लेखक : तरुण मिश्र
(समाजसेवी एवं राजनीतिक चिंतक हैं। राजनीतिक और सामाजिक विषयों पर लिखते हैं। देश-विदेश में आयोजित होने वाले व्याख्यानों में एक प्रखर वक्ता के रूप में जाने जाते हैं। जनसेवक के रुप में प्रख्यात है।)
डिजिटल युग में राजनीति का स्वरूप तेजी से बदल रहा है। पहले जहां राजनीतिक दल गांव, शहर और जनसभाओं के माध्यम से अपनी पहचान बनाते थे, वहीं अब सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म राजनीति का नया अखाड़ा बन चुके हैं। इंस्टाग्राम, यूट्यूब और एक्स जैसे प्लेटफॉर्म पर लाखों-करोड़ों फॉलोअर्स जुटाकर कई समूह खुद को जनआंदोलन या नई राजनीतिक ताकत के रूप में पेश करने की कोशिश कर रहे हैं। इसी कड़ी में ‘कॉकरोच जनता पार्टी (सीजपी)’ नाम से सामने आया एक सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म भी चर्चा में है, जिसने अपने पोस्ट और अभियानों के जरिए लोगों का ध्यान आकर्षित किया है। हालांकि, किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में केवल सोशल मीडिया लोकप्रियता को जनसमर्थन का प्रमाण नहीं माना जा सकता। राजनीति केवल वायरल पोस्ट, मीम्स और ट्रेंडिंग वीडियो का खेल नहीं है। राजनीति एक गंभीर जिम्मेदारी है, जो समाज, संविधान, विकास और जनता के विश्वास से जुड़ी होती है। यही वजह है कि सोशल मीडिया पर अचानक उभरने वाले किसी भी राजनीतिक मंच को लेकर लोगों के मन में सवाल उठना स्वाभाविक है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या केवल डिजिटल लोकप्रियता के आधार पर कोई संगठन देश की राजनीतिक दिशा तय कर सकता है? भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है, जहां करोड़ों लोग मतदान करते हैं और जमीनी स्तर पर काम करने वाले राजनीतिक दल वर्षों की मेहनत के बाद जनता का भरोसा जीतते हैं।
ऐसे में किसी भी नए मंच को केवल व्यंग्यात्मक नाम, सोशल मीडिया अभियान और ट्रोल संस्कृति के सहारे राजनीति में गंभीर विकल्प के रूप में देखना जल्दबाजी होगी। ‘कॉकरोच’ शब्द स्वयं एक नकारात्मक प्रतीक माना जाता है। आमतौर पर लोग कॉकरोच को गंदगी, अस्वच्छता और परेशानी से जोड़कर देखते हैं। घरों में कॉकरोच दिखने पर लोग उसे तुरंत हटाने की कोशिश करते हैं। ऐसे में इसी प्रतीक को राजनीतिक पहचान बनाना कई लोगों को असहज करता है। लोकतंत्र में राजनीतिक दलों की पहचान प्रेरणा, विकास और सकारात्मक सोच से जुड़ी होनी चाहिए, न कि ऐसे प्रतीकों से जो समाज में नकारात्मक संदेश दें। सोशल मीडिया की दुनिया में फॉलोअर्स की संख्या को अक्सर ताकत के रूप में पेश किया जाता है, लेकिन वास्तविकता इससे काफी अलग होती है। लाखों फॉलोअर्स होने का अर्थ यह नहीं कि उतने ही लोग किसी विचारधारा का समर्थन करते हों। कई बार लोग केवल मनोरंजन, व्यंग्य या जिज्ञासा के कारण भी किसी अकाउंट को फॉलो करते हैं। इसलिए डिजिटल लोकप्रियता और वास्तविक जनाधार में अंतर समझना बेहद जरूरी है। भारत की राजनीति का इतिहास त्याग, संघर्ष और जनसंपर्क से भरा रहा है।
स्वतंत्रता आंदोलन से लेकर आज तक देश में अनेक राजनीतिक दल और नेता जनता के बीच रहकर उभरे हैं। उन्होंने वर्षों तक गांवों, किसानों, मजदूरों, युवाओं और समाज के विभिन्न वर्गों के बीच काम किया। इसके विपरीत सोशल मीडिया आधारित राजनीति अक्सर भावनात्मक नारों और वायरल कंटेंट तक सीमित रह जाती है। इससे गंभीर मुद्दों पर सार्थक चर्चा कम और शोर-शराबा ज्यादा दिखाई देता है। एक और महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि सोशल मीडिया पर चलने वाले कई अभियान विदेशों से भी संचालित होते हैं या उनका प्रभाव अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क से जुड़ा होता है। ऐसे में लोगों के मन में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि भारत की राजनीति में बाहरी प्रभाव कितना उचित है। भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था देश की जनता द्वारा चुनी गई सरकारों और संस्थाओं पर आधारित है। इसलिए किसी भी नए राजनीतिक प्रयोग को पारदर्शिता और जवाबदेही के दायरे में रहकर ही आगे बढऩा चाहिए। इसके अलावा आज देश पहले ही जाति, धर्म, भाषा और विचारधाराओं के आधार पर काफी राजनीतिक तनाव देख चुका है।
ऐसे समय में राजनीति को और अधिक गंभीर, संवेदनशील और जिम्मेदार बनाने की जरूरत है। व्यंग्य, कटाक्ष और सोशल मीडिया ट्रेंड के सहारे राजनीति करने की कोशिश लोकतांत्रिक विमर्श को कमजोर कर सकती है। जनता को ऐसे किसी भी अभियान से सावधान रहने की जरूरत है जो केवल सनसनी पैदा करे लेकिन स्पष्ट नीति, विकास मॉडल और सामाजिक जिम्मेदारी की बात न करे। लोकतंत्र में हर व्यक्ति और समूह को अपनी बात रखने का अधिकार है। कोई भी संगठन राजनीतिक दल बना सकता है, चुनाव लड़ सकता है और जनता के बीच जा सकता है। लेकिन जनता भी अब पहले से ज्यादा जागरूक है। लोग केवल सोशल मीडिया प्रचार से प्रभावित नहीं होते, बल्कि यह भी देखते हैं कि कौन समाज के लिए वास्तविक काम कर रहा है, कौन देशहित की बात कर रहा है और किसकी सोच सकारात्मक है। भारत जैसे विशाल लोकतंत्र में राजनीति केवल विरोध करने का माध्यम नहीं, बल्कि समाधान देने की प्रक्रिया होनी चाहिए।
बेरोजगारी, शिक्षा, स्वास्थ्य, किसानों की समस्याएं, महंगाई और विकास जैसे मुद्दों पर ठोस दृष्टिकोण रखने वाले दल ही लंबे समय तक जनता का भरोसा जीत पाते हैं। केवल विवादित नाम, वायरल पोस्ट या सोशल मीडिया अभियानों के सहारे स्थायी राजनीतिक जमीन तैयार नहीं की जा सकती। अंतत: यह कहना गलत नहीं होगा कि सोशल मीडिया ने राजनीति को नया मंच जरूर दिया है, लेकिन लोकतंत्र की असली ताकत अब भी जनता के विवेक, जमीनी कार्य और सकारात्मक नेतृत्व में ही निहित है। किसी भी नए राजनीतिक मंच का मूल्यांकन भावनाओं या ट्रेंड के आधार पर नहीं, बल्कि उसकी नीतियों, सोच और समाज के प्रति जिम्मेदारी के आधार पर होना चाहिए। जनता को भी सजग रहकर यह तय करना होगा कि वह केवल डिजिटल शोर को महत्व देगी या वास्तविक विकास और स्थिर राजनीति को।

















