कवि नगर रामलीला में वनवास प्रस्थान का दृश्य भाव-विभोर, डॉ. आशुतोष त्रिपाठी की ‘राम वनगमन पथ’ प्रदर्शनी रही आकर्षण का केंद्र

-रामलीला में राजा दशरथ का स्वर्ग सिधारना, माताओं का करुण रुदन और दर्शकों का जय श्रीराम उद्घोष; पुस्तक ने नई पीढ़ी को भारतीय संस्कृति और आस्था से जोड़ा

उदय भूमि संवाददाता
गाजियाबाद। कवि नगर में चल रही भव्य रामलीला में उस समय पूरा वातावरण भाव-विभोर हो उठा जब मंच पर भगवान श्रीराम के वनवास प्रस्थान का अद्भुत दृश्य प्रस्तुत किया गया। राजा दशरथ पुत्र वियोग सह न सके और स्वर्ग सिधार गए, माताएँ करुण रुदन में डूब गईं और पूरा राजदरबार शोक में विलीन हो गया। दर्शक इस दृश्य को देखकर भावुक हो उठे और जय श्रीराम के उद्घोष से वातावरण गूंज उठा। इस अवसर पर श्री रामलीला धार्मिक समिति द्वारा आयोजित पंडाल में विख्यात विद्वान लेखक डॉ. आशुतोष त्रिपाठी की प्रदर्शनी विशेष आकर्षण का केंद्र रही। डॉ. त्रिपाठी, जो वर्तमान में दिल्ली विश्वविद्यालय के रामजस कॉलेज में अतिथि प्राध्यापक हैं, वर्षों से कवि नगर रामलीला में आमंत्रित किए जाते रहे हैं। उन्होंने अपनी चर्चित कृति राम वनगमन पथ – आस्था और इतिहास का संगम का प्रदर्शन किया। इस पुस्तक के सहलेखक मंडली में निरंजन यादव, मनीष साहू और अभिषेक तिवारी भी सम्मिलित हैं।

डॉ. त्रिपाठी ने इस अवसर पर पुस्तक की प्रति श्री रविंद्र तिवारी और उनकी पत्नी श्रीमती अनीता तिवारी को भेंट की। यह उनके लिए और भी गौरव का क्षण था क्योंकि रविंद्र तिवारी जी अयोध्या की पावन धरती से आते हैं और वर्तमान में गाजियाबाद में रहते हुए सांस्कृतिक एवं धार्मिक मूल्यों के संवर्धन में सक्रिय योगदान दे रहे हैं। यह कृति अयोध्या से लेकर नासिक, चित्रकूट, पंचवटी और रामेश्वरम तक प्रभु श्रीराम के वनगमन मार्ग का ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और धार्मिक विश्लेषण प्रस्तुत करती है। पुस्तक न केवल आस्था को पुष्ट करती है बल्कि नई पीढ़ी को भारतीय संस्कृति से जोडऩे का एक अद्वितीय प्रयास भी है।

उपस्थित श्रद्धालुओं और विद्वानों ने डॉ. त्रिपाठी एवं उनकी टीम की मेहनत, लगन और विद्वता की प्रशंसा की। लोगों ने कहा कि ऐसी कृति हर घर-परिवार में अवश्य होनी चाहिए ताकि बच्चे प्रभु श्रीराम के आदर्शों, त्याग और जीवन यात्रा से परिचित हो सकें। रामलीला समिति ने भी प्रदर्शनी की सराहना करते हुए कहा कि इस प्रकार के आयोजन और साहित्यिक प्रयास समाज को न केवल धार्मिक आस्था से जोड़ते हैं बल्कि भारतीय संस्कृति की जड़ों को और भी मजबूत करते हैं। कवि नगर रामलीला में ‘राम वनगमन पथ’ प्रदर्शनी ने यह सिद्ध कर दिया कि प्रभु श्रीराम का जीवन केवल आस्था का विषय नहीं, बल्कि इतिहास, संस्कृति और आदर्शों का वह पथ है, जिस पर चलकर मानवता अपना वास्तविक उत्थान कर सकती है।