चालबाज चीन की चालाकी एक बार फिर दुनिया के सामने आ गई है। आर्थिक मदद के बहाने वह छोटे एवं गरीब देशों को अपने चक्रव्यूह में फंसाने में निरंतर सफल हो रहा है। कोई देश जब तक चीन के कुटील इरादे को भांप पाता है, तब तक काफी देर हो चुकी होती है। यह सिलसिला लंबे समय से जारी है। गरीब देशों को कर्ज के मकड़जाज में फंसाने में ड्रैगन कामयाब हो रहा है। ताजा मामला अफ्रीकी देश युगांडा का सामने आया है। युगांडा के पास एकमात्र अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा है। यह हवाई अड्डा भी अब चीन के कब्जे में आने जा रहा है। युगांडा की सरकार को चीन से आर्थिक सहायता लेना भारी पड़ गया है। युगांडा सरकार को अब नागरिकों की आलोचना का शिकार होना पड़ रहा है।
चीन की दो गलत नीतियों की हमेशा आलोचना होती है। पहली विस्तारवार की नीति है। इसके जरिए वह दूसरे देशों की जमीन पर ताकत के बल पर अपना अधिकार जमाने और कब्जा करने की कोशिश करता रहता है। दूसरी नीति कर्ज देकर जरूरतमंद देशों के संसाधनों पर कब्जा करने की है। ड्रैगन की इन दोनों नीतियों को जो देश जान नहीं पाता, वह अक्सर मुश्किल में फंस जाता है। भारत के साथ भी चीन का लंबे समय से सीमा विवाद जगजाहिर है। युगांडा से पहले श्रीलंका भी चीन के जाल में बुरी तरह फंस चुका है। ड्रैगन एक सोची समझी रणनीति के तहत विकासशील देशों को पहले विकास का झूठा आइना दिखता है और बाद में उन प्रोजेक्ट्स को साकार करने के लिए उन्हीं देशों को उच्च ब्याज दरों पर ऋण देता है।
जब संबंधित देश चीन के कर्ज का भुगतान नहीं कर पाते हैं तो चीन इसका इस्तेमाल उन देशों के व्यापारिक एवं रणनीतिक परिसंपत्तियों को जब्त करने में करता है। ऐसे देशों की एक लंबी सूची है, जिन्होंने इस तरह के प्रोजेक्ट्स के लिए चीन से महंगा कर्ज लिया है। वह देश अब इसका भुगतान नहीं कर पा रहे हैं। दक्षिण अमेरिका में अर्जेंटीना, इक्वाडोर और वेनेजुएला जैसी कमजोर अर्थव्यवस्था वाले कुछ लैटिन अमेरिकी देशों ने चीन से भारी ऋण ले रखा है। वेनेजुएला आज लगभग एक चीनी उपनिवेश बन गया है। वर्तमान में यह चीन-अमरीका विवाद के कुछ प्रमुख कारणों में से एक है। चीन की चालबाजी से पाकिस्तान भी अछूता नहीं है।
पाकिस्तान जिसे अपना छोटा भाई बताते नहीं थकता है, वह उसे कर्ज के जाल में बुरी तरह फांस चुका है। पाकिस्तान को सिर्फ सीपीईएस से जुड़ी योजनाओं की एवज में 2024 के अंत तक विभिन्न चीनी वित्तीय संस्थानों को 100 बिलियन अमेरिकी डॉलर से अधिक का भुगतान करना पड़ेगा जो कि असंभव लगता है। पाकिस्तान अभी से अपने 2 प्रमुख द्वीपों और एक महत्वपूर्ण खनन परियोजना को चीन के हवाले कर चुका है। इसके अलावा वह समूचे ग्वादर टाउनशिप, ग्वादर पोर्ट और कुछ अन्य स्थानों को चीन को सौंपने की प्रक्रिया में है, जिसमें जीवानी स्थित द्वितीय विश्व युद्ध कालीन नौसेना का बंदरगाह भी शामिल है। चीन के पास समूची दुनिया से डाटा चोरी करने की क्षमता है।
साथ ही वह नागरिकों को फंसाने के लिए रकम का इस्तेमाल करता है। एडडाटा रिसर्च लैब की रिपोर्ट बताती है कि चीन ने पिछले अट्ठारह साल के भीतर 165 देशों में 843 अरब डालर की 13,427 परियोजनाओं में निवेश किया है। इसमें से ज्यादातर पैसा चीन के राष्ट्रपति शी चिनफिंग की महत्वाकांक्षी बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (बीआरआई) की परियोजनाओं से जुड़ा है। दो दशक पहले चीन खुद अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों से कर्ज लेने वाला देश था। आज दुनियाभर में परियोजनाओं में निवेश के मामले में यह अमेरिका से आगे निकल गया है। चीन कम आय वाले मध्य एशिया की दिशा के लिए खतरनाक परिणाम लाया है।
चीन की कंपनियों ने किर्गिस्तान और तजाकिस्तान में खनन के अधिकार हासिल कर लिए हैं, क्योंकि यह देश चीन का कर्ज सधाने में असमर्थ है। तजाकिस्तान चीन की इलेक्ट्रिक अपारेट्स स्टॉक कंपनी लिमिटेड (टीबीईए) ने सुगड प्रोविंस में सोने की खदान अपर कुमार्ग को विकसित करना शुरू कर दिया है। इसके पहले कंपनी की पहुंच डुओब सोने की खदान तक थी और यह भी सुगड प्रोविंस में ही पड़ता है। दोनों पक्षों में हुए समझौते के मुताबिक टीबीईए को दोनों खदानों से महंगे धातु के खनन की इजाजत होगी, जब तक कि ताजिक पक्ष दुशांबे-दो में ताप और बिजलीघर परियोजना के निर्माण में लगे धन को वापस नहीं कर देता है।
भारत ने काफी पहले चीन के कुटिल इरादों को भांप लिया था। इसलिए भारत ने चीन की महत्वाकांक्षी परियोजना सीपीईसी से दूरी बना ली। हालाकि चीन चाहता था कि भारत भी इस प्रोजेक्ट का हिस्से बने, मगर नई दिल्ली की कुछ आशंकाओं को दूर करने में बीजिंग नाकाम रहा था। इसके चलते भारत ने चीन को कोई तवज्जो नहीं दी। नतीजन यह निकला कि चीन ने भारत के साथ बेवजह का सीमा विवाद पैदा कर दिया। हालाकि उसे इसका मुंहतोड़ जबाव भी मिल रहा है। केंद्र सरकार ने ड्रैगन के खिलाफ बेहद सख्त रूख अपना रखा है।
उसके कई विवादित मोबाइल ऐप तक देश में प्रतिबंधित कर दिए गए हैं। भारत के साथ विवाद खड़ा करने के चक्कर में बीजिंग को खासा नुकसान भी उठाना पड़ रहा है। चाइना की कई नामचीन कंपनियों का कारोबार बुरी तरह प्रभावित हुआ है। इन कंपनियों को अब पहले के मुकाबले मोटे ऑर्डर नहीं मिल रहे हैं। भारत के अलावा अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया भी चीन की चालबाजी को लेकर बेहद सतर्क नजर आ रहे हैं। अमेरिका बार-बार चीन के मंसूबों को लेकर पूरी दुनिया को सतर्क कर रहा है। इसके बावजूद कुछ देश आंखों पर पट्टी बांधकर बीजिंग की बातों में यकीन कर खुद को मुश्किल में डालने से बाज नहीं आ रहे हैं।















