानूनी या प्रशासनिक मुद्दा नहीं बल्कि सामाजिक जिम्मेदारी का विषय है। कार्यक्रम में उदय भूमि की प्रबंध संपादक एवं मदर्स अगेंस्ट वैपिंग की सक्रिय सदस्य नीति तोमर ने भी अपने विचार रखे। उन्होंने कहा कि आज सबसे बड़ी चुनौती यह है कि बच्चों को आकर्षक विज्ञापनों और डिजिटल माध्यमों के जरिए गलत आदतों की ओर धकेला जा रहा है। उन्होंने कहा कि मीडिया, समाज और अभिभावकों की भूमिका पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो गई है।
नीति तोमर ने कहा कि वैपिंग केवल एक फैशन या ट्रेंड नहीं बल्कि युवाओं को निकोटीन की लत की ओर ले जाने वाला ‘गेटवे’ बन चुका है। उन्होंने जोर देते हुए कहा कि यदि परिवार स्तर पर संवाद मजबूत किया जाए और बच्चों को सही-गलत की समझ दी जाए, तो नशे की शुरुआत को ही रोका जा सकता है। उन्होंने यह भी कहा कि मूल्य आधारित शिक्षा बच्चों को केवल सफल नहीं बल्कि जिम्मेदार नागरिक बनाती है, जो समाज और राष्ट्र निर्माण में सकारात्मक भूमिका निभाते हैं। शिक्षा मंत्रालय के संयुक्त निदेशक राम सिंह ने कहा कि पहले बच्चों के व्यक्तित्व निर्माण को केवल स्कूलों की जिम्मेदारी माना जाता था, लेकिन वर्तमान परिस्थितियों में शिक्षा, स्वास्थ्य और प्रवर्तन एजेंसियों को मिलकर काम करना होगा।
उन्होंने कहा कि बच्चों को सही दिशा देने के लिए पाठ्यक्रम में जागरूकता आधारित शिक्षा को शामिल करना समय की आवश्यकता है। उच्च शिक्षा के दृष्टिकोण को रखते हुए यूजीसी स्टीयरिंग कमेटी एलओसीएफ की चेयरपर्सन प्रो. डॉ. सुषमा यादव ने कहा कि वैपिंग का मुद्दा केवल चिकित्सा या कानून तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सामाजिक और नैतिक संकट का संकेत है। उन्होंने कहा कि युवा पीढ़ी को सुरक्षित रखने के लिए मूल्य आधारित शिक्षा को शिक्षा प्रणाली का मूल आधार बनाया जाना चाहिए। सेमिनार में यह भी सुझाव दिया गया कि स्कूलों और कॉलेजों में नियमित जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किए जाएं, ताकि छात्र निकोटीन उत्पादों के दुष्प्रभावों को समझ सकें। विशेषज्ञों ने अभिभावकों से अपील की कि वे बच्चों के व्यवहार में आने वाले बदलावों पर ध्यान दें और डिजिटल दुनिया में उनकी गतिविधियों पर सकारात्मक निगरानी रखें।
वक्ताओं ने एक स्वर में कहा कि वैपिंग की समस्या का समाधान केवल कानून से संभव नहीं है। इसके लिए शिक्षा, परिवार, समाज और सरकार को मिलकर काम करना होगा। बच्चों को स्वस्थ, सुरक्षित और मूल्यवान जीवन की दिशा देना ही विकसित भारत की वास्तविक नींव साबित होगा। सेमिनार के अंत में यह संकल्प लिया गया कि आने वाले समय में देशभर में जागरूकता अभियान चलाए जाएंगे, ताकि बच्चों को निकोटीन उत्पादों से दूर रखते हुए एक जागरूक, स्वस्थ और जिम्मेदार पीढ़ी का निर्माण किया जा सके।

















