(लेखक – ओमकेश अग्रहरि)
हम बचपन से सीखते हैं कि प्रेम सबसे महत्वपूर्ण भावना है। माता-पिता, भाई-बहन, मित्र और पड़ोसी—हर किसी के साथ प्रेमपूर्वक व्यवहार करना सिखाया जाता है। समाज यह मानता है कि प्रेम मानव जीवन का सबसे बड़ा उपहार है। यह न केवल लोगों को जोड़ता है, बल्कि जीवन को मधुर और सार्थक बनाता है। प्रेम की भावना ही जीवन में शांति, सहानुभूति और सहयोग की भावना पैदा करती है। इसके बिना जीवन सूखा, नीरस और असंतोषपूर्ण हो जाता है। प्रेम केवल दो व्यक्तियों के बीच सीमित नहीं है। यह माता-पिता और संतान, भाई-बहन, गुरु-शिष्य, मित्र और यहां तक कि मनुष्य और प्रकृति के बीच भी अनुभव किया जा सकता है। प्रेम की शक्ति जीवन में रंग, अर्थ और आनंद भरती है। यह भावना समाज को जोड़ती है और जीवन के हर पहलू को सरल और सुखद बनाती है। हालांकि समाज प्रेम की महत्ता स्वीकार करता है, लेकिन जब कोई वयस्क पहली बार किसी के प्रति प्रेम करता है, तो वही समाज उस प्रेम पर प्रश्नचिह्न लगाता है। प्रेम के इस स्वाभाविक और व्यक्तिगत अनुभव को सामाजिक बंधनों जैसे जाति, धर्म, आर्थिक स्थिति या क्षेत्र के आधार पर सीमित कर दिया जाता है।
समाज का यह दोहरा चरित्र स्पष्ट होता है: एक ओर प्रेम को सर्वोच्च मानता है, और दूसरी ओर व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर नियंत्रण लगाता है। समाज का यह दृष्टिकोण कई पीढ़ियों से चला आ रहा है। प्रेम अक्सर बदलाव लाता है, और बदलाव से समाज डरता है। बदलाव का अर्थ पुराने सामाजिक ढाँचों का टूटना होता है, इसलिए समाज विरोध करता है। यही कारण है कि समाज अपने नियमों और परंपराओं को बनाए रखने के लिए बच्चों के प्रेम और विवाहों पर सवाल उठाता है। समाज अपने आदर्श रूप में राधा और कृष्ण के प्रेम को स्वीकार करता है और उसकी पूजा करता है। लेकिन वही समाज अपने बच्चों के प्रेम को सामाजिक बंधनों में बांध देता है। जब बच्चे समाज के तय नियमों के अनुसार प्रेम या विवाह करते हैं, तो उन्हें ईश्वर की इच्छा का पालन करने वाला माना जाता है। लेकिन जब बच्चे अपनी मर्जी से प्रेम करते हैं, तो समाज उसे अस्वीकार कर देता है और कई बार उसे तोड़ने का प्रयास करता है। यह विरोध केवल प्रेम के प्रति नहीं है, बल्कि समाज की मानसिकता का प्रतिबिंब है। समाज प्रेम को तभी स्वीकार करता है जब वह परंपराओं और सामाजिक नियंत्रण की सीमा में हो। इस नियंत्रण की सीमा तब तक मान्य है जब तक बच्चे पूरी तरह वयस्क और बौद्धिक निर्णय लेने में सक्षम नहीं हो जाते।
समय की मांग है कि समाज अपनी सोच बदले और प्रेम को उसकी वास्तविक पवित्रता में स्वीकार करे। चाहे वह राधा-कृष्ण का प्रेम हो या अपने बच्चों का, प्रेम की भावना सार्वभौमिक और समान होती है। प्रेम को किसी सामाजिक सीमा में बाँधने की प्रवृत्ति न केवल व्यक्तिगत स्वतंत्रता को चोट पहुँचाती है, बल्कि समाज की आत्मा को भी कमजोर करती है। समाज को यह समझने की आवश्यकता है कि प्रेम केवल व्यक्तिगत खुशी का माध्यम नहीं है, बल्कि यह सामाजिक जुड़ाव, समझदारी और मानवता को बढ़ावा देने का मार्ग है। प्रेम का स्वीकार समाज में विश्वास, सम्मान और सहिष्णुता की भावना को मजबूत करता है। प्रेम जीवन को पूरी तरह से जीने की क्षमता देता है। जिस प्रकार कलम स्याही के बिना अधूरी होती है, फूल खुशबू के बिना अपूर्ण रहते हैं, और गीत सुर के बिना अधूरा लगता है, उसी तरह मनुष्य प्रेम के बिना अपूर्ण है। प्रेम से ही जीवन में मधुरता, संतोष और आत्मिक शांति आती है।
समाज का यह दोगलापन कि वह प्रेम को आदर्श मानता है, लेकिन बच्चों के स्वाभाविक प्रेम पर नियंत्रण लगाता है, मानव जीवन की सच्ची खुशी और स्वतंत्रता के रास्ते में बाधा डालता है। यही कारण है कि समाज की मानसिकता में परिवर्तन की आवश्यकता है। यदि प्रेम को उसकी वास्तविक पवित्रता में स्वीकार किया जाए, तो न केवल व्यक्तिगत जीवन में बल्कि समाज में भी शांति, संतुलन और सामंजस्य बढ़ेगा। समाज को यह स्वीकार करना होगा कि प्रेम सीमाओं और बंधनों से परे है। प्रेम केवल दो व्यक्तियों के बीच नहीं, बल्कि पूरे समाज और प्रकृति के साथ मानव संबंधों को जोड़ता है। जब तक समाज अपने कथनी और करनी में सामंजस्य नहीं लाता, प्रेम की सच्ची महत्ता को समझ नहीं पाएगा। प्रेम का सम्मान और उसकी स्वतंत्रता मानव जीवन की पूर्णता के लिए अनिवार्य है। समाज को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि प्रेम के माध्यम से आने वाला बदलाव डरावना नहीं, बल्कि सृजनात्मक और जीवन को सुंदर बनाने वाला हो। प्रेम ही वह शक्ति है जो जीवन को अर्थ देती है और मानव को अपने अस्तित्व के साथ जोड़ती है।

















