-जालौन के एसडीएम न्यायिक ने डीएम, फर्जी निस्तारण, अवैध कब्जों और जनता दर्शन की कार्यप्रणाली पर उठाए सवाल; आधा वेतन लेने और कैडर बदलने तक की मांग की
उदय भूमि संवाददाता
जालौन। उत्तर प्रदेश की ब्यूरोक्रेसी में इन दिनों एक छह पन्नों की चिट्ठी चर्चा का सबसे बड़ा विषय बनी हुई है। जालौन में एसडीएम न्यायिक के पद पर तैनात आईएएस रिंकू सिंह राही द्वारा लिखे गए इस पत्र ने प्रशासनिक व्यवस्था, अधिकारियों की कार्यशैली और सरकारी सिस्टम की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। पत्र में उन्होंने दावा किया है कि ईमानदारी से काम करना लगातार कठिन होता जा रहा है और कई बार अधिकारियों को सरकारी रैंकिंग बनाए रखने के लिए ऐसे निर्णय लेने का दबाव झेलना पड़ता है, जो उनकी अंतरात्मा के खिलाफ होते हैं। रिंकू सिंह ने अपने पत्र में लिखा है कि आम जनता के हित और सरकारी कार्यों की निरंतरता बनाए रखने के लिए उन्होंने कई बार व्यक्तिगत मान्यताओं के विपरीत व्यावहारिक संतुलन बनाने की कोशिश की। उनका आरोप है कि एक बैठक में विधायक गौरी शंकर वर्मा की मौजूदगी में जिलाधिकारी ने तहसील क्षेत्र में अवैध कब्जों और अतिक्रमण के मामलों में कार्रवाई न करने के निर्देश दिए। उन्होंने बताया कि उन्होंने पूरी तरह आदेश मानने के बजाय केवल प्राप्त शिकायतों पर नियमानुसार कार्रवाई शुरू की, लेकिन इसके बाद शिकायतों की संख्या बढ़ने लगी और कई मामलों में फर्जी निस्तारण होने लगा।
पत्र में उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि जनपद की रैंकिंग बेहतर बनाए रखने के लिए आईजीआरएस और एंटी भू-माफिया पोर्टल पर दर्ज शिकायतों के फर्जी निस्तारण को स्वीकार करने का दबाव बनाया गया। उन्होंने दावा किया कि उन्होंने इसका वैकल्पिक समाधान सुझाया, लेकिन उसे स्वीकार नहीं किया गया। रिंकू सिंह ने एक अन्य प्रकरण का भी उल्लेख किया है। उनके अनुसार, कैबिनेट मंत्री स्वतंत्र देव सिंह के नाम का हवाला देकर अवैध कब्जे की जांच को लेकर ब्लॉक प्रमुख रामराजा निरंजन द्वारा विवाद खड़ा किया गया, जिसके बाद उनका तबादला कर दिया गया। उन्होंने लिखा कि यदि एक ईमानदार पृष्ठभूमि वाले अधिकारी को ऐसे परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं, तो अन्य अधिकारियों और कर्मचारियों की स्थिति कितनी चुनौतीपूर्ण होगी, इसका सहज अनुमान लगाया जा सकता है।
पत्र का सबसे चर्चित हिस्सा उनका वेतन संबंधी अनुरोध है। उन्होंने लिखा कि एसडीएम न्यायिक के रूप में उन्हें प्रतिदिन लगभग दो घंटे न्यायालय में कार्य करना पड़ता है, जबकि फाइलों के अध्ययन और कानूनी प्रक्रिया में लगभग चार घंटे लगते हैं। यदि सरकारी मानकों के अनुसार आठ घंटे की ड्यूटी मानी जाए, तो वे केवल आधा कार्य ही कर पा रहे हैं। इसलिए उन्होंने स्वयं अनुरोध किया है कि उन्हें फिलहाल आधा वेतन ही दिया जाए। उन्होंने जिलाधिकारी के जनता दर्शन कार्यक्रम पर भी सवाल उठाए हैं। पत्र में लिखा गया है कि जनता दर्शन में अधिकारियों को जिलाधिकारी के साथ बैठना पड़ता है, लेकिन शिकायतों के वास्तविक समाधान के बजाय केवल निस्तारण का दिखावा होता है। ऐसी स्थिति में वहां बैठना उनकी अंतरात्मा को स्वीकार नहीं है और यह स्वयं को धोखा देने जैसा महसूस होता है।
रिंकू सिंह ने अपने प्रशासनिक भविष्य को लेकर भी चिंता व्यक्त की है। उन्होंने लिखा कि सेवा के शुरुआती दौर में यदि उन्हें किसी तहसील में नियमित एसडीएम के रूप में कार्य करने का अवसर नहीं मिलेगा तो आगे चलकर सीडीओ, नगर आयुक्त और जिलाधिकारी जैसे महत्वपूर्ण पदों के लिए उनकी प्रशासनिक क्षमता का सही मूल्यांकन प्रभावित हो सकता है। पत्र के अंत में उन्होंने शासन से अनुरोध किया है कि यदि उनके कार्य में कोई त्रुटि रही हो तो नियमानुसार जांच कर उन्हें दंडित किया जाए। दंड प्रक्रिया पूरी होने के बाद उन्हें सीखने और बेहतर कार्य करने का अवसर देते हुए जालौन की किसी तहसील में नियमित एसडीएम के रूप में तैनात किया जाए।
यदि यह संभव न हो तो उनका कैडर परिवर्तन कराने की अनुमति और संस्तुति दी जाए। उन्होंने यह भी लिखा है कि इस संबंध में अंतिम निर्णय होने तक 22 जुलाई 2026 से उन्हें आधा वेतन ही दिया जाए। आईएएस रिंकू सिंह राही की इस चिट्ठी ने प्रदेश की नौकरशाही में नई बहस छेड़ दी है। एक ओर इसे सरकारी व्यवस्था के भीतर की चुनौतियों को उजागर करने वाला दस्तावेज माना जा रहा है, वहीं दूसरी ओर प्रशासनिक हलकों में इसे लेकर व्यापक चर्चा जारी है। अब सभी की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि शासन और संबंधित अधिकारी इस पत्र पर क्या रुख अपनाते हैं और आगे क्या कार्रवाई होती है।



















