(समाजसेवी एवं राजनीतिक चिंतक हैं। राजनीतिक और सामाजिक विषयों पर लिखते हैं। देश-विदेश में आयोजित होने वाले व्याख्यानों में एक प्रखर वक्ता के रूप में जाने जाते हैं। जनसेवक के रुप में प्रख्यात है।)
मुंबई शहर की पहचान केवल ऊँची इमारतों, लोकल ट्रेनों और भागती जिंदगी से नहीं है। इस महानगर की आत्मा उन लोगों में बसती है जिन्होंने बिना शोर-शराबे के दशकों तक सेवा की परंपरा को जिंदा रखा। इन्हीं में सबसे सम्मानित नाम है- मुंबई के डिब्बावाले। लगभग 130 से 135 वर्षों से बिना किसी आधुनिक तकनीक, बिना किसी डिजिटल ऐप और बिना किसी विज्ञापन अभियान के लाखों लोगों तक घर का बना गर्म भोजन पहुँचाने वाले डिब्बावाले आज अस्तित्व के संकट से जूझ रहे हैं। यह संकट किसी प्राकृतिक आपदा या आर्थिक मंदी से नहीं आया, बल्कि डिजिटल उपभोक्तावाद की उस लहर से आया है जिसने सुविधा के नाम पर परंपराओं को पीछे धकेल दिया है। सफेद कुर्ता-पायजामा, गांधी टोपी और कंधे पर टिफिन का भार – यह दृश्य मुंबई की पहचान रहा है। हजारों डिब्बावाले रोजाना लाखों टिफिन घर से कार्यालय तक पहुँचाते थे। न कोई मोबाइल ऐप, न जीपीएस ट्रैकिंग, न महंगे उपकरण- फिर भी उनकी सेवा दुनिया की सबसे सटीक लॉजिस्टिक प्रणाली मानी गई। हार्वर्ड बिजनेस स्कूल से लेकर अंतरराष्ट्रीय प्रबंधन संस्थानों तक ने डिब्बावालों के कार्य मॉडल पर अध्ययन किया। उनकी कार्य प्रणाली इतनी विश्वसनीय रही कि गलती की संभावना लगभग शून्य मानी जाती थी। समय की पाबंदी, ईमानदारी और श्रम संस्कृति का ऐसा उदाहरण शायद ही कहीं और देखने को मिले।
एक समय ऐसा भी आया जब अमेरिका के राष्ट्रपति के शपथग्रहण समारोह में मुंबई डिब्बावाला संगठन के प्रतिनिधि को विशेष रूप से आमंत्रित किया गया। यह सम्मान केवल सेवा का नहीं बल्कि भारतीय कार्य संस्कृति का सम्मान था। कोविड महामारी के बाद परिस्थितियाँ तेजी से बदल गईं। लोगों में स्वास्थ्य को लेकर भय और सावधानी दोनों बढ़े, लेकिन इसी दौर में डिजिटल फूड डिलीवरी कंपनियों ने शहरों की खानपान संस्कृति को बदल दिया। मोबाइल ऐप के जरिए कुछ क्लिक में खाना घर तक पहुँचने लगा। आकर्षक ऑफर, भारी छूट, विज्ञापन और त्वरित सेवा ने लोगों की आदतें बदल दीं। कार्यालय जाने वाले कर्मचारी, जो पहले घर से टिफिन मंगवाते थे, अब बाहर का खाना ऑर्डर करने लगे। सुविधा ने परंपरा पर जीत हासिल करनी शुरू कर दी। परिणाम यह हुआ कि सदियों पुरानी डिब्बावाला व्यवस्था धीरे-धीरे हाशिए पर चली गई। डिजिटल कंपनियों की रणनीति साफ है- छूट दो, आदत बदलो और बाजार पर कब्जा करो। कुछ समय के लिए सस्ता भोजन लोगों को आकर्षित करता है, लेकिन इसका दूसरा पक्ष भी है। जहाँ एक ओर ऐप आधारित कंपनियाँ तकनीक और पूंजी के दम पर बाजार नियंत्रित कर रही हैं, वहीं दूसरी ओर हजारों डिब्बावाले रोज़गार खोने की कगार पर पहुँच गए हैं। जिन परिवारों की पीढिय़ाँ इस सेवा से जुड़ी थीं, उनके सामने आज आय का संकट खड़ा है। यह केवल व्यवसाय की प्रतिस्पर्धा नहीं, बल्कि असंगठित श्रम बनाम कॉर्पोरेट पूंजी की लड़ाई बन चुकी है। सबसे बड़ा सवाल केवल रोजगार का नहीं, स्वास्थ्य का भी है। घर का बना भोजन भारतीय जीवनशैली की नींव रहा है। संतुलित आहार, स्वच्छता और पारिवारिक जुड़ाव- यह सब टिफिन संस्कृति से जुड़ा था।
आज तेजी से बढ़ती जीवनशैली में बाहर का खाना सामान्य बन गया है। तली-भुनी वस्तुएँ, प्रोसेस्ड खाद्य पदार्थ और अत्यधिक मसालेदार भोजन लोगों की दिनचर्या का हिस्सा बनते जा रहे हैं। डॉक्टर लगातार चेतावनी दे रहे हैं कि जीवनशैली संबंधी बीमारियाँ बढ़ रही हैं। क्या सुविधा के नाम पर हम स्वास्थ्य से समझौता कर रहे हैं?, डिब्बावाले केवल खाना नहीं पहुँचाते थे, वे परिवार और कार्यस्थल के बीच भावनात्मक संबंध बनाए रखते थे। हर टिफिन में माँ का स्नेह, पत्नी की चिंता और घर की खुशबू होती थी।
डिब्बावाला व्यवस्था ने मध्यम वर्ग को सस्ता, पौष्टिक और भरोसेमंद विकल्प दिया। इससे महिलाओं को रोजगार की आवश्यकता के बिना परिवार की देखभाल का संतुलन भी मिला। यह व्यवस्था सामाजिक संरचना का हिस्सा थी। डिजिटल प्लेटफॉर्म इस मानवीय संबंध को नहीं समझते; उनके लिए ग्राहक केवल ‘ऑर्डर नंबर’ होता है। तकनीक का विरोध नहीं किया जा सकता। आधुनिकता आवश्यक है, लेकिन सवाल यह है कि क्या तकनीक मानव श्रम और परंपराओं को समाप्त कर दे?
यदि डिजिटल प्लेटफॉर्म स्थानीय सेवाओं के साथ सहयोग करें, उन्हें तकनीकी रूप से सशक्त बनाएं, तो संतुलन संभव है। मगर जब बाजार केवल लाभ आधारित हो जाता है, तब सामाजिक संरचनाएँ कमजोर पडऩे लगती हैं। डिब्बावाले डिजिटल प्रतिस्पर्धा से इसलिए पिछड़ रहे हैं क्योंकि उनके पास निवेश, विज्ञापन और तकनीकी संसाधन नहीं हैं। मुंबई की पहचान लोकल ट्रेन और डिब्बावालों से थी। यदि डिब्बावाले खत्म हो जाते हैं, तो यह केवल एक पेशे का अंत नहीं होगा, बल्कि शहर की सांस्कृतिक स्मृति का क्षरण होगा। आज नई पीढ़ी डिब्बावाला शब्द से भी अपरिचित होती जा रही है। यह बदलाव केवल आर्थिक नहीं, सांस्कृतिक संकट का संकेत है। समाज और सरकार दोनों की जिम्मेदारी बनती है कि पारंपरिक सेवाओं को संरक्षण दिया जाए। स्थानीय भोजन प्रणाली, घरेलू खाना वितरण और श्रमिक आधारित सेवाओं को बढ़ावा देने की आवश्यकता है।
कॉर्पोरेट कंपनियों के साथ संतुलित नीति बनाकर छोटे सेवा समूहों को भी बाजार में अवसर दिया जा सकता है। डिजिटल प्लेटफॉर्म यदि स्थानीय श्रमिकों को जोड़ें तो परंपरा और आधुनिकता साथ चल सकती है। हम किस दिशा में जा रहे हैं? सुविधा की दौड़ में क्या हम स्वास्थ्य, रोजगार और संस्कृति- तीनों खो रहे हैं? डिब्बावाले केवल इतिहास नहीं हैं, वे आत्मनिर्भर भारत की जीवित मिसाल हैं। उन्होंने बिना तकनीक के वह कर दिखाया जिसे आज कृत्रिम बुद्धिमत्ता और ऐप आधारित प्रणाली भी चुनौती मानती है। क्या कुछ मिनट की सुविधा के लिए हम उस व्यवस्था को खत्म कर देंगे जिसने पीढिय़ों तक शहर को पोषित किया? यदि समय रहते ध्यान नहीं दिया गया, तो आने वाली पीढिय़ाँ डिब्बावालों को किताबों में पढ़ेंगी, सड़कों पर नहीं देखेंगी। और तब शायद हम समझ पाएंगे कि हमने केवल एक सेवा नहीं, अपनी सांस्कृतिक पहचान का एक महत्वपूर्ण हिस्सा खो दिया।

















