-पिस्टल-राइफल, बंदूक, रिवाल्वर एवं कारतूस बिक्री में 90 फीसदी गिरावट
गाजियाबाद। जिले में शस्त्र लाइसेंस न बनने और अघोषित रोक और कारतूसों को खरीदने पर जिला प्रशासन द्वारा लगाई गई बंदिशों की वजह से अब शस्त्रों के कारोबार में भी भारी गिरावट आ गई है। हथियारों की बिक्री जहां 95 फीसदी तक घट गई है,वहीं,कारतूस की बिक्री भी लगभग 90 फीसदी तक घट गई है। शस्त्रों की खरीद-फरोख्त करने वालों से गुलजार रहने वाली प्रताप गन हाउस से लेकर अन्य शस्त्रों की दुकानों के संचालक अब एयर पिस्टल और एयर राइफल खरीदने वाले खिलाडिय़ों के भरोसे ही रहते दिख रहे हैं।जिले में एक दशक तक शस्त्र लाइसेंस बनवाने पर ज्यादा पाबंदियां नहीं थीं। शस्त्र लाइसेंस जिलाधिकारी द्वारा आसानी से बना दिए जाते थे,लेकिन एक दशक में लाइसेंस बनाने की संख्या में करीब 95 फीसदी तक गिरावट आई है। इसकी वजह से नए शस्त्रों की बिक्री भी इसी अनुपात में कम हो गई है।
शहर की 11 शस्त्र दुकानों पर अब ज्यादातर ग्राहक कारतूस खरीदने,हथियारों की सर्विस कराने या एयर पिस्टल व एयर राइफल खरीदने पहुंच रहे हैं। कविनगर में शस्त्र दुकान चलाने वाले प्रताप गन हाउस के मालिक दुष्यंत प्रताप सिंह का कहना है कि हथियारों की बिक्री तो करीब एक दशक से कम है लेकिन तीन-चार साल पहले तक कारतूस की बिक्री पर इतनी पाबंदियां नहीं थीं,जितनी अब जिला प्रशासन ने लगा दी हैं। शस्त्र धारक को कारतूस खरीदने से पहले न सिर्फ एसडीएम की अनुमति लेना जरूरी है। बल्कि अधिकारी भी एक बार में सिर्फ 10 कारतूस खरीदने की अनुमति दे रहे हैं।कारतूस खरीदने से पहले शस्त्र लाइसेंस बनवाने की तरह संबंधित थाने और पुलिस चौकी से रिपोर्ट ली जा रही है। कारतूस खरीदने के लिए एसडीएम कार्यालय में पहुंचने वाले आवेदन पत्रों को यहां से संबंधित थाने में भेज दिया जाता है।
थानों से उस क्षेत्र की पुलिस चौकी से रिपोर्ट ली जाती है,जिस क्षेत्र में शस्त्र लाइसेंस धारक रहता है। चौकी इंचार्ज पूछताछ कर पता करते हैं कि कारतूस की आवश्यकता क्यों है और पुराने कारतूस कहां इस्तेमाल किए।इसका पूरा ब्योरा देने के बाद ही कारतूस खरीद सकते है।वहीं,कारतूस खरीदने वालों के लिए पुराने खोखे जमा कराना भी अनिवार्य कर रखा हैं। शस्त्र धारक इन खोखों को दुकानदार को देता है और दुकानदार पुलिस लाइन में जमा कराकर इसके दस्तावेज जिलाधिकारी कार्यालय में जमा कराते हैं। इस प्रक्रिया में फंसने की वजह से शस्त्र लाइसेंस धारक अब नए कारतूस खरीदने से भी बच रहे हैं। कई लाइसेंस धारक ऐसे हैं जिन्होंने 10 साल से कारतूस ही नहीं खरीदे।
प्रताप गन हाउस के मालिक दुष्यंत प्रताप सिंह का कहना है कि प्रक्रिया कठिन होने से कारतूस की बिक्री भी घट गई है। वहीं,एसडीएम सदर विनय कुमार सिंह का कहना है कि बगैर दस्तावेज के कारतूस खरीदने पर पाबंदी है।ताकि कारतूस का गलत इस्तेमाल होने से रोका जा सकें। वहीं,शहर में कई दुकानदारों ने अब असली हथियार बेचने की बजाय निशानेबाजी की पिस्टल और राइफलों का शोरूम खोल लिया है। निशानेबाजी का शौक रखने वाले खिलाड़ी महंगे हथियार खरीदते हैं। इनसे दुकान संचालक रोजगार चला रहे हैं। जबकि खिलाडिय़ों के लिए कारतूस खरीदने के नियम भी सरल है।ऐसे दुकानदार अब अपना कारोबार चला रहे हें।
















