देर आए, दुरूस्त आए। यह चर्चित कहावत अब महाराष्ट्र सरकार पर बिल्कुल सटीक बैठ रही है। मस्जिदों से लाउडस्पीकर के जरिए तेज आवाज में अजान होने पर उभरे विवाद में सरकार को आखिरकार बैकफुट पर आना पड़ा है। सूबे में सभी धार्मिक स्थलों पर बगैर अनुमति के लाउडस्पीकर का इस्तेमाल करना प्रतिबंधित कर दिया गया है। आदेश का उल्लंघन होने पर पुलिस ने कड़ी कार्रवाई किए जाने की चेतावनी दी है। लाउडस्पीकर मसले पर उद्धव ठाकरे सरकार एक तरह से उत्तर प्रदेश की योगी सरकार के नक्शे कदम पर चल पड़ी है। धार्मिक स्थलों पर तेज आवाज में लाउडस्पीकर बजाए जाने से समय-समय पर विवाद होता रहा है।
इससे सांप्रदायिक तनाव को बढ़ावा मिलता रहा है। सुप्रीम कोर्ट ने धार्मिक स्थलों पर लाउडस्पीकर के प्रयोग की बावत आवश्यक आदेश दे रखा है। इसके बावजूद राज्य सरकारें शीर्ष अदालत के आदेश का पालन कराने में गंभीर नहीं हैं। जिसके चलते अक्सर किसी न किसी राज्य में विवाद की स्थिति देखने को मिलती है। महाराष्ट्र में पिछले कुछ समय से लाउडस्पीकर पर राजनीति गर्माई हुई है। महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे के नेतृत्व में महाअघाड़ी गठबंधन की सरकार चल रही है। सरकार में शिवेसना के अलावा कांग्रेस और एनसीपी जैसे दल भी सहयोगी की भूमिका में हैं। गठबंधन सरकार होने के कारण शिवसेना चाहकर भी कोई बड़ा निर्णय अपने दम पर लेने में सक्षम नजर नहीं आती है।
राज्य में लाउडस्पीकर का मुद्दा महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के प्रमुख राज ठाकरे ने उठाया था। मनसे प्रमुख ठाकरे की चेतावनी का असर देखने को मिल रहा है। राज ठाकरे ने मस्जिद पर लगे लाउडस्पीकर को हटाने का अल्टीमेटम देते हुए कहा था कि नमाज के लिए रास्ते और फुटपाथ क्यों चाहिए? घर पर पढ़िए। प्रार्थना आपकी है, हमें क्यों सुना रहे हो ? अगर इन्हें हमारी बात समझ नहीं आती तो आपकी मस्जिद के सामने हनुमान चालीसा बजाएंगे। राज्य सरकार को हम कहते हैं कि हम इस मुद्दे से पीछे नहीं हटेंगे। आपको जो करना है करो।
राज ठाकरे ने चेतावनी दी थी कि यदि मस्जिदों पर लगे लाउडस्पीकर नहीं हटे, तो जैसे को तैसा जवाब देने की जरूरत है। सुप्रीम कोर्ट के आदेश का पालन हर हाल में होना चाहिए। फिलहाल महाराष्ट्र सरकार को हरकत में आना पड़ा है। उद्धव ठाकरे सरकार के गृह विभाग ने अह्म फैसला लिया है। सरकार ने किसी भी धार्मिक स्थल पर बिना अनुमति लाउडस्पीकर लगाने पर रोक लगा दी है। यानी अब लाउडस्पीकर लगाने के लिए पहले किसी भी धर्म जाति विशेष समुदाय को पुलिस की मंजूरी लेनी होगी। यदि कोई बिना इजाजत लाउडस्पीकर लगाता है तो उसके खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाएगी।
लाउडस्पीकर मसले पर महाराष्ट्र सरकार ने बेशक देर से कदम उठाया है, मगर वाजिब कदम उठाया है। यदि सरकार इस मुद्दे पर खामोश रहती और कोई निर्णय नहीं लेती तो निश्चित रूप से राज्य में शांति एवं कानून व्यवस्था को खतरा पैदा होना तय था। मनसे की चेतावनी के अनुरूप यदि मस्जिदों के बाहर लाउडस्पीकर लगाकर हनुमान चालीस का पाठ किया जाता है तो सांप्रदायिक सद्भाव बिगड़ने की आशंका रहती। राज्य में माहौल खराब होने पर सरकार की मुश्किलें बढ़ना स्वभाविक है। सिर्फ लाउडस्पीकर ही नहीं बल्कि राज्य सरकारों को ऐसे सभी मामलों में सकारात्मक एवं प्रभावी कदम उठाने चाहिए, जिनके कारण शांति एवं कानून व्यवस्था की दिक्कत हो सकती है।
हर मामले में कोर्ट के आदेश का इंतजार नहीं करना चाहिए। समाज में शांति को कायम रखने की जिम्मेदारी से कोई भी सरकार पीछे नहीं भाग सकती है। यदि अह्म कानूनों का पालन गंभीरता से सुनिश्चित कराया जाए तो कई विवाद स्वत: समाप्त हो जाएंगे। महाराष्ट्र से इतर कर्नाटक और बिहार में भी लाउडस्पीकर पर सियासत देखने को मिल रही है। बेंगलुरु पुलिस ने कुछ दिन पहले मस्जिदों, मंदिरों, गिरजाघरों, पबों, बारों सहित तीन सौ से ज्यादा स्थलों को नोटिस जारी किए हैं। पुलिस के मुताबिक जिन्हें नोटिस दिया गया है, उनसे यह भी कहा गया है कि लाउडस्पीकरों का इस्तेमाल ध्वनि के निर्धारित स्तर के भीतर ही करें। ऐसा न होने पर कानूनी कार्रवाई की जाएगी।
इसके अलावा बिहार से मंत्री जनक राम ने भी मस्जिदों पर लगने वाले लाउडस्पीकर पर प्रतिबंध लगाने की मांग कर डाली है। उन्होंने कहा है कि हिंदुओं के त्योहारों पर डीजे पर रोक लगती है, उसी प्रकार मस्जिदों के लाउडस्पीकर पर भी रोक लगनी चाहिए। लाडडस्पीकर मसले पर मुस्लिम धर्मगुरुओं की तरफ से भी प्रतिक्रिया सामने आ चुकी है। सुन्नी उलेमा परिषद के हाजी मोहम्मद सालीस ने बकायदा बयान जारी कर कहा है कि अजान दो से तीन मिनट में पूरी हो जाती है।
उन्हें इससे भी समस्या है, मगर वह अपने चौबीस घंटे के अखंड पाठ में होने वाले ध्वनि प्रदूषण को नहीं देखते हैं। जबकि सपा सांसद शफीकुर्रहमान ने कहा है कि मस्जिदों में होने वाली अजान पर विवाद बढ़ाना देश में नफरत फैलाने की साजिश है। वैसे लाउडस्पीकर के मुद्दे को धार्मिक एंगल की बजाए जनता की परेशानी के नजरिए से देखने की भी जरूरत है।
















