बेटी टेंशन नहीं बल्कि टेन सन के बराबर: डा.वंदना शर्मा

बरेली कालेज की चीफ प्राक्टर ने महिलाओं से किया बदलने का आह्वान

आजादी पर महिलाओं का स्वाभाविक हक, पुरुष आजादी देने वाले कौन

नजदीकी रिश्तेदार होते हैं महिला अपराधों के 80 फीसद मामलों में आरोपी

उदय भूमि ब्यूरो
बरेली। महिलाओं और पुरुषों को प्रकृति ने एक सा बनाया है। वह भी पुरुषों के समान ही एक व्यक्तित्व है। लेकिन दुर्भाग्य है कि उसे भेदभाव की वजह से हर जगह और हर बार यह बताना पड़ता है कि वह पुरुषों के समान हैं। उसके पैदा होने के साथ ही पहले सवाल से भेदभाव शुरू हो जाता है। जब डाक्टर से पूछा जाता है कि क्या हुआ? यह आगे बढ़ता हुआ बराबरी के हक तक जाता है। यह बात बरेली कालेज की चीफ प्राक्टर डा.वंदना शर्मा ने कही। उन्होंने उपस्थित महिलाओं से इसके लिए आवाज उठाने और अपनी शक्ति को पहचानने का भी आह्वान किया। एसआरएमएस मेडिकल कालेज में महिला सशक्तिकरण के लिए मिशन शक्ति अभियान जारी है। अभियान के दूसरे दिन जागरूकता कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में बरेली कालेज की पहली चीफ प्राक्टर डा.वंदना शर्मा उपस्थित हुईं। उन्होंने कहा कि हमारे समाज में यत्र नार्यस्तु पूज्यंते का आह्वान किया जाता है तो दूसरी तरह इसी समाज का एक वर्ग उसे पैरों की जूती समझता है। दोनों विरोधी बाते हैं। यह दोहरा मापदंड पुरुषों ने महिलाओं के व्यक्तित्व और उनकी असीमित क्षमताओं को देखते हुए गढ़ा है। महिलाओं के कमजोर होने की बातें भी पुरुषों ने अपना अहम बनाए रखने के लिए कही हैं। अगर स्त्री ताकतवर न होती तो ऐसा होना असंभव था। प्रकृति ने स्त्री और पुरुष दोनों को समान बनाया है। समान ताकतें दी हैं। पैदा भी औरतें नहीं होतीं। भेदभाव की तमाम परिस्थितियां उन्हें औरत बनाती हैं। वह भी पुरुषों के समान ही एक व्यक्तित्व है। उसकी भी एक पहचान है। नाम है।
डा.वंदना कहती हैं कि सारी लड़ाई बराबरी की है। नाम की है। इसे इंग्लिश के शब्द एन.ए.एम.ई. से समझना जरूरी है। एन का तात्पर्य न्यूट्रीशन, ए का एफेक्शन, एम का मेडिकल हेल्थ और ई का तात्पर्य एजूकेशन है। तमाम परिवारों में लड़कों के मुकाबले लड़कियों को न्यूट्रीशन में बराबरी का हक नहीं मिलता। परिवार के लोग एफेक्शन, मेडिकल हेल्थ और एजूकेशन में भी लड़कियों से दोहरा मानदंड रखते हैं। यहीं से भेदभाव की लड़ाई शुरू होती है। जो घर से निकल कर समाज तक जाती है। बेटी टेंशन नहीं टेन सन के बराबर होती है। दस बेटों के बराबर होती है। अगर इसे मान लिया जाए, सारा भेदभाव खत्म हो जाएगा। लेकिन पुरुष की मानसिकता यह सोचने नहीं देती। फिर भी हमें और आप को गर्व होना चाहिए कि भाग्य हमारे और आपके साथ है। हमें माता पिता ने जन्म लेने दिया, यह भाग्य के हमारे साथ होने की पहली निशानी है। हमें पढ़ाने का फैसला किया और भविष्य बनाने के लिए अच्छी संस्था में पढऩे का मौका दिया, यह भाग्य के हमारे साथ होने का ही परिणाम है। इसके बाद भी पुरुष हमें बराबरी का हक और आजादी देने की बात करें तो यह हमारे साथ सरासर अन्याय है। बराबरी का हक और आजादी तो हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है। यह हमें मिलनी ही चाहिए। पुरुष इसे देने वाले कौन होते हैं। सिर्फ इसलिए कि महिलाएं और बेटियां घर से बाहर सुरक्षित नहीं, उनके साथ दुर्व्यवहार हो रहा है। अगर ऐसा है तो इसका जिम्मेदार कौन है। यह कर कौन रहा है। जाहिर है, उनकी वे असुरक्षित हैं पुरुषों की वजह से ही। ऐसे में उन्हें रोकने की जरूरत है न कि महिलाओं को।
डा.वंदना ने कहा कि महिला अपराधों के 80 फीसद मामलों में आरोपी कोई बाहर का नहीं बल्कि नजदीकी रिश्तेदार होते हैं। ऐसे में महिलाओं को सावधान होने की जरूरत है। पीडि़त दूसरी महिलाओं के लिए भी हमें साथ आना चाहिए। हां इसके साथ ही महिलाओं को सेल्फ डिफेंस के लिए कोई भी मार्शल सीखना जरूरी है। इससे आत्मविश्वास बढ़ेगा जो प्रतिकार के लिए जरूरी है। डा.वंदना शर्मा ने अपनी एनसीसी कैडेट और एसआरएमएस सीईटी में बीटेक की छात्रा मनुश्री की मदत से उपस्थित छात्राओं को सेल्फ डिफेंस के गुर भी दिए। उन्हें बताया कि किस तरह साधारण से पेन की मदद से भी अपना बचाव किया जा सकता है। इस मौके पर एसआरएमएस मेडिकल कालेज के प्रिंसिपल डा.एसबी गुप्ता, मिशन शक्ति कार्यक्रम की चीफ कोआर्टिनेटर डा.बिंदू गर्ग, डा.सुजाता सिंह, एसआरएमएस इंस्टीट्यूट आफ पैरामेडिकल के प्रिंसिपल डा.प्रबल जोशी, एमबीबीएस, नर्सिंग और पैरामेडिकल छात्राएं की मौजूद रहीं। कार्यक्रम का संचालन एमबीबीएस की छात्रा तानिया सक्सेना ने किया।