लेखक : तरुण मिश्र
(समाजसेवी एवं राजनीतिक चिंतक हैं। राजनीतिक और सामाजिक विषयों पर लिखते हैं। देश-विदेश में आयोजित होने वाले व्याख्यानों में एक प्रखर वक्ता के रूप में जाने जाते हैं। जनसेवक के रुप में प्रख्यात है।)
भारत का पड़ोसी देश नेपाल आजकल नवनिर्वाचित प्रधानमंत्री बालेन शाह की अलग कार्यशैली के कारण चर्चाओं में है। पीएम पद की शपथ ग्रहण करने के बाद से शाह एक्शन मोड में हैं। उनके कुछ फैसलों ने सभी को चौंका दिया है। सोशल मीडिया पर उनके कार्यों की सराहना हो रही है। बालेन शाह की तुलना बॉलीवुड मूवी ‘नायक’ के अभिनेता अनिल कपूर के किरदार से कर दी गई है। जिस अंदाज में शाह ने काम की शुरुआत की है, उससे साफ है कि नेपाल में भ्रष्ट और बेईमान व्यक्तियों के दिन लद चुके हैं। चाहे कोई कितना रसूखदार रहा हो, फिलहाल वह सरकार के निशाने पर है। नेपाल में पिछले दिनों संपन्न आम चुनाव में मधेस नेता बालेन शाह ने एकतरफा जीत हासिल कर सभी को चौंका दिया है। नेपाल की सियासत में ये एक महत्वपूर्ण परिवर्तन माना जा रहा है, क्योंकि पहली बार कोई मधेस पीएम बना है। मधेस इलाका भारत के बिहार और उत्तर प्रदेश के मैदानी क्षेत्रों से जुड़ा है।
मधेसों का भारत से खास रिश्ता रहा है। ऐसे में बालेन शाह का काठमांडू में सत्ता संभालने से नेपाल और भारत के संबंधों में नई गर्माहट की उम्मीद जताई जा रही है। नेपाल में राजनीतिक बदलाव के भारत के लिए गहरे मायने हैं। पूर्व पीएम केपी शर्मा ओली की सरकार का झुकाव चीन की तरफ था, इससे काठमांडू और दिल्ली के रिश्तों में उतार-चढ़ाव देखा गया। ओली सरकार में भारत के क्षेत्रों को अपना बताने वाला विवादित मानचित्र जारी करने समेत कई ऐसे कदम उठाए गए, जिससे दोनों देशों के रिश्ते में तनाव आया। केपी ओली नई सरकार आने के बाद गिरफ्तार होकर जेल जा चुके हैं। नेपाल में बालेन शाह का उदय भारत के साथ रिश्ते में संभावित नई शुरुआत की उम्मीद जगाता है। मधेशी नेता होने के नाते उनसे भारत से अच्छे रिश्ते रखने की उम्मीद की जाती है। मधेस बिहार और उत्तर प्रदेश के साथ खुली सीमा के साथ सांस्कृतिक और भाषाई जुड़ाव रखते हैं। मधेसों का भारत के साथ रोटी-बेटी का रिश्ता है। इस जुड़ाव का लाभ बेहतर रिश्तों में मिल सकता है।
बालेन शाह की जीत के बाद पीएम मोदी ने उन्हें गर्मजोशी से बधाई दी। शाह की तरफ से भी सकारात्मक जवाब आया है। शाह ने एक व्यावहारिक ‘नेपाल फर्स्ट’ नजरिया अपनाने का इशारा किया है, जो पूर्व की सरकारों के चीन-समर्थक झुकावों से दूर होने का संकेत है। उन्होंने अभी तक भारत को अहमियत देने की नीति दिखाई है। नेपाल में सत्ता परिवर्तन भारत के लिए पहाड़ी-प्रधान और कम्युनिस्ट-झुकाव वाले नेतृत्व की जगह नई सरकार के साथ भरोसे को फिर से बनाने, नागरिकों के बीच संबंधों को पुनर्जीवित करने और चीनी प्रभाव का मुकाबला करने का अवसर है। भारत के साथ एक अच्छी चीज ये भी है कि दिल्ली ने निरंतर मधेशी नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों का समर्थन किया है। नेपाल की नई सरकार में भारत का सामना युवा और पढ़े-लिखे नेताओं से होगा। बालेन शाह खुद एक इंजीनियर हैं। वह अपने पूर्ववर्तियों के उलट व्यावहारिक और किसी विचारधारा से बंधे नहीं हैं। इसकी संभावना कम है कि वे अतीत में कम्युनिस्टों और राजशाही समर्थकों जैसे चीन के साथ ‘संतुलन के खेल’ में शामिल होंगे। बालेन शाह का नेपाल की सत्ता में आना निश्चित ही भारत के लिए उम्मीद जगाता है और उन्होंने अच्छे संकेत भी दिए हैं।
हालांकि उनके लिए काठमांडू में चीनी प्रभाव से लड़ना आसान नहीं होगा। चीन ने पिछले कुछ साल में योजनाबद्ध तरीके से निवेश और दूसरे तरीकों से नेपाल में पैठ बनाई है। ऐसे में शाह कैसे डील करते है, ये देखना दिलचस्प होगा। पिछले साल सितंबर में नेपाल में बड़े स्तर पर भ्रष्टाचार विरोधी प्रदर्शन देखने को थे, जिन्हें जेन-जी विरोध-प्रदर्शन कहा गया। ये प्रदर्शन अचानक हिंसक हो गए थे और सत्तर से ज्यादा नागरिकों की मौत हो गई। इस हिंसा के बाद ओली सरकार पर गंभीर सवाल उठे और आखिरकार उनकी सरकार गिर गई। इन घटनाओं ने देश की राजनीति को पूरी तरह बदल दिया। कुछ दिन पहले गठित उच्च स्तरीय जांच आयोग ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि उस समय उच्च पदों पर बैठे व्यक्तियों ने हालात को संभालने में लापरवाही बरती। आयोग ने पूर्व पीएम ओली और पूर्व गृहमंत्री रमेश लेखक समेत कई अधिकारियों को जिम्मेदार ठहराया और उनके खिलाफ कड़ी कार्रवाई की सिफारिश की।
रिपोर्ट में अधिकतम दस साल की सजा की भी सिफारिश की गई थी, जिसके बाद नई सरकार ने इसे लागू करने का फैसला लिया। नेपाल की अर्थव्यवस्था वर्तमान में प्रेषण-आधारित उपभोग मॉडल पर टिकी है। नई सरकार के समक्ष प्रमुख चुनौती इसे उत्पादन-आधारित मॉडल में परिवर्तित करना है। बालेन शाह की तकनीकी पृष्ठभूमि से यह अपेक्षा की जा रही है कि वे नेपाल की जलविद्युत क्षमता का इष्टतम उपयोग कर औद्योगिक क्रांति का मार्ग प्रशस्त करेंगे। भारत के लिए एक स्थिर नेपाल खुली सीमा की सुरक्षा और द्विपक्षीय आर्थिक परियोजनाओं की निरंतरता के लिए अनिवार्य है। चीन को अपनी पारंपरिक ‘वामपंथी एकजुटता’ की नीति को त्याग कर अब एक राष्ट्रवादी व मध्यमार्गी सरकार के साथ नए सिरे से कूटनीतिक तालमेल बिठाना होगा।

















