कृष्ण-सुदामा की कथा सुन भाव विभोर हुए श्रद्धालु
गाजियाबाद। मन की सानुकूलता ही सुख है। मन की प्रतिकूलता ही दुख है, इसलिए जरूरी है कि हम मन को वश में रखें। मित्रता अब मात्र स्वार्थ पर टिक गई है, लेकिन मित्रता से बड़ा कोई संबंध नही है। मित्रता अपने आप में एक परिपूर्ण रिश्ता है। भागवत में श्रीकृष्ण व सुदामा चरित्र का वर्णन करते हुए स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने इस संसार को सच्ची मित्रता का पाठ पढ़ाया है। यह बातें कथा वाचक आचार्य मनोज कृष्णा शास्त्री महाराज ने रविवार को खेड़ा हाथीपुर ग्रेटर नोएडा में श्री शिव हनुमत धाम नवग्रह मंदिर, पार्थ कृष्णम ज्योतिष, वास्तु एवं कर्मकाण्ड केंद्र खेड़ा हाथीपुर ग्रेटर नोएडा के पावन सानिध्य में आयोजित सात दिवसीय श्रीमद भागवत कथा के समापन पर कृष्ण-सुदामा की कथा सुनाते हुए कहीं।
कथा वाचक आचार्य मनोज कृष्णा शास्त्री महाराज ने कहा कि सुदामा गरीबी की मार झेल रहे थे। 
उनकी पत्नी सुशीला ने कहा स्वामी द्वारकाधीश आपके बचपन के मित्र है। आप उनके यहां जाएंगे, तो श्रीकृष्ण आपकी मदद जरूर करेंगे। पत्नी की बात सुन सुदामा ने कहा विपत्तियों में कहीं नहीं जाना चाहिए। अगर मैं वहां जाता हूं, तो मेरे पास कुछ ले जाने के लिए नही है। सुशीला पड़ोस के घर से दो मुठ्ठी चावल लेकर आती है और अपने आंचल में बांधकर सुदामा को देकर श्रीकृष्ण के पास भेजती है। द्वारपाल श्रीकृष्ण को बताते हैं कि एक भिखारी आया है। कह रहा है कि कृष्ण मेरा मित्र है और अपना नाम सुदामा बता रहा है। यह सुनते ही श्रीकृष्ण नंगे पांव दौड़ते हुए सुदामा के पास पहुंचे और गले लगा लिया। यह प्रसंग सुनकर कथा प्रांगण में बैठे श्रद्धालु भाव विभोर हो गए। कृष्णा शास्त्री जी ने कहा भक्त के जीवन में जो मिला है, उसे सहर्ष स्वीकार कर लेने की मस्ती होनी चाहिए, जब हम प्रत्येक परिस्थिति में आनंद लेना सीख लेंगे तो वह आनंद हमसे कोई नहीं छीन सकेगा। संसार में रहकर जब तक जीव अपनी लौकिक कामनाओं का त्याग नहीं करता है तब तक उसे शांति नहीं मिल सकती। इसलिए अगर इच्छा करनी ही है तो ईश्वर की करनी चाहिए। दूसरी इच्छा तो दुख की जननी है। ईश्वर की कृपा किसी पर कम या अधिक न होकर समान होती है, जब हमारी अपेक्षाएं, कामनाएं, एवं इच्छाएं बढ़ जाती है और उस कामनाओं की पूर्ति नहीं होती है तो हम कहते है कि परमात्मा की कृपा हम पर कुछ कम हो गई है। श्रीमद् भागवत के समापन पर विशान भंडारे का आयोजन भी किया गया। जिसमें हजारों श्रृद्धांलुओं ने पहुंचकर प्रसाद ग्रहण किया।
















