लेखक: अभिषेक राय
स्वतंत्र पत्रकार
भारत की रसोई कभी सिर्फ खाना पकाने की जगह नहीं थी, बल्कि यह प्रेम, अपनापन और खुशबू का केंद्र हुआ करती थी। यहां चूल्हे की आंच पर सिर्फ रोटियां नहीं सिकती थीं, बल्कि रिश्ते भी मजबूत होते थे। लेकिन आज वही रसोई एक चिंता का विषय बन गई है, जहां हर महीने बढ़ती महंगाई और गैस सिलेंडर की कीमतें आम आदमी की कमर तोड़ रही हैं। वर्ष 2014 में जहां एक एलपीजी सिलेंडर की कीमत लगभग 410 थी, वहीं आज यह 900 से 1050 के बीच पहुंच चुकी है। यानी कीमतें ढाई गुना तक बढ़ चुकी हैं, लेकिन आम आदमी की आय में वैसी कोई बढ़ोतरी नहीं हुई। यही असंतुलन आज देश के करोड़ों परिवारों की सबसे बड़ी समस्या बन चुका है। सरकार द्वारा शुरू की गई उज्ज्वला योजना निश्चित रूप से एक सराहनीय पहल थी, जिसके तहत गरीब महिलाओं को मुफ्त गैस कनेक्शन दिया गया। इस योजना ने लाखों घरों को धुएं से मुक्ति दिलाने का रास्ता दिखाया। लेकिन जब सिलेंडर भरवाने की कीमत 900 या उससे अधिक हो, तो यह कनेक्शन कई परिवारों के लिए बेकार साबित हो रहा है। यही कारण है कि आज बड़ी संख्या में महिलाएं फिर से लकड़ी और कोयले के चूल्हे पर लौटने को मजबूर हैं।

महंगाई का असर केवल गैस सिलेंडर तक सीमित नहीं है। रसोई में इस्तेमाल होने वाली हर चीज – दाल, तेल, आटा, सब्जियां – सबकी कीमतें लगातार बढ़ रही हैं। एक मध्यमवर्गीय परिवार का मासिक खर्च पिछले तीन वर्षों में लगभग 30 से 40 प्रतिशत तक बढ़ चुका है, जबकि वेतन वृद्धि बहुत ही सीमित रही है। इसका सीधा असर परिवार के बजट पर पड़ रहा है, जहां हर महीने खर्च और आमदनी के बीच का अंतर बढ़ता जा रहा है। आज हालात ऐसे हैं कि एक रिक्शा चालक, जो दिनभर मेहनत करके 300-400 कमाता है, उसे यह सोचने पर मजबूर होना पड़ता है कि वह गैस सिलेंडर भरवाए या अपने बच्चों की स्कूल फीस जमा करे। वहीं एक गृहिणी के सामने यह सवाल खड़ा होता है कि इस महीने रसोई का खर्च चलाया जाए या घर में किसी बीमार सदस्य की दवा खरीदी जाए। यह समस्या किसी एक वर्ग या क्षेत्र तक सीमित नहीं है। यह देश के करोड़ों परिवारों की सच्चाई है, जो हर दिन इन कठिन परिस्थितियों का सामना कर रहे हैं। महंगाई केवल एक आर्थिक आंकड़ा नहीं है, बल्कि यह उन सपनों पर लगी आग है, जिन्हें लोग अपने परिवार के बेहतर भविष्य के लिए संजोते हैं।
इन परिस्थितियों को कुछ पंक्तियां बेहद मार्मिक ढंग से व्यक्त करती हैं:-
“दाल की क़ीमत सुन के आँखें नम हो जाती हैं,
तेल-मसाले छोड़ के रोटियाँ कम हो जाती हैं।
पहले भूख से लड़ते थे, अब दाम से लड़ते हैं,
ज़िंदगी की जंग में हर रोज़ थम हो जाते हैं।।
यह पंक्तियां उस दर्द को दर्शाती हैं, जिसे शब्दों में पूरी तरह व्यक्त करना मुश्किल है। ऐसे में सरकार की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है। यह लेख किसी प्रकार की आलोचना नहीं, बल्कि एक आईना है, जिसमें आम जनता की परेशानियां स्पष्ट रूप से दिखाई देती हैं। सरकार के पास कई नीतिगत विकल्प मौजूद हैं, जिनके माध्यम से इस समस्या को कम किया जा सकता है। सबसे पहले, एलपीजी पर दी जाने वाली सब्सिडी को पुनः प्रभावी रूप से लागू किया जा सकता है, ताकि गरीब और मध्यम वर्ग को सीधी राहत मिले। इसके अलावा गैस पर लगने वाले जीएसटी में कमी भी एक बड़ा कदम साबित हो सकता है। जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल और गैस की कीमतों में गिरावट आती है, तो उसका लाभ तुरंत घरेलू उपभोक्ताओं तक पहुंचाना भी आवश्यक है। उज्ज्वला योजना की वास्तविक स्थिति का आकलन कर यह सुनिश्चित करना जरूरी है कि जिन लोगों को कनेक्शन मिला है, वे उसका उपयोग भी कर पा रहे हैं या नहीं।
यदि नहीं, तो उनके लिए विशेष सहायता या सब्सिडी की व्यवस्था की जानी चाहिए। दीर्घकालिक समाधान के रूप में सौर ऊर्जा और बायोगैस जैसे विकल्पों को ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में बढ़ावा देना बेहद जरूरी है। इससे न केवल रसोई गैस पर निर्भरता कम होगी, बल्कि पर्यावरण संरक्षण में भी मदद मिलेगी। इसके साथ ही जमाखोरी और मुनाफाखोरी पर कड़ी कार्रवाई भी आवश्यक है, ताकि कृत्रिम रूप से बढ़ाई गई कीमतों पर अंकुश लगाया जा सके। एक सशक्त और विकसित राष्ट्र वही होता है, जहां समाज के अंतिम व्यक्ति तक विकास का लाभ पहुंचे। जब एक मां की रसोई का चूल्हा आसानी से जलता है, तभी देश की प्रगति स्थायी और सार्थक मानी जा सकती है। नीतियां बनाते समय उन करोड़ों परिवारों की आवाज को सुनना जरूरी है, जो संसद की बहसों में नहीं, बल्कि अपनी रसोई की चिंताओं में हर दिन संघर्ष कर रहे हैं। अंत में, इन भावनाओं को कुछ पंक्तियों में इस तरह व्यक्त किया जा सकता है जो आग रसोई में जलती है वो रोटी देती है, जो आग महंगाई में जलती है वो आँसू देती है। हे सरकार! बुझाओ वो आग जो घर जलाती है, और जलाओ वो दीया जो हर घर में उजाला लाती है। यह केवल एक लेख नहीं, बल्कि उन लाखों-करोड़ों परिवारों की आवाज है, जो उम्मीद करते हैं कि उनकी रसोई फिर से खुशियों और सुकून की जगह बन सके।