-मेरठ एक्सप्रेसवे हादसे में दिल और फेफड़ा तक आ गया था नजर, समय रहते उपचार से बची जान
-कई विशेषज्ञ विभागों की संयुक्त टीम ने किया जटिल ऑपरेशन, आधुनिक तकनीक बनी जीवनरक्षक
-दो सप्ताह तक चली मौत और जिंदगी की लड़ाई, चिकित्सकों की मेहनत से स्वस्थ होकर घर लौटा युवक
उदय भूमि संवाददाता
गाजियाबाद। मेरठ एक्सप्रेसवे पर हुए एक भीषण सड़क हादसे में गंभीर रूप से घायल 31 वर्षीय युवक को नई जिंदगी देने में यशोदा अस्पताल, नेहरू नगर के चिकित्सकों ने उल्लेखनीय सफलता हासिल की है। हादसे में युवक के सीने में इतना गहरा और बड़ा घाव हो गया था कि उसका बायां फेफड़ा और हृदय तक बाहर से दिखाई दे रहे थे। कई पसलियां टूट चुकी थीं, छाती में अत्यधिक रक्तस्राव हो रहा था और उसकी सांसें लगातार कमजोर पड़ रही थीं। चिकित्सकों के अनुसार यदि समय पर उपचार नहीं मिलता तो उसकी जान बचाना लगभग असंभव था। लेकिन डॉक्टरों की तत्परता, आधुनिक चिकित्सा तकनीकों और विभिन्न विशेषज्ञ विभागों के समन्वित प्रयासों ने असंभव दिख रही चुनौती को सफलता में बदल दिया। जानकारी के अनुसार 24 मई 2026 की सुबह लगभग सात बजे सड़क दुर्घटना में गंभीर रूप से घायल युवक को यशोदा अस्पताल, नेहरू नगर लाया गया। अस्पताल पहुंचते ही आपातकालीन चिकित्सा विभाग ने उसकी स्थिति का आकलन किया। जांच में सामने आया कि मरीज के सीने में गहरा खुला घाव था, जो सीधे छाती की आंतरिक गुहा तक पहुंच चुका था।
बाईं ओर की कई पसलियां टूट गई थीं, कॉलर बोन और छाती की हड्डी को जोडऩे वाला महत्वपूर्ण जोड़ अपनी जगह से खिसक चुका था। इसके साथ ही छाती के भीतर बड़ी मात्रा में रक्त जमा हो गया था और बाएं फेफड़े का ऊपरी हिस्सा पूरी तरह सिकुड़ गया था। अत्यधिक रक्तस्राव के कारण मरीज सदमे की स्थिति में पहुंच चुका था। चिकित्सकों ने बिना समय गंवाए प्राथमिक जीवनरक्षक उपचार शुरू किया। सबसे पहले घाव की पैकिंग कर रक्तस्राव को नियंत्रित किया गया, आवश्यक मात्रा में रक्त चढ़ाया गया और छाती में जमा खून तथा हवा को बाहर निकालने के लिए विशेष नलिका डाली गई। मरीज की हालत स्थिर करने के बाद विशेषज्ञ चिकित्सकों की एक संयुक्त टीम गठित की गई, जिसने उसके उपचार की कमान संभाली। इस जटिल शल्य प्रक्रिया का नेतृत्व गैस्ट्रो आंत्र एवं न्यूनतम चीरा शल्य चिकित्सा विशेषज्ञ डॉ. प्रसन्ना रमना अरुमुगास्वामी ने किया। उनके साथ अस्थि एवं ट्रॉमा विशेषज्ञ डॉ. अजय पंवार, प्लास्टिक एवं पुनर्निर्माण शल्य चिकित्सा विशेषज्ञ डॉ. मोहम्मद आलम परवाज तथा फेफड़ा एवं गहन चिकित्सा विशेषज्ञ डॉ. बृजेश प्रजापत सहित कई वरिष्ठ चिकित्सक जुड़े रहे।
इसके अलावा आपातकालीन चिकित्सा, गहन चिकित्सा, बेहोशी चिकित्सा तथा रेडियोलॉजी विभाग की टीमों ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उपचार के दौरान चिकित्सकों ने अत्याधुनिक दूरबीन आधारित छाती शल्य चिकित्सा तकनीक का उपयोग किया। यह एक आधुनिक और कम चीरा लगाने वाली पद्धति है, जिसके माध्यम से छाती के भीतर की गंभीर चोटों का उपचार अधिक सटीकता के साथ किया जा सकता है। इस प्रक्रिया में छाती में जमा रक्त निकाला गया, खुले घाव की गहन सफाई और मरम्मत की गई, खिसके हुए जोड़ को पुन: सही स्थिति में स्थापित किया गया, टूटी हुई पसलियों को स्थिर किया गया तथा क्षतिग्रस्त ऊतकों का पुनर्निर्माण कर घाव को सुरक्षित रूप से बंद किया गया। सर्जरी के बाद मरीज को गहन चिकित्सा इकाई में विशेष निगरानी में रखा गया। कुछ समय तक उसे कृत्रिम श्वसन यंत्र के सहारे रखा गया ताकि फेफड़ों को सामान्य रूप से कार्य करने में मदद मिल सके। चिकित्सकों की सतत निगरानी और उपचार के कारण मरीज की स्थिति में लगातार सुधार होता गया।
नियमित जांचों में फेफड़े के धीरे-धीरे सामान्य स्थिति में लौटने की पुष्टि हुई, जिसके बाद उसे कृत्रिम श्वसन यंत्र से सफलतापूर्वक हटा दिया गया। डॉ. प्रसन्ना रमना अरुमुगास्वामी ने बताया कि यह उनके करियर के सबसे चुनौतीपूर्ण ट्रॉमा मामलों में से एक था। मरीज को गंभीर छाती की चोटें, कई पसलियों का फ्रैक्चर, फेफड़े का सिकुडऩा और ऐसा खुला घाव था, जिसमें महत्वपूर्ण अंग तक दिखाई दे रहे थे। समय पर उपचार, विशेषज्ञों के समन्वित प्रयास और आधुनिक शल्य तकनीक की मदद से उसकी जान बचाई जा सकी। उन्होंने कहा कि दूरबीन आधारित छाती शल्य चिकित्सा तकनीक जटिल मामलों में बेहतर परिणाम देने के साथ-साथ मरीज के स्वस्थ होने की प्रक्रिया को भी तेज बनाती है।
अस्पताल के चिकित्सा निदेशक डॉ. सचिन दुबे ने कहा कि यह मामला दर्शाता है कि गंभीर दुर्घटना पीडि़तों के लिए एक मजबूत और समग्र ट्रॉमा प्रणाली कितनी महत्वपूर्ण होती है। जब आपातकालीन चिकित्सा, गहन चिकित्सा, शल्य चिकित्सा और अन्य विशेषज्ञ विभाग एक साथ मिलकर कार्य करते हैं तो सबसे गंभीर परिस्थितियों में भी मरीजों की जान बचाई जा सकती है। करीब दो सप्ताह तक चले उपचार और निरंतर चिकित्सकीय देखरेख के बाद युवक पूरी तरह स्वस्थ होकर स्थिर अवस्था में अस्पताल से घर लौट गया।















