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Home विचार वोट की पारदर्शिता पर सियासत का संग्राम

वोट की पारदर्शिता पर सियासत का संग्राम

September 2, 2025

लेखक : तरुण मिश्र
(समाजसेवी एवं राजनीतिक चिंतक हैं। राजनीतिक और सामाजिक विषयों पर लिखते हैं। देश-विदेश में आयोजित होने वाले व्याख्यानों में एक प्रखर वक्ता के रूप में जाने जाते हैं। जनसेवक के रुप में प्रख्यात है।)

भारत का लोकतंत्र केवल जनसंख्या के लिहाज से सबसे बड़ा नहीं बल्कि विविधताओं के बीच एकता की मिसाल भी है। यहां हर पांच साल में करोड़ों लोग मतदान करके अपनी सरकार चुनते हैं। एक वोट की ताकत इतनी बड़ी है कि यह सत्ता बदल सकता है, नीतियां बदल सकता है और देश का भविष्य तय कर सकता है। लेकिन जब वोटिंग प्रक्रिया में फर्जीवाड़ा, दोहरे वोट और मृतक लोगों के नाम जुड़ जाते हैं तो लोकतंत्र की इस आत्मा पर सीधी चोट होती है। यही कारण है कि वोटर कार्ड में पारदर्शिता और नागरिकों की जागरूकता आज की सबसे बड़ी मांग बन गई है। बिहार, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल जैसे चुनावी राज्यों में अक्सर यह चर्चा होती है कि वोटर लिस्ट में गड़बड़ी है। कहीं एक ही व्यक्ति के नाम पर दो-दो वोटर कार्ड बने हैं, तो कहीं मृतक लोगों के नाम सूची में मौजूद हैं। जब एक व्यक्ति को दो अलग-अलग जगह वोट डालने का मौका मिलता है तो नतीजे प्रभावित होते हैं। यह न केवल कानून का उल्लंघन है बल्कि लोकतांत्रिक मूल्यों पर सीधा प्रहार भी है। हर वोट की कीमत बराबर है और अगर एक वोट भी गलत तरीके से पड़ता है तो उसका असर पूरे परिणाम पर पड़ सकता है।

आज जब पैन कार्ड, बैंक खाता, मोबाइल नंबर और पासपोर्ट सब आधार से जुड़े हैं, तो वोटर कार्ड को क्यों नहीं? अगर वोटर आईडी आधार से लिंक हो जाए तो फर्जी कार्ड बनाने का रास्ता अपने आप बंद हो जाएगा। हर नागरिक की पहचान यूनिक होगी और डुप्लीकेट नाम हटाना आसान हो जाएगा। मृतकों के नाम भी सरकारी रिकॉर्ड से स्वतः हट सकेंगे। इससे चुनाव आयोग को हर बार महंगी और लंबी पुनरीक्षण प्रक्रिया से छुटकारा मिलेगा और मतदाता सूची अधिक पारदर्शी बनेगी। चुनाव आयोग ने मतदाता सूची को सही रखने के लिए बूथ लेवल ऑफिसर यानी बीएलओ की नियुक्ति की है। उनकी जिम्मेदारी है कि वे घर-घर जाकर जानकारी लें और सही रिकॉर्ड तैयार करें। लेकिन वास्तविकता यह है कि खासकर ग्रामीण इलाकों में बीएलओ खानापूर्ति करके नाम जोड़ते हैं। वे बैठकर पूरी सूची तैयार कर देते हैं और जांच अधूरी रह जाती है। इसका नतीजा यह होता है कि जिन लोगों का निधन हो चुका है या जो सालों से उस गांव में नहीं रहते, उनके नाम भी वोटर लिस्ट में बने रहते हैं। यह लापरवाही लोकतंत्र की नींव को खोखला करती है। केवल प्रशासनिक लापरवाही ही जिम्मेदार नहीं है, जनता की उदासीनता भी उतनी ही घातक है।

लोग जब नौकरी या पढ़ाई के लिए नए प्रदेश जाते हैं तो वहां नया वोटर कार्ड बनवा लेते हैं लेकिन पुराने को निरस्त नहीं कराते। वे यह नहीं सोचते कि दोहरी पहचान से लोकतांत्रिक व्यवस्था को नुकसान होता है। कई बार तो लोग इसे अपने फायदे का साधन मानकर जानबूझकर ऐसा करते हैं। यह समझना जरूरी है कि लोकतंत्र में व्यक्तिगत लाभ से ऊपर सामूहिक हित है। एक जागरूक मतदाता ही लोकतंत्र का सच्चा प्रहरी है। अगर हर नागरिक समय-समय पर यह सुनिश्चित करे कि उसका नाम वोटर लिस्ट में सही दर्ज है, तो आधी समस्या अपने आप खत्म हो जाएगी। अगर किसी मृतक या बाहर रहने वाले व्यक्ति का नाम सूची में हो तो उसकी सूचना चुनाव आयोग को देनी चाहिए। यह नागरिक कर्तव्य है, ठीक वैसे ही जैसे समय पर टैक्स देना या ट्रैफिक नियमों का पालन करना। जब देश डिजिटल इंडिया की ओर तेजी से बढ़ रहा है तो चुनाव प्रक्रिया भी डिजिटल तकनीक से क्यों न जोड़ी जाए? अगर आधार और मोबाइल नंबर से वोटर कार्ड लिंक हो जाए तो हर नागरिक अपने फोन पर ही वोटर लिस्ट में अपना नाम चेक और अपडेट कर सकेगा।

ई-केवाईसी की तरह चुनाव आयोग भी एक व्यवस्था बना सकता है। वोटिंग मशीनों में बायोमेट्रिक वेरिफिकेशन जोड़ दिया जाए तो फर्जी पहचान की कोई गुंजाइश ही नहीं बचेगी। यह मानना गलत होगा कि यह समस्या केवल चुनाव आयोग या जनता की है। राजनीतिक दलों की भी इसमें बड़ी भूमिका है। अक्सर देखा जाता है कि पार्टियां चुनाव आयोग पर पक्षपात का आरोप लगाती हैं या एक-दूसरे पर फर्जी वोटिंग करवाने का ठीकरा फोड़ती हैं। लेकिन सुधार के लिए ठोस सुझाव देने या सहयोग करने से बचती हैं। असली जिम्मेदारी यह है कि वे आयोग के साथ मिलकर ऐसी व्यवस्था बनाने में सहयोग करें जिससे चुनाव प्रक्रिया निष्पक्ष और पारदर्शी हो सके।

भारत निर्वाचन आयोग एक संवैधानिक निकाय है और इसकी जिम्मेदारी केवल चुनाव कराना नहीं बल्कि उन्हें निष्पक्ष और विश्वसनीय बनाना भी है। आयोग को चाहिए कि वह बीएलओ की कार्यप्रणाली पर कड़ी निगरानी रखे। वोटर कार्ड और आधार को लिंक करने की प्रक्रिया तेज करे। हर नागरिक तक जागरूकता अभियान पहुंचाए। साथ ही, आधुनिक तकनीक का अधिक से अधिक इस्तेमाल करे। जब जनता को विश्वास होगा कि चुनाव प्रक्रिया निष्पक्ष है, तभी लोकतंत्र मजबूत होगा। लोकतंत्र केवल नेताओं और संस्थाओं का नहीं बल्कि हर नागरिक का है। एक वोट सिर्फ अधिकार नहीं बल्कि जिम्मेदारी भी है। अगर हम अपने वोट की रक्षा नहीं करेंगे तो लोकतंत्र कमजोर होगा। पारदर्शिता केवल कानून और तकनीक से नहीं आएगी बल्कि जागरूकता और ईमानदारी से भी आएगी। जब हर नागरिक अपनी जिम्मेदारी निभाएगा तभी सच्चे मायनों में लोकतंत्र सुरक्षित रहेगा।

भारत का लोकतंत्र दुनिया के लिए मिसाल है। लेकिन इसे और मजबूत बनाने के लिए जरूरी है कि वोटर कार्ड की प्रक्रिया पारदर्शी हो। फर्जीवाड़ा रोकने के लिए वोटर कार्ड को आधार से लिंक करना अनिवार्य किया जाए। बीएलओ की जवाबदेही तय की जाए। राजनीतिक दल आरोप-प्रत्यारोप छोड़कर सुधार की दिशा में कदम बढ़ाएं। और सबसे अहम, जनता खुद जागरूक बने और अपनी जिम्मेदारी निभाए। लोकतंत्र की मजबूती केवल चुनाव आयोग या नेताओं पर नहीं टिकी, बल्कि हर नागरिक की जागरूकता और ईमानदारी पर आधारित है। जब जनता अपने वोट की कीमत समझेगी और फर्जीवाड़े को रोकने में सक्रिय होगी, तभी वोट की असली ताकत सामने आएगी और भारत का लोकतंत्र विश्व के सामने और भी सशक्त खड़ा होगा।

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  • Writer: Tarun Mishra
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Bijay Kumar

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