प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग फेल, हालत बेकाबू

– कोविड हॉस्पिटल में संसाधनों का टोटा, इलाज की दुश्वारी

– अधिकारी नहीं उठाते फोन, अफसरों पर बरसे मंडलायुक्त

गाजियाबाद। कोरोना संक्रमण के बढ़ते मामलों के चलते जिले में जिला प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग की सभी व्यवस्थाएं धत्ता साबित हो रही है। कोरोना के कहर के चलते जहां मौत का आंकड़ा बढ़ रहा है। वहीं, ऑक्सीजन और अस्पतालों में बेड को लेकर हा-हाकार मच रहा है। कोरोना से जंग में जिला प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग पूरी तरह विफल साबित हो रहा है। ऑक्सीजन केेे अभाव में लोगों की सांसें फूल रही है। जिले में रोजाना करीब 7 हजार सिलेंडर की जरूरत है,मगर 4 हजार तक ही सिलेंडर मिल रहे है। आलम यह है कि जिला प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग कोरोना संक्रमित मरीजों को पर्याप्त मात्रा में ऑक्सीजन उपलब्ध नहीं करा पा रहा है। जिले में 3 हजार सिलेंडर की कमी है। 34 सरकारी और निजी कोविड अस्पतालों में 2342 बेड के सापेक्ष 2270 मरीज भर्ती है। जबकि 1259 संक्रमित होम आइसोलेशन में हैं। इनमें से करीब 20 फीसद को ही ऑक्सीजन दी जा रही है। जिले में ऑक्सीजन की बढ़ जाने के बाद इंतजाम नाकाम हो रहे है। गुरूवार को एसडीएम ने कई औद्योगिक क्षेत्रों में फैक्ट्री में ऑक्सीजन की सप्लाई करने वाली कंपनियों का निरीक्षण किया। ऑक्सीजन सिलेंडर की दर भी बढ़ गई है। छोटे सिलेंंडर में 1.5 क्यूबिक मीटर ऑक्सीजन आती है इसकी कीमत 250 रुपए है। जबकि बड़े सिलेंडर में 7.2 क्यूबिक मीटर ऑक्सीजन आती है, इसकी कीमत 400 रुपए है। वेंटीलेटर पर सबसे अधिक ऑक्सीजन की खपत होती है। एक दिन में पांंच-पांंच सिलेंडर की खपत हो जाती है। मेरठ मंडल के मंडलायुक्त सुरेंद्र सिंह ने अधिकारियों को स्पष्ट निर्देश दिए कि ऑक्सीजन और बेड की पर्याप्त व्यवस्था कराई जाए। अधिकारियों द्वारा फोन नहींं उठाए जाने की शिकायत को कमिश्नर ने गंभीरता से लिया और प्रशासनिक अधिकारियों को पूरी तरह से अलर्ट रहने का निर्देश दिया। हालांकि अधिकारियों की भी जिम्मेदारी बढ़ गई और उन्हें भी कई तरह की चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है।

मरीजों को उपचार के लिए अस्पतालों में बेड, ऑक्सीजन और इंजेक्शन समय पर नहीं मिल रहे हैं। बेबस होकर मरीजों के परिजन अब जन प्रतिनिधियों से संपर्क कर रहे है। जनप्रतिनिधि जब प्रशासनिक अधिकारियों के पास फोन करते हैं तो उनका भी फोन नहीं उठा रहे है। उपचार समय पर नहीं मिलने के कारण मरीजों को इलाज में मदद नहीं मिलती है। पिछले दिनों केंद्रीय मंत्री एवं गाजियाबाद के सांसद जनरल के सिंह को भी कोरोना पीड़ित एक व्यक्ति की मदद के लिए ट्विटर के जरिए जिला प्रशासन से मदद मांगनी पड़ी थी। आलम यह है कि कुछ पुलिस अधिकारी भी प्रशासनिक अधिकारियों द्वारा फोन न उठाए जाने की शिकायत कर रहे हैं। इसकी शिकायत उच्चाधिकारियों तक पहुंच रही है। जिला प्रशासन ने जनप्रतिनिधियों से सहयोग की अपील की है, लेकिन उनसे संपर्क करना बंद कर दिया है। पार्षद हिमांशु मित्तल का कहना है कि पहली लहर में कोरोना के मामले जब बढ़ रहे थे तब जिला प्रशासन ने ज्यादातर वार्डों में कोरोना टेस्ट कराने के लिए कैंप लगवाए थे लेकिन इस समय कोरोना टेस्ट कराने के लिए स्थान सीमित हैं। दूर-दूर से लोग एमएमजी अस्पताल आ रहे हैं, यहां पर घंटों लाइन में लगते हैं। ऐसे में स्वस्थ लोगों के भी संक्रमण की चपेट में आने का खतरा उत्पन्न हो जाता है। अगर वार्डों में ही कोरोना टेस्ट कराने की व्यवस्था हो तो इस तरह का खतरा कम होगा और व्यवस्था में भी सुधार होगा। वहीं, कोरोना टीका लगवाने के लिए लोगों की लंबी लाइन लग रही है।कोरोनारोधी टीका लगाया जा रहा है लेकिन कई सेंटर ऐसे हैं, जहां पर आवश्यकता के अनुसार वैक्सीन नहीं पहुंच रही है। इस कारण लोगों को परेशानी का सामना करना पड़ता है। लोगों को टीका लगवाने में परेशानी हो रही है। मेरठ मंडल के मंडलायुक्त सुरेंद्र सिंह का कहना है कि कोरोना संक्रमण के फैलने से रोकने और मरीजों को उपचार दिलाने के लिए प्रशासनिक अधिकारियों को सतर्क रहने को कहा गया है। जिले के सभी अधिकारियों को सख्त निर्देश दिए गए हैं कि वह फोन जरूर उठाएं। अगर फोन नहीं उठाने की फिर से शिकायत आती है तो संबंधित अधिकारी के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी। ताकि मरीजों को परेशानी का सामना न करना पड़े। उन्हें उपचार उपलब्ध कराया जा सके।