भाजपा का 42 साल का सफर

भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की स्थापना को 42 वर्ष हो गए हैं। वर्तमान में भाजपा देश ही नहीं बल्कि दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी बन गई है। कई करोड़ कार्यकर्ताओं ने भाजपा को आज जिस मुकाम पर पहुंचा दिया है, वह आमतौर पर कम देखने को मिलता है। भाजपा का डंका अब देश-दुनिया में बज रहा है। लोकसभा के साथ-साथ राज्यसभा में भी पार्टी की ताकत सबसे ज्यादा है। भाजपा की स्थापना 6 अप्रैल 1980 को नई दिल्ली में अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी ने की थी। इसके पहले ये नेता भारतीय जनसंघ और बाद में जनता पार्टी में थे। पूर्व प्रधानमंत्री एवं भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेयी अब हमारे बीच में नहीं हैं।

अस्वस्थ रहने के कारण कुछ साल पहले उनका निधन हो गया था। पूर्व उप-प्रधानमंत्री एवं भाजपा के कद्दावर नेता लालकृष्ण आडवाणी सक्रिय राजनीति से दूर हैं। वह भाजपा के संरक्षक की भूमिका निभा रहे हैं। 1980 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को सिर्फ 2 सीटों पर सफलता मिल पाई थी। आज यह 301 सांसदों के साथ देश की केंद्रीय सत्ता पर विराजमान सबसे बड़ी पार्टी बन गई है। संसद में प्रतिनिधित्व और सदस्यता के मामले में भाजपा देश में सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी है। 1980 के दशक की शुरूआत में अपनी स्थापना के बाद से भाजपा ने लंबा सफर तय किया है। अनेक बाधाओं और विफलता को पार कर भारतीय राजनीतिक परिदृश्य में पार्टी ने मजबूत मुकाम बना लिया है।

इसके अलावा लंबे वक्त तक भारत की राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय नीतियों को चलाने वाले वैचारिक ढांचे को उलट दिया है। भाजपा का गठन बेशक 1980 को हुआ था, मगर इसकी वैचारिक उत्पत्ति 1951 से हो गई थी। जब कांग्रेस के राजनेता श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने नेहरू के नेतृत्व से अलग होकर भारतीय जनसंघ का गठन किया था। कांग्रेस की राजनीतिक प्रथाओं के विरोध में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के सहयोग से पार्टी गठित की गई थी। भाजपा का जनादेश हिंदू पहचान और संस्कृति का संरक्षण था। यह ऐसे समय में स्थापित हुई थी, जब भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस व्यावहारिक रूप से भारतीय राजनीति का चेहरा थी, तब से भारतीय जनसंघ अपने शुरूआती वर्षों में मुश्किल से ही सफल हो पाई थी।

1952 के आम चुनाव में भारतीय जनसंघ लोकसभा की सिर्फ 3 सीटें जीत सकी थी। भाजपा तीन दशकों में राज्यसभा में 100 सांसद रखने वाली पहली पार्टी बन गई है। तीन-चार पीढ़ियों ने पार्टी को गौरवशाली बनाने के लिए खुद को समर्पित कर दिया। भाजपा आज विश्व की सबसे बड़ी पार्टी होने का दावा तो कर ही रही है, देश में पहले स्थान पर भी कायम है, मगर जिस तरह से विभिन्न क्षेत्रों में विभिन्न दलों से चुनौतियां मिल रही हैं, उससे भाजपा को पहले स्थान पर बने रहने की चुनौती सामने है। दरअसल जिस तरह ऊंचाई पर पहुंचने से ज्यादा कठिन ऊंचाई पर टिके रहना है। भाजपा भी लगभग इसी स्थिति से गुजर रही है।

चार दशक में ही शून्य से शिखर पर पहुंची यह पार्टी देश के साथ-साथ अधिकांश राज्यों में सत्ता पर काबिज है। संघ का एक अनुषांगिक संगठन होने के साथ-साथ भाजपा देश की सबसे बड़ी पार्टी है। पूरे देश में कांग्रेस ही भाजपा को चुनौती दे सकती है, मगर इस समय कांग्रेस के हाथ से एक के बाद एक राज्य खिसकते जा रहे हैं और क्षेत्रीय दल विकल्प बन रहे हैं। हाल ही में पांच राज्यों के चुनाव में कांग्रेस के हाथ से एकमात्र पंजाब राज्य भी निकल गया और वहां आप पार्टी की सरकार बनी, जिसने कांग्रेस के गढ़ दिल्ली को पहले ही ध्वस्त कर दिया है। भाजपा के लिए दिल्ली में सरकार बनाना भी मुश्किल हो गया है।

जिन राज्यों में क्षेत्रीय दल सरकार में हैं, वहां कांग्रेस तो किनारे हो ही रही है, भाजपा को भी वहां सेध लगाना आसान नहीं रहा। चाहे पश्चिमी बंगाल हो दिल्ली, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश हो और अब 2024 के लिए क्षेत्रीय दल भाजपा को रोकने के लिए आपस में गठबंधन कर रहे हैं। पार्टी निरंतर विस्तार पर जोर दे रही है। इसके लिए वह किसी भी प्रकार के समझौते या गठबंधन से भी परहेज नहीं कर रही है। सरकार में आने के बाद धीरे-धीरे उन मुद्दों को हल कर रही है, जिन्हें लेकर वर्षों से आवाज उठती रही है। चाहे अयोध्या में राम मंदिर का मामला हो या कश्मीर में धारा-370 का, पार्टी पीढ़ी परिवर्तन के दौर से भी गुजर रही है, मगर जरूरत के हिसाब से ही नियमों को सहज व सरल बना दिया जाता है।

पार्टी में उन्हीं नेताओं को वरीयता देने का क्रम शुरू हो गया है, जिनमें हर हाल में चुनाव जीतने का मादा हो। चाहे वे किसी भी क्राइटेरिया में आते हों। पार्टी ने पूरे देश में दिग्गज नेताओं का जनाधार वाले नेताओं का जो दल बदल कराया है, उससे पार्टी ने भविष्य की रूपरेखा भी तैयार कर ली है। पार्टी की निगाहें इस समय सबसे ज्यादा अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति वर्ग पर हैं।

इन्हें पार्टी से जोड़ने के लिए विभिन्न प्रकार की योजनाएं संचालित हो रही हैं। कार्यक्रम भी इन वर्गों को प्रभावित करने के लिए आयोजित किए जा रहे हैं। कुल मिलाकर चार दशक में भाजपा जिन ऊंचाइयों पर पहुंच गई है, अब सबसे बड़ी चुनौती शिखरपर टिके रहने की है। एक तरफ जहां विपक्षी दल लामबंद हो रहे हैं, वहीं महंगाई और बेरोजगारी जैसे मुद्दे भी खूब उछल रहे हैं।