ऐसा तो नहीं था नेपाल, नई क्रांति से हिला मुल्क

लेखक : तरुण मिश्र
(समाजसेवी एवं राजनीतिक चिंतक हैं। राजनीतिक और सामाजिक विषयों पर लिखते हैं। देश-विदेश में आयोजित होने वाले व्याख्यानों में एक प्रखर वक्ता के रूप में जाने जाते हैं। जनसेवक के रुप में प्रख्यात है।)

भारत का पड़ोसी देश नेपाल कभी ऐसा नहीं था? नेपाल में हिंसक भीड़ की अराजकता कल्पना से परे है। आम नेपाली कैसे कट्टर हो सकता है? पूर्व पीएम की पत्नी की जलाकर हत्या कर देना और तीन पुलिस कर्मियों को पीट-पीटकर मौत के घाट उतार देने का कृत्य कतई क्षम्य नहीं है। पड़ोसी मुल्क में इंसानियत दम तोड़ रही है। जनप्रतिनिधियों, उनके परिवार के सदस्यों और आवासों पर बेकाबू प्रदर्शनकारियों ने जिस प्रकार का गुस्सा उतारा है, वह चिंताजनक है। नेपाल में इस प्रकार की हिंसा पूर्व में कभी सामने नहीं आई थी। प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली द्वारा इस्तीफा दिए जाने के बाद भी जनता का आक्रोश शांत नहीं हो पाया है। नेपाल सरकार ने स्थानीय स्तर पर पंजीकरण नहीं कराने के कारण दो दर्जन से अधिक सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर बैन लगा दिया था। इनमें फेसबुक, इंस्टाग्राम, यूट्यूब, एक्स, व्हाट्सएप जैसे बड़े प्लेटफार्म भी थे। सरकार बेशक सुप्रीम कोर्ट के आदेश और नियमों का हवाला दे रही हो, मगर उसके इस कदम ने जनता खासकर युवाओं में दबे आक्रोश को उभार दिया। युवा वर्ग का कहना है कि यह प्रतिबंध सीधे उनके काम और अभिव्यक्ति पर है। नेपाल में साल की शुरुआत में भी आंदोलन देखने को मिला था, जब देशभर में मांग उठी कि राजशाही की वापसी हो।

उस समय भी जनता ने भ्रष्टाचार को लेकर गुस्सा जताया था। नेपाल के अंदरूनी हालात लंबे समय से नाजुक बने हैं। यह देश राजनीतिक अस्थिरता, बेरोजगारी और दूसरे मुद्दों से जूझ रहा है। सत्रह साल पहले इन्हीं सब मुद्दों को लेकर व्यापक जन आंदोलन छिड़ा था, जिसने राजशाही का अंत कर गणतांत्रिक व्यवस्था कायम की, मगर दो दशक भी नहीं बीते और उस सिस्टम से जनता का मोहभंग हो चुका है। निर्वाचित नेताओं ने नागरिकों को किस कदर निराश किया है, समझने के लिए यह बताना काफी है कि पिछले सत्रह साल में यहां चौदह सरकारें बन चुकी हैं। पूर्व पीएम शेर बहादुर देउबा से लेकर बाबूराम भट्टराई, प्रचंड और केपी शर्मा ओली तक तमाम राजनेता किसी न किसी प्रकार के भ्रष्टाचार के आरोपों का सामना कर रहे हैं। नेपाल की अर्थव्यवस्था मुख्य रूप से पर्यटन और प्रवासी नागरिकों की तरफ से भेजी गई रकम पर निर्भर है, मगर हाल में दोनों में कमी आई है। देश की जीडीपी में मामूली तेजी का अनुमान है, मगर सरकार युवाओं में उम्मीद और भरोसा जगाने में नाकाम रही है। युवाओं को कोरे वादे नहीं, बदलाव चाहिए। यह कहना गलत नहीं है कि बांग्लादेश की भांति अब नेपाल हिंसा की आग में जल रहा है।

सोशल मीडिया पर प्रतिबंध का फैसला नेपाल सरकार के लिए बड़ी मुसीबत बन गया। गोलीबारी में डेढ़ दर्जन से अधिक नागरिकों की मौत और सैकड़ों प्रदर्शनकारियों के घायल होने के बाद हिंसा और भड़क गई। नेपाल में आंदोलनकारियों द्वारा पशुपतिनाथ मंदिर को नुकसान पहुँचाना अत्यंत निंदनीय घटना है। दबाव में आकर सरकार को सोशल मीडिया से बैन हटाना पड़ा है। इसके बावजूद हालात सामान्य नहीं हो पाए हैं। नेपाल में नई क्रांति का आगाज पूरी दुनिया की चिंता का कारण है। बांग्लादेश और नेपाल के घटनाक्रम एक जैसे नजर आते हैं। सिर्फ जनता की बगावत के मुद्दे अलग हैं। बांग्लादेश में आरक्षण के मुद्दे पर विद्यार्थियों ने सरकार को चुनौती दी थी। जबकि नेपाल में मामला सोशल मीडिया से जुड़ा सामने आया है। हालांकि दोनों मुल्कों ने जो एक बड़ी गलती कि वह समान दिखाई देती हैं। जनाक्रोश को बलपूर्वक दबाने की रणनीति हमेशा काम नहीं आती है। ऐसा करने पर स्थिति बिगड़ने की आशंका रहती है। नेपाल के मौजूदा आंदोलन में आमजन के जुड़ने से सरकार विरोधी मुहिम तेज हो गई है। मामला सिर्फ सोशल मीडिया पर बैन का नहीं रह गया है बल्कि जनता से जुड़ी समस्याओं का समाधान न होने पर भी नाराजगी सामने आ रही है।

नेपाल में फैली अराजकता के पीछे सुनियोजित साजिश की आशंका से भी इनकार नहीं किया गया है। सोशल मीडिया पर बैन से पहले नेपाल सरकार ने संभवत: सभी जरूरी बिंदुओं पर गंभीरता से विचार नहीं किया था। अन्यथा आज यह पेचीदा स्थिति पैदा नहीं होती। मौजूदा दौर में सोशल मीडिया आमजन की जिंदगी का अहम हिस्सा बन चुका है। सिक्के के दो पहलू की भांति सोशल मीडिया के भी अच्छे और बुरा प्रभाव हैं। जिस प्रकार मोबाइल के बिना गुजारा नहीं है, ठीक उसी तरह सोशल मीडिया भी अहम जरूरत बन गया है। सोशल मीडिया के सभी महत्वपूर्ण प्लेटफार्म पर बैन ने युवाओं को गुस्से से भर दिया। आधुनिक दौर में युवाओं का इसके बगैर कतई गुजारा नहीं है। नेपाल के हालात से भारत की चिंता बढ़ना स्वाभाविक है। पड़ोसी देश होने के अलावा नेपाल के साथ भारत के पुराने रिश्ते हैं। उम्मीद की जानी चाहिए कि वहां परिस्थितियां जल्द से जल्द सामान्य हो सकें। चूंकि तख्तापलट के बाद बांग्लादेश अब तक स्थिर नहीं हो पाया है। बांग्लादेश में कट्टरपंथी विचारधारा को बढ़ावा मिला है। विकास की गति प्रभावित है। अर्थव्यवस्था धीमी पड़ गई है। रोजगार के नए साधन उपलब्ध नहीं हो रहे हैं। नेपाल की माली हालत भी अच्छी नहीं है। हिंसा का दौर जितनी जल्दी रुक जाएगा, वह पूरे राष्ट्र के हित में होगा।