उम्र नहीं, शिक्षा हो राजनीति की कसौटी

लेखक : तरुण मिश्र
(समाजसेवी एवं राजनीतिक चिंतक हैं। राजनीतिक और सामाजिक विषयों पर लिखते हैं। देश-विदेश में आयोजित होने वाले व्याख्यानों में एक प्रखर वक्ता के रूप में जाने जाते हैं। पूर्व में अखिल भारतवर्षीय ब्राह्मण महासभा के राष्ट्रीय महामंत्री हैं। ब्राह्मण कल्याण बोर्ड के गठन एवं ब्राह्मणों के हक के लिए अभियान चला रहे हैं। )

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) प्रमुख मोहन भागवत के हालिया बयान ने सियासी गलियारों में एक नई बहस को जन्म दे दिया है। भागवत ने सार्वजनिक मंच से कहा कि 75 वर्ष की आयु के बाद व्यक्ति को सक्रिय जिम्मेदारियों से रिटायर हो जाना चाहिए। यह कथन अपने आप में विचारणीय है, लेकिन जिस प्रकार इसे राजनीतिक चश्मे से देखा जा रहा है, उसने इसके मूल आशय को एक अलग दिशा में मोड़ दिया है। विपक्ष ने इस बयान को सीधे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर इशारा मानते हुए इसे एक तरह का संकेत बताया है कि अब नेतृत्व परिवर्तन का समय आ गया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की उम्र 73 वर्ष है, और यदि वे आगामी वर्षों तक पद पर बने रहते हैं, तो अगला आम चुनाव लड़ते समय उनकी उम्र 78 के करीब होगी। ऐसे में सवाल उठना लाजमी है कि क्या वे फिर से नेतृत्व संभालेंगे, या फिर भाजपा उनके उत्तराधिकारी के रूप में किसी नए चेहरे को सामने लाएगी? संभावित नामों की चर्चा शुरू हो चुकी है राजनाथ सिंह, नितिन गडकरी और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जैसे नेता चर्चा में हैं। लेकिन इस बहस का सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या केवल उम्र के आधार पर किसी व्यक्ति को जनसेवा से रिटायर होना चाहिए?

अगर इतिहास पर नज़र डालें तो दुनिया भर में कई नेता ऐसे हुए हैं जिन्होंने उम्र के अंतिम पड़ाव तक भी अद्भुत नेतृत्व क्षमता का प्रदर्शन किया। भारत के पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी हों या अमेरिका के मौजूदा राष्ट्रपति जो बाइडन उनकी उम्र कभी उनके विचारों की परिपक्वता या नेतृत्व की क्षमता में बाधा नहीं बनी। इसी तरह खेल जगत में भी उम्र कभी असल प्रतिभा की कसौटी नहीं रही है। सचिन तेंदुलकर जैसे क्रिकेटर जब अपने करियर के अंतिम वर्षों में भी मैदान पर उतरते थे, तब उनका अनुभव, धैर्य और समझ खेल को नए आयाम देता था।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संदर्भ में बात करें तो उनका जीवन एक साधक की तरह रहा है। उन्होंने जो जनाधार बनाया है और देश की जनता के दिलों में जो स्थान हासिल किया है, वह केवल उम्र या पद से नहीं मिला है। वे एक विचारधारा, एक अनुशासन और एक विजन के प्रतीक बन चुके हैं। आज वे सिर्फ एक प्रधानमंत्री नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों की उम्मीदों, सपनों और संघर्षों का चेहरा हैं। लेकिन इस चर्चा के बीच जो बात सबसे अधिक महत्वपूर्ण है, वह यह कि क्या हमारे लोकतंत्र में नेतृत्व का मापदंड केवल उम्र होना चाहिए? इस सवाल से ज्यादा अहम सवाल यह है कि क्या देश के जनप्रतिनिधियों के लिए शैक्षिक योग्यता का कोई मानक नहीं होना चाहिए? आज जब हर सरकारी नौकरी के लिए न्यूनतम शैक्षणिक अर्हता अनिवार्य है, तो क्या देश की राजनीति इससे अछूती रहनी चाहिए?

भारत में कोई व्यक्ति बिना किसी औपचारिक शिक्षा के भी पार्षद, विधायक या सांसद बन सकता है। यह लोकतंत्र की उदारता है, लेकिन कहीं न कहीं यह हमारे नीति-निर्माण की गुणवत्ता पर भी असर डालता है। जब देश की नीतियां ऐसे हाथों में हों जो शायद भाषा, कानून या अर्थव्यवस्था की बुनियादी समझ से भी वंचित हों, तब विकास की दिशा भटकना तय है। राजनीति में अनुभव महत्वपूर्ण है, लेकिन अनुभव के साथ शिक्षा और आधुनिक दृष्टिकोण भी जरूरी है। यदि कोई जनप्रतिनिधि पढ़ा-लिखा होता है, तो न केवल वह बेहतर योजनाएं समझ सकता है, बल्कि अपने क्षेत्र के विकास को वैज्ञानिक तरीके से लागू भी कर सकता है। शिक्षा से सोचने का दायरा बढ़ता है, संवाद करने की क्षमता निखरती है और जनता की समस्याओं का समाधान खोजने में सहजता आती है। देश के हर कोने से लेकर संसद भवन तक, यदि पढ़े-लिखे प्रतिनिधि बैठेंगे तो नीतियों की गुणवत्ता बेहतर होगी।

गांवों की समस्याओं को संसद तक सही ढंग से प्रस्तुत किया जा सकेगा। अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत की नीतियों का सही प्रतिनिधित्व किया जा सकेगा। आज आवश्यकता इस बात की है कि हम आयु की बजाय योग्यता को प्राथमिकता दें। प्रधानमंत्री कौन होगा, यह निर्णय समय और परिस्थिति लेगी, लेकिन यह ज़रूर तय होना चाहिए कि देश का प्रतिनिधित्व करने वाला हर व्यक्ति बौद्धिक रूप से समृद्ध हो। एक पढ़ा-लिखा नेता न केवल जनता की आकांक्षाओं को समझ सकता है, बल्कि उनके जीवन को बेहतर बनाने की दिशा में ठोस कदम भी उठा सकता है। संक्षेप में कहें तो आरएसएस प्रमुख का बयान चाहे जिस संदर्भ में आया हो, उसकी व्याख्या को राजनीति के तराजू में तौलना अनुचित है। उम्र का सम्मान होना चाहिए, लेकिन साथ ही जनप्रतिनिधियों के लिए शैक्षणिक मानक तय करना आज की सबसे बड़ी आवश्यकता है। जब तक हम शिक्षा को राजनीति की नींव नहीं बनाएंगे, तब तक हमारा लोकतंत्र केवल आकंठ समर्थन का खेल बना रहेगा, विकास और समझदारी का नहीं।