-अवैध शराब के खिलाफ बहुआयामी कार्रवाई सड़क, गोदाम, लाइसेंसी दुकान से लेकर ताले लगे प्लांट्स तक पर निगरानी
-गुप्त मुखबिर तंत्र के जरिए माफियाओं की जड़ें उखाडऩे की मुहिम तेज
उदय भूमि संवाददाता
गौतमबुद्ध नगर। अवैध शराब के कारोबार पर अब जि़ले की जमीन भी तंग पडऩे लगी है न सड़कें सुरक्षित हैं, न गोदाम, और न ही वे फैक्ट्रियां जो सालों से वीरान पड़ी थीं। आबकारी विभाग अब अपने पारंपरिक दायरे से बाहर निकलकर उन अंधेरे कोनों में घुस गया है, जहां ताले की ओट में जहर की बोतलें पाली जा रही थीं। इस बार लड़ाई सिर्फ बाजार में बिकती शराब से नहीं, बल्कि उन छिपे हुए तंत्रों से है जो समाज को भीतर से खोखला कर रहे हैं। जिला आबकारी अधिकारी सुबोध कुमार श्रीवास्तव के नेतृत्व में शुरू हुई इस सघन मुहिम ने माफियाओं की नींद उड़ा दी है। सड़क पर दौड़ती संदिग्ध गाडिय़ों से लेकर भीतर से जड़ी जर्जर फैक्ट्रियों तक हर वह जगह अब जांच के घेरे में है जहाँ कभी शराब की एक बूंद भी बहाई गई हो। यह अभियान केवल कार्रवाई नहीं, एक संदेश है कि प्रशासन अब माफियाओं की चाल से एक कदम आगे है, और कानून की नजरें अब उन दरवाजों तक भी पहुंच चुकी हैं, जिन्हें माफिया हमेशा से ‘बंद’ समझते रहे।
आबकारी विभाग की यह रणनीति सिर्फ एक अभियान नहीं, बल्कि उस सिस्टम को दुरुस्त करने की कोशिश है, जिसे माफिया वर्षों से गुमराह करते रहे हैं। जनता के स्वास्थ्य, सुरक्षा और कानून के सम्मान को प्राथमिकता देने वाला यह कदम, निश्चित ही आने वाले समय में गौतमबुद्ध नगर को एक ‘मॉडल जिला’ बना सकता है जहां कानून ताले से नहीं डरता, और तस्कर अब ताले में बंद होते हैं। इन टीमों ने न केवल सड़कों पर गाडिय़ों की जांच की, बल्कि उन इलाकों में भी दबिश दी जहाँ अवैध शराब के स्टॉक और निर्माण की संभावना जताई जा रही थी। खासतौर पर बंद पड़ी फैक्ट्रियों और संदिग्ध परिसरों को निशाने पर लेते हुए तलाशी अभियान चलाया गया। अधिकारियों के अनुसार, माफिया अक्सर ऐसी फैक्ट्रियों में बाहर से ताला लगाकर भीतर अवैध शराब का स्टॉक जमा करते हैं और निर्माण करते हैं, जिससे विभाग ने पहले ही निपटने की रणनीति बना रखी है।
ताले में बंद जाल, जिसे अब खोला जा रहा है
बीते दिनों के दौरान, जिला आबकारी विभाग ने एक नई रणनीति पर काम शुरू किया उन फैक्ट्रियों और बंद परिसरों को चिन्हित करना जो कई वर्षों से निष्क्रिय हैं, लेकिन जिन पर बार-बार शराब माफियाओं के इस्तेमाल की आशंका जताई जा रही थी। इन फैक्ट्रियों पर अक्सर बाहर से बड़ा सा ताला लटका होता है, लेकिन भीतर अवैध शराब की बोतलें भरी जा रही होती हैं, या गैरकानूनी स्टॉक जमा होता है। ऐसे ही स्थलों पर अब बिना पूर्व सूचना के दबिशें दी जा रही हैं और कई स्थानों पर सुराग भी मिले हैं, जिनकी जांच जारी है।
हर मोर्चे पर हमला सड़क, दुकान और प्लांट कोई सुरक्षित नहीं
अभियान केवल फैक्ट्रियों तक ही सीमित नहीं है। इंस्पेक्टर आशीष पांडे, डॉ. शिखा ठाकुर, अखिलेश वर्मा, अभिनव शाही, संजय चंद्र और सचिन त्रिपाठी जैसे अनुभवी अधिकारियों की टीमों ने एक साथ कई फ्रंट पर काम शुरू किया है। रोड चेकिंग अभियान के तहत वाहनों की गहन तलाशी,
लाइसेंसी दुकानों पर अचानक निरीक्षण गुणवत्ता व दरों की जांच, टेस्ट परचेजिंग की प्रक्रिया जिससे नकली या ओवररेटेड बिक्री पकड़ी जा सके, रात के समय संदिग्ध गोदामों पर दबिश ताकि माफिया की रात की गतिविधियों को रोका जा सके।
रणनीति की रीढ़ बना है मुखबिर नेटवर्क
इस पूरे अभियान की सबसे बड़ी ताकत बन रहा है आंतरिक मुखबिर तंत्र, जिसे आबकारी विभाग ने हाल के महीनों में बेहद मजबूत किया है। अब हर कस्बे और संभावित जोन में विभाग के पास कुछ ऐसे लोगों की टीम है जो गुप्त सूचनाएं दे रही हैं, जिससे कई माफियाओं की गतिविधियां पहले ही ट्रेस हो पा रही हैं।
जांच के घेरे में लाइसेंसी दुकानों की भी भूमिका
आबकारी विभाग ने स्पष्ट किया है कि केवल माफिया ही नहीं, बल्कि वे वैध लाइसेंसधारी भी जांच के घेरे में हैं जो नियमों की आड़ में कालाबाजारी या ओवररेटिंग करते हैं। इन पर ‘डमी ग्राहक’ भेजे जा रहे हैं, जो चुपचाप शराब खरीदते हैं और रेट, बिल, ब्रांड व व्यवहार का मूल्यांकन करते हैं।
माफिया के पास अब नहीं बचा कोई कोना
जिला आबकारी अधिकारी श्री सुबोध कुमार श्रीवास्तव ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि यह अभियान केवल एक कार्रवाई नहीं, बल्कि एक नियंत्रण नीति है जो अब जनपद में स्थायी रूप से लागू रहेगी। उनका कहना है अब शराब माफिया को कहीं पनाह नहीं मिलेगी। हम फैक्ट्री से फुटपाथ तक हर ठिकाने को उजागर करेंगे।


















