संसद में संग्राम : आखिर जिम्मेदार कौन ?

संसद में जारी गतिरोध दूर नहीं हो पाया है। संसद का मानसून सत्र हंगामे की भेंट चढ़ता नजर आ रहा है। विपक्ष के अड़ियल रूख के कारण स्थिति जस की तस है। ऐसे में काम कम और बखेड़ा ज्यादा हो रहा है। संसद की कार्रवाई में निरंतर व्यवधान का बड़ा खामियाजा भुगतना पड़ रहा है। सरकारी खजाने को अब तक सवा सौ करोड़ से ज्यादा का नुकसान हो चुका है। यह धनराशि टैक्स की एवज में प्राप्त हुई थी।

केंद्र सरकार और विपक्षी दलों के बीच विभिन्न मुद्दों पर तकरार चल रही है। इसके चलते दोनों पक्ष आमने-सामने हैं। यह विवाद सड़क से संसद तक पहुंच चुका है। नतीजन लोकसभा और राज्य सभा दोनों में काम-काज पर प्रतिकूल असर पड़ा है। सांसद के मानसून सत्र की शुरुआत 19 जुलाई को हुई थी। मौजूदा सत्र 13 अगस्त तक चलना है। इस अवधि में संसद के दोनों सदन में ठीक से काम नहीं हो पाया है। चर्चित पेगासस जासूसी प्रकरण और नए कृषि कानूनों पर चर्चा कराने की जिद पर विपक्ष अड़ा है। इसके लिए सत्ता पक्ष कतई राजी नहीं है। अलबत्ता विवाद निपटने के कोई आसार दिखाई नहीं दे रहे हैं। हंगामे की वजह से संसद की कार्रवाई सिर्फ 18 घंटे चल पाई है। जबकि कार्रवाई के लिए 107 घंटे निर्धारित थे। यानी संसद के मानसून सत्र में 89 घंटे सिर्फ शोर-शराब पर खर्च हो चुके हैं। लोकतंत्र के लिए यह अच्छे संकेत नहीं हैं।

विपक्ष का साफ कहना है कि पेगासस जासूसी प्रकरण पर पहले चर्चा कराने के लिए सरकार को तैयार होना होगा। इसके बाद संसद में गतिरोध समाप्त हो सकता है। संसदीय कार्य मंत्री प्रहलाद जोशी ने विपक्ष की इस डिमांड को सिरे से खारिज कर चुके हैं। संसदीय कार्य मंत्री जोशी ने कहा है कि यह कोई मुद्दा नहीं है, जिस पर अलग से चर्चा कराई जाए। पेगासस जासूसी मामला प्रकाश में आने के बाद समूचा विपक्ष आक्रामक मुद्रा में है। आरोप है कि विपक्षी नेताओं, कुछ मंत्रियों व वरिष्ठ पत्रकारों आदि के फोन की जासूसी कराई गई है। फोन टेपिंग कराने में इजराइल की कंपनी का नाम सामने आया है। हालाकि सरकार का कहना है कि पेगासस जासूसी प्रकरण को बेवजह उछाल कर देश की छवि को खराफ करने के अलावा लोकतंत्र को कमजोर किए जाने की साजिश हो रही है। सरकार ने इस मामले में अपनी किसी प्रकार की भूमिका से साफ इंकार किया है। इसके बावजूद विपक्ष शांत होने का नाम नहीं ले रहा है।

दूसरा मुद्दा किसान आंदोलन से जुड़ा है। केंद्र सरकार द्वारा 3 नए कृषि कानून लागू किए गए हैं। इन कानूनों का पुरजोर विरोध हो रहा है। लंबे समय से सैकड़ों की संख्या में किसान कृषि कानूनों के खिलाफ दिल्ली में आंदोलन कर रहे हैं। विपक्ष ने किसानों के मुद्दे पर भी संसद में चर्चा की मांग उठाई है। जबकि सरकार काफी पहले कह चुकी है कि कृषि कानूनों में संशोधन संभव है, मगर इन्हें वापस लेने का सवाल नहीं उठता। पेगासस जासूसी प्रकरण और नए कृषि कानूनों पर चर्चा की जिद पर अडिग विपक्ष संसद की कार्रवाई में बार-बार व्यवधान उत्पन्न कर रहा है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी विपक्ष की कड़ी आलोचना कर चुके हैं। पीएम मोदी ने भाजपा के सभी सांसदों से विपक्ष के इस व्यवहार को जनता से अवगत कराने का आह्वान किया है। संसद का मानसून सत्र समापन की ओर बढ़ रहा है, मगर सत्ता पक्ष और विपक्ष में कोई सुलह होने के संकेत नहीं मिल रहे हैं। संसद का समय बेशकीमती होता है। यह बात विपक्ष भी भली-भांति जानता है। संसद की कार्रवाई में रूकावट के कारण सवा सौ करोड़ से ज्यादा की क्षति होने के बाद भी विपक्ष कुछ सुनने को तैयार नहीं है। देश को इस समय अलग-अलग चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। कुछ चुनौती आंतरिक तो कुछ बाहरी हैं। जिनसे निपटने के लिए संसद में चर्चा होना जरूरी है।

देश में कोविड-19 (कोरोना संक्रमण) की तीसरी लहर आने की संभावना दिन-प्रतिदिन बढ़ रही है। कोरोना संक्रमण की पहली और दूसरी लहर का प्रकोप देशवासी देख चुके हैं। संभावित तीसरी लहर कितनी खतरनाक होगी, इसे लेकर महज अनुमान लगाए जा रहे हैं। इसके अलावा लद्दाख क्षेत्र में चीन ने मुश्किलें खड़ी कर रखी हैं। बेवजह सीमा विवाद उत्पन्न कर चीन भारतीय भूमि पर कब्जा करने की मंशा पाले है। दोनों देशों में कई दौर की वार्ता होने के बाद भी समस्या का कोई समाधान नहीं निकल पाया है। इसी प्रकार अफगानिस्तान में तेजी से हालात बदल रहे हैं।

अफगानिस्तान में तालिबान राज लौटने की संभावना निरंतर बढ़ रही है। भविष्य की चुनौतियों से निपटने के लिए चीन, रूख और पाकिस्तान जैसे देश खुद को सुरक्षित रखने की रणनीति पर काम कर रहे हैं, मगर भारत पसोपेश की स्थिति में है। काबुल की सत्ता तालिबान के हाथ में आने पर भारत की टेंशन बढ़ना लाजमी है। इसके मद्देनजर अभी से आवश्यक रणनीति बनाकर काम करने की जरूरत है।

अलबत्ता संसद में चीन, कोरोना संक्रमण की संभावित तीसरी लहर और अफगानिस्तान को लेकर भविष्य की रणनीति पर चर्चा होनी चाहिए, मगर ऐसा होता दिखाई नहीं दे रहा है। इसके अतिरिक्त जनहित से जुड़े कुछ महत्वपूर्ण मुद्दे भी संसद से पास होने की बाट जोह रहे हैं। देश के समक्ष उत्पन्न मौजूदा चुनौतियों से विपक्ष को आंखें मूंद कर नहीं बैठना चाहिए। सिर्फ विरोध के लिए विरोध करने की नीति देश और समाजहित में अच्छी नहीं है। सत्ता पक्ष और विपक्ष को गतिरोध दूर करने के लिए एक मंच पर आकर शांतिपूर्ण तरीके से बातचीत कर मुद्दों को हल करना चाहिए। यह सभी के हित में होगा।