• कुरमोली के जंगलों में बाल उत्साह की मिसाल, 14 वर्षीय रविन्द्र तिवारी ने दिखाई साहस और समर्पण
• स्मृतियों की लौ जलती है, रामभक्ति और राष्ट्रभावना के लिए बाल उत्साह की प्रेरणा
उदय भूमि संवाददाता
अंबेडकर नगर/गाजियाबाद। 6 दिसंबर 2025, अयोध्या के इतिहास में एक अत्यंत महत्वपूर्ण तिथि के रूप में दर्ज है, जिसने देशभर की धार्मिक चेतना को झकझोर दिया। उसी समय अंबेडकर नगर और आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों में हजारों कारसेवक अयोध्या पहुँचने के लिए संघर्ष कर रहे थे। प्रशासनिक प्रतिबंधों और कठिन परिस्थितियों के कारण कई कारसेवक जंगलों में छिपकर रुकने को मजबूर थे। उसी कठिन समय में कुरमोली क्षेत्र के 14 वर्षीय रविन्द्र तिवारी ने अद्भुत साहस और सेवा की मिसाल पेश की। उन्होंने अपने छोटे कद और कम उम्र के बावजूद जंगलों में छिपे कारसेवकों तक भोजन, पानी और आवश्यक सामग्री पहुँचाने का जिम्मा उठाया। रविन्द्र कहते हैं, वह समय साहस, आस्था और त्याग की परीक्षा का था। हम सिर्फ बच्चे थे, लेकिन राम मंदिर आंदोलन के प्रति हमारी आस्था इतनी प्रबल थी कि भय का कोई स्थान ही नहीं था। रविन्द्र तिवारी ने बताया कि उनके जैसे हजारों बालक अयोध्या और अंबेडकर नगर में छिपे कारसेवकों तक खाना, पानी और अन्य आवश्यक चीज़ें पहुँचाने का कार्य करते रहे। उस सेवा ने हमें जीवन का अर्थ सिखाया। रामकाज में लगना ही सबसे बड़ा सौभाग्य था।
उस समय न उम्र की सीमा थी और न परिस्थितियों का डर-सिर्फ रामभक्ति और राष्ट्रभावना का संकल्प था। उन दिनों बच्चे न केवल अपने साहस से बल्कि रणनीति और बुद्धिमानी से भी कारसेवकों तक मदद पहुँचाते थे। कई बच्चे रात के समय जंगलों में खाना और पानी लेकर जाते, तो कुछ मार्गों की निगरानी करते ताकि प्रशासनिक कठिनाइयों के बावजूद कारसेवक सुरक्षित रह सकें। यह प्रयास न केवल धार्मिक भावना का प्रतीक था, बल्कि युवाओं में अनुशासन, समर्पण और सेवा की भावना को भी प्रदर्शित करता था। वर्तमान में रविन्द्र तिवारी गाजियाबाद में निजी बैंक में वरिष्ठ सलाहकार के पद पर कार्यरत हैं। उनके अनुसार, पेशे के साथ-साथ सेवा भावना उनके जीवन का सबसे बड़ा उद्देश्य है। 6 दिसंबर की यह ऐतिहासिक तिथि उन्हें और सभी युवाओं को याद दिलाती है कि किसी भी उम्र में सेवा और त्याग का कार्य किया जा सकता है।
रविन्द्र तिवारी की स्मृति केवल व्यक्तिगत साहस की कहानी नहीं है, बल्कि यह उन हजारों बाल स्वयंसेवकों की भी गाथा है जिन्होंने राम आंदोलन के दौरान कठिनाइयों के बावजूद अपनी जिम्मेदारी निभाई। इस दिन की यादें आज भी युवाओं को देशभक्ति, त्याग और सेवा की प्रेरणा देती हैं। 6 दिसंबर न केवल अयोध्या के इतिहास में, बल्कि भारतीय युवाओं के जीवन में भी प्रेरणा का स्रोत है। बालक कारसेवकों के साहस और त्याग की कहानी यह दर्शाती है कि कठिन समय में भी आस्था, साहस और सेवा की भावना से बड़ी उपलब्धियाँ हासिल की जा सकती हैं। इस ऐतिहासिक दिन की स्मृतियाँ आज भी नए पीढिय़ों को प्रेरित करती हैं। हजारों बालक, जो राम आंदोलन के समय स्वयंसेवक बने, उनकी सेवा और त्याग की भावना आज भी देशभक्ति और धर्मनिष्ठा का संदेश देती है। 6 दिसंबर की यह गाथा यह दिखाती है कि सेवा और समर्पण केवल उम्र या स्थिति पर निर्भर नहीं करते, बल्कि यह आस्था और इच्छाशक्ति से संभव है।
















