- देशभर के बुनकर और शिल्पकारों का संगम, परंपरा और संस्कृति की जीवंत झलक
- 25 मार्च से 7 अप्रैल तक हैंडलूम हाट में जुटे देश के कारीगर और बुनकर
- हस्तनिर्मित वस्त्र, शिल्प और पारंपरिक उत्पाद बने आकर्षण का केंद्र
- कारीगरों के सशक्तिकरण और स्वदेशी कला को बढ़ावा देने की अनूठी पहल
उदय भूमि संवाददाता
नई दिल्ली। भारत की समृद्ध हस्तनिर्मित परंपराओं, बुनकरों की रचनात्मकता और शिल्पकारों की पीढिय़ों से चली आ रही कला को राष्ट्रीय पहचान दिलाने के उद्देश्य से राजधानी दिल्ली में ‘गांधी बुनकर मेला 2026’ राष्ट्रीय हथकरघा प्रदर्शनी का भव्य आयोजन किया जा रहा है। असम एपेक्स वीवर्स एंड आर्टिसन्स सहकारी महासंघ लिमिटेड द्वारा आयोजित यह 14 दिवसीय आयोजन 25 मार्च से 7 अप्रैल 2026 तक जनपथ स्थित हथकरघा हाट में आयोजित हो रहा है, जहां देशभर के कारीगर अपनी कला और संस्कृति का जीवंत प्रदर्शन कर रहे हैं। राजधानी के हृदय स्थल पर आयोजित यह मेला केवल व्यापारिक प्रदर्शनी नहीं बल्कि भारत की सांस्कृतिक आत्मा का उत्सव बनकर उभरा है। यहां देश के विभिन्न राज्यों से आए बुनकर, शिल्पकार और हस्तकला विशेषज्ञ अपनी पारंपरिक कला, परिधान और शिल्प उत्पादों के माध्यम से भारतीय विरासत की विविधता को एक ही मंच पर प्रस्तुत कर रहे हैं। आयोजन स्थल पर प्रवेश करते ही रंग-बिरंगे वस्त्र, पारंपरिक डिज़ाइन, हस्तनिर्मित वस्तुएं और लोक कला की झलक भारत की सांस्कृतिक समृद्धि का जीवंत अनुभव कराती है।
इस राष्ट्रीय हथकरघा प्रदर्शनी में हस्तशिल्प वस्तुएं, हथकरघा से निर्मित वस्त्र, जूट से बने उत्पाद, पारंपरिक गृह सज्जा सामग्री, उपयोगी उपहार वस्तुएं और भारतीय परंपरा से प्रेरित परिधान प्रमुख आकर्षण बने हुए हैं। प्रत्येक उत्पाद अपने क्षेत्र की पहचान, इतिहास और स्थानीय जीवनशैली की कहानी कहता दिखाई देता है। कारीगरों द्वारा हाथों से तैयार किए गए ये उत्पाद केवल बाजार की वस्तुएं नहीं बल्कि मेहनत, अनुभव और सांस्कृतिक निरंतरता के प्रतीक हैं। गांधी बुनकर मेला को एक जीवंत सांस्कृतिक मंच के रूप में विकसित किया गया है, जहां शिल्प को केवल आर्थिक गतिविधि नहीं बल्कि परंपरा, पहचान और आजीविका से जोड़ा गया है। आयोजन का मुख्य उद्देश्य उन बुनकरों और शिल्पकारों को सशक्त बनाना है, जो वर्षों से पारंपरिक बुनाई, नक्काशी, सिलाई और हस्तनिर्माण की विधाओं को जीवित रखे हुए हैं। आधुनिकता के दौर में भी इन कलाकारों की कला भारतीय संस्कृति की जड़ों को मजबूत बनाए हुए है। प्रदर्शनी में आने वाले दर्शकों को शिल्प निर्माण की प्रक्रिया को करीब से देखने और समझने का अवसर भी मिल रहा है।
कई कारीगर अपने स्टॉल पर लाइव बुनाई और निर्माण प्रक्रिया का प्रदर्शन कर रहे हैं, जिससे लोगों को हस्तनिर्मित उत्पादों की वास्तविक मेहनत और कौशल का अनुभव हो रहा है। इससे युवा पीढ़ी में पारंपरिक कला के प्रति जागरूकता और सम्मान की भावना भी विकसित हो रही है। आयोजकों के अनुसार यह मेला कारीगरों के लिए आर्थिक सशक्तिकरण का महत्वपूर्ण माध्यम साबित हो रहा है। यहां सीधे ग्राहकों से जुडऩे का अवसर मिलने से बिचौलियों की भूमिका कम होती है और कारीगरों को उनकी मेहनत का उचित मूल्य मिल पाता है। साथ ही डिजाइन विशेषज्ञों, खरीदारों, सांस्कृतिक कार्यकर्ताओं और शिल्प प्रेमियों के बीच संवाद का भी अवसर उपलब्ध हो रहा है, जिससे पारंपरिक शिल्प को आधुनिक संदर्भ में नई पहचान मिल रही है।
गांधी बुनकर मेला भारतीय शिल्प को संग्रहालयों तक सीमित रखने की बजाय उसे जीवंत सामाजिक प्रक्रिया के रूप में प्रस्तुत करता है। यहां शिल्प केवल अतीत की विरासत नहीं बल्कि वर्तमान और भविष्य की रचनात्मक संभावनाओं का माध्यम बनकर सामने आ रहा है। आयोजन में शामिल कलाकारों का मानना है कि ऐसे राष्ट्रीय मंच उनकी कला को नई ऊर्जा देते हैं और युवा पीढ़ी को पारंपरिक व्यवसायों की ओर प्रेरित करते हैं। राजधानी दिल्ली में आयोजित यह राष्ट्रीय हथकरघा प्रदर्शनी भारतीय आत्मनिर्भरता, स्वदेशी भावना और सांस्कृतिक संरक्षण का सशक्त उदाहरण बनती दिखाई दे रही है। गांधी बुनकर मेला 2026 न केवल कारीगरों की प्रतिभा को राष्ट्रीय पहचान दे रहा है बल्कि भारतीय हस्तनिर्मित विरासत को वैश्विक स्तर पर स्थापित करने की दिशा में भी महत्वपूर्ण कदम साबित हो रहा है।

















