लेखक : तरुण मिश्र
(समाजसेवी एवं राजनीतिक चिंतक हैं। राजनीतिक और सामाजिक विषयों पर लिखते हैं। देश-विदेश में आयोजित होने वाले व्याख्यानों में एक प्रखर वक्ता के रूप में जाने जाते हैं। जनसेवक के रुप में प्रख्यात है।)
(समाजसेवी एवं राजनीतिक चिंतक हैं। राजनीतिक और सामाजिक विषयों पर लिखते हैं। देश-विदेश में आयोजित होने वाले व्याख्यानों में एक प्रखर वक्ता के रूप में जाने जाते हैं। जनसेवक के रुप में प्रख्यात है।)
पश्चिम बंगाल की राजनीति लंबे समय से देश की सबसे दिलचस्प और जटिल राजनीतिक प्रयोगशालाओं में गिनी जाती रही है। यहां सत्ता सिर्फ चुनावी गणित से नहीं, बल्कि विचारधारा, सामाजिक समीकरण, क्षेत्रीय अस्मिता और भावनात्मक जुड़ाव से तय होती रही है। लेकिन इस बार का विधानसभा चुनाव कई मायनों में ऐतिहासिक साबित हुआ। चुनाव परिणामों ने न केवल दशकों पुराने राजनीतिक समीकरणों को बदल दिया, बल्कि यह भी दिखा दिया कि लोकतंत्र में जनता जब मन बना लेती है तो सबसे मजबूत राजनीतिक किले भी ढह जाते हैं। इस चुनावी परिणाम को प्रतीकात्मक रूप से एक वाक्य में समझा जाए तो कहा जा सकता है-झालमुरी ने किया कमाल, भाजपा ने कर दिया धमाल। चुनाव प्रचार के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का सड़क किनारे रुककर झालमुरी खाना एक साधारण मानवीय क्षण था, लेकिन राजनीति में प्रतीक अक्सर संदेश बन जाते हैं। जिस घटना को विपक्ष ने राजनीतिक स्टंट बताकर हल्के में लिया, वही बाद में जनता के बीच जुड़ाव और सहजता का प्रतीक बन गई। पश्चिम बंगाल में पहला विधानसभा चुनाव वर्ष 1952 में हुआ था, जो स्वतंत्र भारत के पहले आम चुनाव का हिस्सा था। उस समय भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने भारी जीत दर्ज की और डॉ. बिधान चंद्र रॉय राज्य के पहले निर्वाचित मुख्यमंत्री बने।
शुरुआती वर्षों में कांग्रेस का प्रभुत्व रहा, लेकिन धीरे-धीरे बंगाल की राजनीति वामपंथी विचारधारा की ओर मुड़ गई। लगभग तीन दशकों तक वाम मोर्चा सत्ता में रहा। इसके बाद वर्ष 2011 में ममता बनर्जी के नेतृत्व में अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस ने सत्ता परिवर्तन किया और वामपंथी शासन का अंत हुआ। ममता बनर्जी लगातार तीन बार मुख्यमंत्री बनीं और राज्य की राजनीति पूरी तरह उनके इर्द-गिर्द केंद्रित हो गई। हालांकि समय के साथ सत्ता विरोधी लहर, प्रशासनिक आरोपों और बदलती सामाजिक अपेक्षाओं ने जनता के भीतर बदलाव की इच्छा को जन्म देना शुरू कर दिया था। पिछले चुनाव के बाद ही संकेत मिलने लगे थे कि बंगाल की राजनीति एक नए मोड़ की ओर बढ़ रही है। इस बार का चुनाव सिर्फ सरकार चुनने का चुनाव नहीं था, बल्कि यह दो राजनीतिक दृष्टिकोणों की सीधी टक्कर बन गया। एक ओर क्षेत्रीय नेतृत्व और पहचान की राजनीति थी, तो दूसरी ओर राष्ट्रीय नेतृत्व और विकास मॉडल का दावा। चुनाव प्रचार के दौरान पूरा देश बंगाल की ओर देख रहा था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ सहित भाजपा के शीर्ष नेताओं ने राज्य में व्यापक जनसभाएं कीं। दूसरी ओर ममता बनर्जी ने खुद को बंगाल की अस्मिता का चेहरा बनाकर चुनाव मैदान में पूरी ताकत झोंक दी।
नतीजों ने दिखाया कि मुकाबला सिर्फ सीटों का नहीं था, बल्कि राजनीतिक नैरेटिव का भी था। चुनाव प्रचार के दौरान ‘खेला होबे’ का नारा काफी चर्चित रहा, लेकिन परिणामों ने संकेत दिया कि जनता ने इस बार खेल के नियम बदल दिए। मतदाताओं ने भय, हिंसा और कथित राजनीतिक दबावों के आरोपों के खिलाफ खुलकर मतदान किया। मतदाताओं के बीच यह भावना मजबूत हुई कि लोकतंत्र में बदलाव भी जरूरी होता है। लंबे समय तक एक ही नेतृत्व के बने रहने से शासन के प्रति असंतोष स्वाभाविक रूप से बढ़ता है। यही असंतोष इस चुनाव में निर्णायक कारक बन गया। इस चुनाव की सबसे बड़ी चर्चा तथाकथित ‘एम फैक्टर’ को लेकर रही, जिसने चुनावी समीकरणों को प्रभावित किया। भाजपा ने अपने चुनाव अभियान में सामाजिक और जनसंख्या संबंधी मुद्दों को प्रमुखता से उठाया। सीमावर्ती इलाकों में अवैध घुसपैठ को सुरक्षा और स्थानीय अधिकारों से जोड़कर प्रस्तुत किया गया, जिसने मतदाताओं के एक बड़े वर्ग को प्रभावित किया। भाजपा ने चुनाव प्रचार को सिर्फ आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित नहीं रखा, बल्कि आर्थिक और सामाजिक वादों को भी केंद्र में रखा। महिलाओं और बेरोजगार युवाओं को आर्थिक सहायता देने के वादों ने व्यापक चर्चा बटोरी। केंद्र सरकार की योजनाओं को प्रभावी ढंग से लागू करने का भरोसा दिया गया, जिससे गरीब और मध्यम वर्ग के बीच पार्टी की पकड़ मजबूत होती दिखाई दी। विकास, निवेश और रोजगार के मुद्दों को लगातार चुनावी विमर्श में बनाए रखा गया।
राज्य में हिंसा और अपराध को लेकर लगाए गए आरोप चुनावी बहस का प्रमुख हिस्सा बने। सख्त कानून व्यवस्था और प्रशासनिक सुधारों के वादों ने शहरी मतदाताओं और मध्यम वर्ग को प्रभावित किया। ‘सिंडिकेट राज’ खत्म करने और पारदर्शी शासन लाने का संदेश उन लोगों तक पहुंचा जो लंबे समय से व्यवस्था से नाराज बताए जा रहे थे। यही संदेश चुनाव परिणामों में झलकता दिखाई दिया। औद्योगिक विकास और रोजगार सृजन का मुद्दा भी चुनाव में अहम रहा। बंद पड़े उद्योगों को फिर से शुरू करने और नए निवेश लाने का वादा युवाओं और व्यापारिक वर्ग के लिए आकर्षण का केंद्र बना। ‘सोनार बांग्ला’ का विजन सिर्फ राजनीतिक नारा नहीं बल्कि आर्थिक पुनर्निर्माण की अवधारणा के रूप में प्रस्तुत किया गया। अभी तक राज्य की 294 विधानसभा सीटों में भाजपा ने ऐतिहासिक प्रदर्शन करते हुए 146 सीटों पर जीत दर्ज की और कई अन्य सीटों पर बढ़त बनाई। यह परिणाम इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि वर्ष 2011 में भाजपा ने केवल तीन सीटों से अपना खाता खोला था। एक दशक के भीतर तीन सीटों से पूर्ण बहुमत तक पहुंचना भारतीय राजनीति के सबसे तेज उभारों में से एक माना जा रहा है। भवानीपुर और नंदीग्राम जैसे हाई प्रोफाइल सीटों ने भी चुनाव को रोमांचक बना दिया। ममता बनर्जी को भवानीपुर सीट से करारी हार का सामना करना पड़ा है। उनके प्रतिद्वंदी शुभेंदु अधिकारी ने उन्हें 15,105 वोटों के अंतर से पराजित कर सियासी समीकरण बदल दिए हैं।
मतगणना के शुरुआती रुझानों में कांटे की टक्कर देखने को मिली, जिसने चुनावी माहौल को और अधिक रोचक बना दिया। राजनीति में प्रतीकों की अहम भूमिका होती है। चुनाव प्रचार के दौरान सड़क किनारे खड़ी दुकान पर झालमुरी खाना शायद सामान्य घटना रही हो, लेकिन उसने एक बड़ा संदेश दिया-नेतृत्व का जनता से सीधा जुड़ाव। जिस घटना को सोशल मीडिया पर मीम और व्यंग्य का विषय बनाया गया, वही बाद में चुनावी चर्चा का सांस्कृतिक प्रतीक बन गई। कई राजनीतिक विश्लेषकों ने इसे चुनावी मनोविज्ञान का उदाहरण बताया, जहां सरलता और सहजता मतदाताओं के मन में प्रभाव छोड़ती है। इस चुनाव ने यह भी साबित किया कि लोकतंत्र में मतदाता अंतिम निर्णायक होता है। बंगाल की जनता ने सत्ता परिवर्तन के जरिए यह संदेश दिया कि राजनीतिक दलों को लगातार जनता की अपेक्षाओं के अनुरूप खुद को बदलना होगा।
विकास, सुरक्षा, रोजगार और प्रशासनिक पारदर्शिता जैसे मुद्दे अब क्षेत्रीय सीमाओं से आगे बढ़कर राष्ट्रीय राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बन चुके हैं। पश्चिम बंगाल के चुनाव परिणाम सिर्फ एक राज्य की राजनीतिक कहानी नहीं हैं, बल्कि यह भारतीय राजनीति के बदलते स्वरूप का संकेत भी हैं। राष्ट्रीय दलों का विस्तार, क्षेत्रीय राजनीति की चुनौतियां और मतदाताओं की बढ़ती राजनीतिक जागरूकता आने वाले वर्षों की दिशा तय करेगी। जनता अब केवल वादों से संतुष्ट नहीं होती, बल्कि परिणाम चाहती है। यही कारण है कि चुनावी राजनीति में विकास, शासन और भरोसा सबसे बड़े मुद्दे बनते जा रहे हैं। अंतत: यह चुनाव इस बात का उदाहरण बन गया कि लोकतंत्र में हर वोट बदलाव की कहानी लिख सकता है। बंगाल की सियासत में आया यह परिवर्तन आने वाले समय में देश की राजनीति को भी नई दिशा दे सकता है।

















