कोरोना वायरस के नए स्वरूप ओमिक्रॉन की तेज रफ्तार ने चिंता बढ़ा दी है। दक्षिण अफ्रीका में तस्दीक होने के बाद से वायरस का यह घातक स्वरूप अभी तक 38 देशों में अपना विस्तार कर चुका है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ओमिक्रॉन के फैलाव पर निरंतर पैनी नजर रखा रहा है। इसकी रोकथाम और बचाव के लिए भी डब्ल्यूएचओ समय-समय पर जरूरी जानकारी दे रहा है। भारत में भी ओमिक्रॉन का प्रकोप बढ़ता दिखाई दे रहा है। ओमिक्रॉन से निपटने के पूरी दुनिया सतर्क होने के साथ-साथ आवश्यक कदम उठा रही है, मगर वायरस के घातक स्वरूप को रोकना मुमकिन नहीं लग रहा है।
कोई देश जब तक एहतियातन कदम उठाता है तब तक ओमिक्रॉन वहां दस्तक देकर अपना असर दिखाना शुरू कर देता है। ओमिक्रॉन की घातकता को लेकर जिस तरह की खबरें सामने आ रही हैं, उससे डर और बेचैनी भी बढ़ रही है। भारत जैसे विशाल आबादी वाले देश में एक बार फिर कोरोना संक्रमण को लेकर घबराहट साफ देखने को मिल रही है। इस बीच अच्छी बात यह है कि ओमिक्रॉन संक्रमित किसी मरीज की मौत होने की पुष्टि नहीं हुई है। डब्ल्यूएचओ का कहना है कि ओमिक्रॉन प्रभावित किसी भी देश से अब तक किसी मरीज की जान जाने की खबर नहीं मिली है। डब्ल्यूएचओ ने कहा है कि बेहद ज्यादा म्यूटेशन वाला यह कोविड-19 स्ट्रेन कितना खतरनाक है, इसकी सही जानकारी मिलने में अभी कई सप्ताह का समय लगेगा।
कोरोना के ओमिक्रॉन स्वरूप से सबसे ज्यादा प्रभावित साउथ अफ्रीका है। दक्षिण अफ्रीका में ओमिक्रॉन का पहला मामला 24 नवंबर को प्रकाश में आया था। इसके बाद से वहां इसका प्रकोप तेजी से बढ़ता चला गया। इस बीच डब्ल्यूएचओ ने यह भी कहा है कि ओमिक्रोन को लेकर किसी को भी कुछ नया करने की जरूरत नहीं है। कोरोना से निपटने के हथियार पहले से मौजूद हैं। सिर्फ उचि समय पर सही तरीके से उनका इस्तेमाल होना जरूरी है। कोरोना वायरस के नए स्वरूप ओमिक्रॉन के खतरे के बीच कोविशील्ड वैक्सीन को लेकर भी अच्छी खबर सामने आई है। खबर है कि पूरी तरह वैक्सीनेट (दोनों डोज लगा चुके) नागरिकों में कोविड-19 संक्रमण के खिलाफ कोविशील्ड वैक्सीन की प्रभावशीलता 63 फीसदी और मध्यम से गंभीर बीमारी के खिलाफ यह 81 फीसदी पाई गई है।
भारत में बड़े स्तर पर कोविशील्ड का इस्तेमाल किया गया है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों के मुताबिक ओमिक्रॉन वेरिएंट का ट्रांसमिशन रेट पिछले सभी वेरिएंट से काफी अधिक है। यानी यह वेरिएंट ज्यादा तेज गति से किसी भी नागरिक को संक्रमित कर सकता है। भारत में पहली लहर अल्फा वेरिएंट के कारण आई थी। अल्फा वेरिएंट में एक व्यक्ति दो से तीन नागरिकों को संक्रमित कर सकता था। जबकि दूसरी लहर डेल्टा वेरिएंट के कारण आई थी। डेल्टा वेरिएंट का ट्रांसमिशन रेट 6.5 था। मसलन यह पहली लहर से तीन गुना तेज था। अब अनुमानों के अनुसार नए ओमिक्रॉन वेरिएंट का ट्रांसमिशन रेट 12 से 18 के बीच है। यानी यह डेल्टा से करीब तीन गुना ज्यादा तेजी से फैलने की क्षमता रखता है।
ओमिक्रॉन से संक्रमित होने वाले पूरी तरह से वैक्सीनेट नागरिकों में इसके गंभीर लक्षण देखने को नहीं मिले हैं। ओमिक्रॉन प्रभावित देशों में ऐसे मरीजों को अस्पताल में भर्ती करने की जरूरत नहीं पड़ रही है। ओमिक्रॉन के संक्रमण का खतरा शरीर की क्षमता पर भी निर्भर करता है। यानी एक स्वस्थ फेफड़े, मजबूत मासपेशी और पूरी तरह से स्वस्थ मनुष्य पर इसका प्रभाव कम दिखाई देगा। कमजोर इम्यूनिटी, डायबिटीज, हार्ट डिसीज, कैंसर या आर्थराइटिस जैसी बीमारियों के शिकार मरीजों को इससे ज्यादा खतरा है। वृद्धों की इम्यूनिटी भी धीरे-धीरे कम हो जाती है, इसलिए उन्हें भी संभल कर रहने की जरूरत है।
जिन नागरिकों को वैक्सीन के दोनों डोज नहीं लगे हैं, उन पर वायरस ज्यादा हावी हो रहा है। ऐसे मरीजों की संख्या तेजी से बढ़ सकती है। उनमें गंभीर लक्षण देखे जा सकते हैं और जान का जोखिम भी अधिक रहेगा। अब तक करीब 125 करोड़ से ज्यादा नागरिकों को वैक्सीन लग चुकी हैं, जिनमें कोई गंभीर साइड इफेक्ट्स नहीं दिखाई दिए हैं। ऐसे में नागरिकों को चिंता करने की बजाए जल्द से जल्द वैक्सीन लगवाने की आवश्यकता है। कोरोना वायरस के नए वैरिएंट ओमिक्रॉन पर शोध का काम निरंतर चल रहा है। शोध रिपोर्ट भी धीरे-धीरे सामने आ रही हैं। नए शोध में कुछ महत्वपूर्ण जानकारी सामने आई हैं।
शोध बताता है कि ओमिक्रॉन बिल्कुल सामान्य सर्दी जुकाम की तरह दिखाई देता है। इसलिए इसकी पहचान करना और ज्यादा मुश्किल है। शोधकर्ताओं का कहना है कि संभव है कि वायरस ने सामान्य जुकाम वाले वायरस से आनुवंशिक सामग्री ली हो और अपना कम से कम एक म्यूटेशन किया हो। इससे पहले भी कई शोध में कहा गया है कि ओमिक्रॉन संक्रमण के लक्षण बाकी वैरिएंट्स से अलग नजर आ रहे हंै। इसके लक्षण बेहद गंभीर नहीं हंै, इसलिए संक्रमित व्यक्तियों को इसका पता लगने में और देरी हो सकती है। ओमिक्रॉन का संक्रमण संभवत: सामान्य जुकाम की तरह नजर आता है।
ओमिक्रॉन के नए लक्षण इस बात का संकेत हैं कि ये वायरस के रिकॉम्बिनेशन का नतीजा हो सकता है। इस प्रक्रिया में दो अलग-अलग वायरस एक ही होस्ट सेल में मिलते हैं और अपनी कॉपियां (संख्या बढ़ाना) बनाते हैं। इस दौरान वायरस की नई कॉपी बनती हैं। इस नए वायरस में दोनों पैरेंट वायरस के आनुवांशिक गुण मौजूद होते हैं। दक्षिण अफ्रीका में ओमिक्रॉन का पहला मामला मिला था। वहां के वैज्ञानिकों ने शुरुआत में इस बात के संकेत दिए थे कि ओमिक्रॉन संभवत: वैसे मनुष्य के शरीर में पैदा हुआ, जिसका इम्यून सिस्टम एचआईवी या किसी प्रतिरक्षात्मक बीमारी से संक्रमित था।














