प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मंत्रिमंडल का विस्तार आखिरकार हो गया है। नए सदस्यों ने काम भी शुरू कर दिया है। केंद्रीय मंत्रिमंडल के विस्तार में उत्तर प्रदेश को ज्यादा तवज्जो मिली है। इसका कारण साफ है। उत्तर प्रदेश में अगले साल विधान सभा चुनाव होने है। भाजपा किसी कीमत पर इस राज्य में अपनी पकड़ ढीली नहीं होने देना चाहती है। यूपी में लंबे समय बाद भाजपा ने सत्ता का स्वाद चखा है। वर्ष-2017 में मोदी लहर में भाजपा ने भारी बहुमत से जीत दर्ज की थी। 4 साल से ज्याादा समय से मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में सरकार का संचालन हो रहा है। फिलहाल भाजपा ने मिशन-2022 की तैयारियां तेज कर दी हैं। आंतरिक कलह को दूर कर संगठन को मजबूत करने की कवायद चल रही है। यूपी चुनाव से पहले आरएसएस भी सक्रिय हो गई है। मोदी मंत्रिमंडल के विस्तार के दरम्यान यूपी को महत्व मिलने की चर्चाएं पहले से चल रही थीं। दरअसल दिल्ली की सत्ता का रास्ता इस राज्य से होकर गुजरता है। लोकसभा में उत्तर प्रदेश का सर्वाधिक प्रतिनिधित्व होता है। 80 सीटों के लिए सभी राजनीतिक दल एड़ी-चोटी का जोर लगाने से पीछे नहीं हटते हैं। केंद्रीय मंत्रिमंडल में यूपी से 14 सदस्य हो गए हैं। इनमें रुहेलखंड से एक, बुंदेलखंड से 2, पश्चिम उत्तर प्रदेश से 3, अवध से 4 और पूर्वांचल से 5 सदस्य शामिल हैं। इन सदस्यों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अलावा राजनाथ सिंह, स्मृति इरानी, महेंद्र नाथ पांडेय, हरदीप सिंह पुरी, साध्वी निरंजन ज्योति, वीके सिंह, संजीव बालियान, कौशल किशोर, अनुप्रिया पटेल, पंकज चौधरी, भानु प्रताप वर्मा, बीएल वर्मा, अजय कुमार मिश्र व एस.पी. सिंह बघेल शामिल हैं। उत्तर प्रदेश में पिछले दिनों जिला पंचायत अध्यक्ष के चुनाव संपन्न कराए गए थे। जिला पंचायत चुनाव के नतीजे आने के बाद से भाजपा काफी उत्साहित है। जिला पंचायत अध्यक्ष की 67 सीट पर भाजपा ने जीत दर्ज की थी। पूरा जोर लगाने के बावजूद समाजवादी पार्टी (सपा) महज 6 सीटें जीत पाई। जबकि 4 सीट निर्दलीय उम्मीदवारों के हाथ लगी। बहुजन समाज पार्टी (बसपा) ने इस चुनाव में भाग नहीं लिया था। पंचायत अध्यक्ष चुनाव के परिणाम देखने के बाद भाजपा का शीर्ष नेतृत्व यूपी में आगामी विधान सभा चुनाव के लिए ठोस रणनीति बनाने पर ध्यान दे रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह का चुनावी क्षेत्र यूपी रहा है। मोदी ने वाराणसी और राजनाथ ने लखनऊ संसदीय सीट से जीत दर्ज की थी। भाजपा को निरंतर दूसरी बार सत्ता दिलाने में यूपी की अह्म भूमिका रही है। उप्र विधान सभा चुनाव के परिणाम जातीय और सामाजिक समीकरण से सधते हैं। इसमें विकास संबंधी घोषणाओं का भी योगदान होता है। सवर्णों के साथ गैर-यादव ओबीसी और गैर-जाटव दलितों को अपने कोर वोट बैंक में तब्दील करने के अभियान में 2014 से भाजपा जुटी है। इसका काफी फायदा भी पार्टी को मिला है। केंद्रीय मंत्रिमंडल विस्तार में इसे और मजबूती दी गई है। केंद्रीय मंत्रिमंडल से स्वास्थ्य मंत्री डॉ. हर्षवर्धन की छुट्टी किए जाने के पीछे भी अह्म वजह है। दरअसल कोरोना संक्रमण की दूसरी लहर में हालात जिस कदर बिगड़े थे, उससे मोदी सरकार की छवि पर असर पड़ा। उत्तर प्रदेश में भी कोरोना की दूसरी लहर ने खूब कहर बरपाया था। ऐसे में जनता के बीच अच्छा संदेश नहीं गया। माना जाता है कि केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री के तौर पर कोरोना काल में अपनी जिम्मेदारी निभाने में डॉ. हर्षवधन चूक गए। इसलिए उन्हें पद से हटाने के अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं था। उन्हें हटाकर डैमेज कंट्रोल की कोशिश भी की गई है। सरकार ने जनता को यह मैसेज देने का प्रयास किया है कि, कोरोना संक्रमण से निपटने के लिए वह किसी तरह की लापरवाही और कमी को बरदाश्त नहीं करेगी। उत्तर प्रदेश में अगले विधान सभा चुनाव के मद्देनजर सत्ताधारी भाजपा को चुनौती देने के लिए अब तक विपक्ष कोई ठोस रणनीति नहीं बना पाया है। बसपा ने अकेले दम पर विस चुनाव में उतरने का ऐलान कर रखा है। सपा और आम आदमी पार्टी (आप) के मध्य चुनावी गठजोड़ होने की चर्चाएं चल रही हैं। कांग्रेस की स्थिति अभी साफ नहीं है। उप्र में कांग्रेस के कमजोर होने का सबसे ज्यादा फायदा सपा-बसपा जैसे क्षेत्रीय दलों को मिला था। इन दलों ने कई बार सत्ता का स्वाद भी चखा। सपा-बसपा की बढ़ती ताकत के कारण भाजपा इस राज्य की सत्ता में आने को छटपटाती रही। भाजपा को 4 साल पहले अपने मकसद में कामयाबी मिल पाई थी। जानकारों का मानना है कि अगले विधान सभा चुनाव में भाजपा को सपा-आप के संभावित गठजोड़ से चुनौती मिल सकती है। बसपा का अपने दम पर सत्ता में लौटने की संभावनाएं अभी दूर-दूर तक दिखाई नहीं दे रही हैं। कांग्रेस भी बेदम नजर आती है। सिर्फ प्रियंका गांधी बाड्रा के जरिए कांग्रेस का यूपी की सत्ता में लौटना संभव नहीं है। इन परिस्थितियों में भाजपा की स्थिति बेहतर दिखाई देती है। विपक्ष का कमजोर होना भाजपा के लिए किसी संजीवनी से कम नहीं होगा। जिला पंचायत अध्यक्ष चुनाव में करारी हार मिलने के बाद से समाजवादी पार्टी (सपा) सदमे में है। सपा संरक्षक मुलायम सिंह यादव स्वास्थ्य कारणों से सक्रिय राजनीति से दूर हैं। सपा के कद्दावर नेता एवं मुस्लिम चेहरे मो. आजम खां भी लंबे समय से अस्वस्थ चल रहे हैं। योगी सरकार द्वारा शिकंजा कसे जाने के बाद से आजम खां की मुश्किलें कम नहीं हो सकी हैं। सपा से अलग होकर शिवपाल यादव अलग पार्टी का नेतृत्व कर रहे हैं। प्रो. रामगोपाल यादव भी कभी-कभार कार्यकर्ताओं के बीच देखने को मिलते हैं। ऐसे में अगले विस चुनाव में सपा की नाव को पार लगाने का सबसे महत्वपूर्ण जिम्मा अखिलेश यादव पर है। सपा कार्यकर्ताओं को ऊर्जावान बनाने के लिए उन्होंने अब तक कोई प्रभावी पहल नहीं है। इस सबके चलते भाजपा का पलड़ा भारी है।
















