अमेरिका के पीछे हटने के कारण अफगानिस्तान में हालात निरंतर बिगड़ रहे हैं। नागरिकों का सुख-चैन एवं सुकून गायब हो रहा है। निकट भविष्य में परिस्थितियां बेहद भयावह होने की आशंका ने प्रत्येक अमन-पसंद अफगानी की नींद उड़ा रखी है। आधी आबादी को खुलकर जीने की आजादी छिनने का डर सता रहा है। अमेरिका की शत-प्रतिशत फौज ने अभी अफगास्तिान से कूच भी नहीं किया है कि तालिबान ने 85 प्रतिशत हिस्से पर अपना कब्जा कर लिया है। तालिबान के लड़ाके इरान सीमा तक पहुंच गए हैं। जहां कुछ चेक पोस्ट पर वह कब्जा जमा चुके हैं। अफगानिस्तान की मौजूदा स्थिति पर अमेरिका की पैनी नजर है। अमेरिकी राष्ट्रपति बाइडेन ने अफगान की जनता को ऊर्जा देने के लिए एक अह्म बयान दिया है। बाइडेन ने कहा है कि अफगानिस्तान के 3 लाख सैनिकों पर तालिबान के 75 हजार लड़ाके भारी नहीं पड़ेंगे। बाइडेन का यह बयान जमीनी हकीकत से कोसों दूर है। विदेशी सैनिकों की रवानगी से अफगान सुरक्षा बलों का मनोबल टूट गया है। तालिबान लड़ाकों के क्रूर तरीकों से वह भली-भांति वाकिफ हैं। इसके चलते बड़ी संख्या में अफगान के सैनिकों ने अपनी जान बचाने के लिए पड़ोसी देशों में शरण लेना मुनासिब समझा है। अमेरिकी राष्ट्रपति के बयान से अफगानिस्तान की जनता इत्तेफाक नहीं रखती है। अमेरिका और तालिबान के बीच समझौता होने के बाद से जनता डरी-सहमी है। जिस जल्दबाजी में अमेरिकी सैनिक अफगानिस्तान की धरती छोडक़र स्वदेश लौट रहे हैं, उससे कई सवाल खड़े हो रहे हैं। ऐसे में अमेरिका को आलोचना भी झेलनी पड़ रही है। इसके मद्देनजर वह अपने फैसलों का बचाव करने को निराधार तर्क दे रहा है। अफगानिस्तान में तालिबान की वापसी ने रूस और चीन जैसे ताकतवर मूल्कों को भी टेंशन दी है। रूस ने हाल ही में तालिबान के कुछ प्रतिनिधियों से वार्ता की है। इस वार्ता के दौरान रूस ने तालिबान से यह आश्वासन लिया है कि भविष्य में वह उसके (रूस) के सहयोगी देशों को परेशान नहीं करेगा। इस पर तालिबान ने सहमति भी दे दी है। इस बीच पाकिस्तान की वजह से चीन की टेंशन भी दूर हो गई है। तालिबान ने चीन को अपना दोस्त करार दे दिया है। दरअसल चीन में उईगुर मुस्लिमों पर लंबे समय से ज्यादती हो रही है। चीन के शिंजयांग प्रांत में दस लाख से ज्यादा उईगुर मुस्लिमों को प्रशिक्षण के नाम पर बंधक बनाकर रखा गया है। अमेरिका समय-समय पर यह मुद्दा जोर-शोर से उठाता रहा है। चीन को डर है कि अफगानिस्तान में तालिबान का राज आने पर उईगुर मुस्लिमों के समर्थन में तालिबान लड़ाके आ सकते हैं। इससे चीन की शांति व्यवस्था को बड़ा खतरा पैदा हो सकता है। तालिबान ने फिलहाल साफ कर दिया है कि चीन के खिलाफ उईगुर मुस्लिमों के किसी भी इरादे का सपोर्ट नहीं करेगा। तालिबान की इस घोषणा ने शी जिनपिंग सरकार को राहत की डोज दी है। अफगानिस्तान में बदली परिस्थितियों से चिंतित भारत भी हरसंभव कदम उठा रहा है। वह किसी न किसी माध्यम से तालिबान के प्रमुख नेताओं के संपर्क में है। भारत की सबसे बड़ी चिंता जम्मू-कश्मीर को लेकर है। जहां पाकिस्तान के इशारे पर काफी समय से आतंकवाद को बढ़ावा दिया जा रहा है। माना जा रहा है कि पाकिस्तान को खुश करने के लिए तालिबान के लड़ाके जम्मू-कश्मीर को अस्थिर करने की साजिश रच सकते हैं। चीन और पाकिस्तान के कारण भारत पहले से परेशान हैं। पाकिस्तान ने भारत की चिंताओं को और बढ़ाना शुरू कर दिया है। पाकिस्तानी सेना ने बयान दिया है कि अफगानिस्तान में भारत का निवेश डूब रहा है। यह बयान एक तरह से भारत को चिढ़ाने का प्रयास है। तालिबान का रिकॉर्ड खराब रहा है। इसे देखकर उसके दावों पर भरोसा करना बेबकूफी होगा। अफगानिस्तान में अमेरिका व नाटो देशों के सैनिक पिछले करीब 20 साल से तालिबान के खिलाफ संघर्ष कर रहे थे। इस संघर्ष में अमेरिका को काफी नुकसान उठाना पड़ा। जिस मकसद से अमेरिका ने यह कदम उठाया था, वह आज भी पूरा नहीं हो सका है। अफगानिस्तान से तालिबान को खदेडऩे के लिए शुरू हुआ अमेरिका का संघर्ष अब तालिबान की वापसी पर जाकर समाप्त हो रहा है। सवाल उठता है कि कोई आतंकी संगठन इतना बड़ा और मजबूत कैसे हो सकता है कि ताकतवर मूल्क भी उसका कुछ न बिगाड़ पाएं। तालिबान के जड़ से समाप्त न होने के पीछे दो मुख्य कारण हैं। पहला कारण पाकिस्तान द्वारा इस संगठन को हमेशा सपोर्ट करना रहा है। दूसरा कारण ताकतवर मूल्कों के मध्य आपसी तनातनी होना। अमेरिका और रूस जैसे मूल्क यदि मिलकर संघर्ष करते तो आज तालिबान का नाम लेवा भी कोई नहीं होता। वर्तमान में चीन और रूस में मधुर संबंध हैं। जबकि अमेरिका के इन दोनों देशों के साथ तल्ख रिश्ते हैं। जिनका फायदा पाकिस्तान और तालिबान का मिल रहा है। आतंकवाद के खिलाफ भारत की ठोस रणनीति का अभाव नजर आता है। इसी का नतीजा है कि आज तक पाकिस्तान को इस कदर मुंहतोड़ जबाव नहीं मिल पाया कि वह दोबारा भारत से उलझने की हिमाकत न कर सके। भारत को इजरायल जैसे देशों से सिखने की जरूरत है। इजरायल अपने दुश्मनों को ऐसा जख्म देता है, ताकि वह दोबारा कोई हरकत करने से पहले सौ बार सोचें। तालिबान की तरफ से भविष्य में मिलने वाली संभावित चुनौतियों से निपटने के लिए भारत को तैयार रहना चाहिए। पाकिस्तान के उकसावे पर तालिबान भारत के खिलाफ कोई कदम न उठाए, इसे लेकर प्रभावी रणनीति बनानी होगी। अमेरिका की बजाए रूस से संबंधों को मजबूत करने की जरूरत है। चीन और पाकिस्तान से सटी सीमाओं पर कड़ी निगरानी रखनी होगी। अफगानिस्तान का कंट्रोल अपने हाथों में लेने के बाद तालिबानी लड़ाके शांत नहीं बैठेंगे। भारत की विदेश नीति ऐसी होनी चाहिए कि जहां वार्ता की जरूरत है वहां वार्ता की जाए, मगर जहां मुंहतोड़ जबाव देना हो, वहां पूरी ताकत के साथ दुश्मनों को जबाव देने में देर न हो।
















