लेखक-तनुजा
शिक्षाविद्
(समाजसेवी एवं राजनीतिक चिंतक हैं। राजनीतिक और सामाजिक विषयों पर लिखती हैं। जनसेविका के रुप में प्रख्यात है।)
देश में दहेज प्रथा पर प्रभावी तरीके से अंकुश न लगना चिंताजनक है। दहेज के चक्कर में बेटियों को निरंतर अपनी जान गंवानी पड़ रही है। प्रत्येक बड़ी घटना के बाद कुछ दिन शोर-शराबा मचता है। बाद में स्थिति सामान्य हो जाती है। देश में फिलहाल ट्विशा शर्मा और दीपिका नागर की संदिग्ध हालत में मौत के मामलों पर हंगामा मच रहा है। ट्विशा व दीपिका ने धूमधाम से शादी होने के बाद नई जिंदगी की शुरूआत सकारात्मक उम्मीदों के साथ की थी। दोनों ने उज्जवल भविष्य के लिए सुनहरे सपने देखे थे। ससुराल में नई नवेली दुल्हनों का स्वागत हंसी-खुशी भरे माहौल में किया गया। ट्विशा और दीपिका के जीवन में अच्छे दिनों का सिलसिला ज्यादा दिन तक नहीं चल सका। ससुराल में धीरे-धीरे मनमुटाव व तनाव बढ़ता गया। अंतत: ट्विशा और दीपिका अपनों को छोड़कर ऐसी दुनिया में चली गईं, जहाँ से किसी का लौटना कतई संभव नहीं होता। मध्य प्रदेश के भोपाल की अभिनेत्री ट्विशा शर्मा और गौतम बुद्ध नगर की दीपिका नागर की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत के मामले इन दिनों देशभर में चचार्ओं के केंद्र में हैं। उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश में दो नवविवाहिताओं की संदिग्ध मौतों की जांच पुलिस ने शुरू कर दी है।
ट्विशा व दीपिका के परिजनों ने ससुराल पक्ष पर गंभीर आरोप लगाए हैं। दहेज के लिए दोनों को ससुराल में परेशान किया जाता था। इन घटनाओं के उपरांत देश में एक बार फिर दहेज प्रथा पर बहस आरंभ हो गई है। सामाजिक बुराई होने के बावजूद यह प्रथा आज भी प्रचलन में है। दहेज प्रथा की सबसे ज्यादा मार मध्यम आय वर्गीय परिवारों पर पड़ती है। जिन्हें अपनी बेटी के हाथ पीले करने से पहले न जाने कितनी परेशानी और तनाव से गुजरना पड़ता है। समाज में दहेज लोभियों की कोई कमी नहीं है। बेटा यदि अधिक पढ़ा-लिखा और अच्छी सर्विस में है तो माता-पिता अपनी हैसियत को देखकर रिश्ते की बात आगे बढ़ाते हैं। बेटे का रिश्ता तय होने पर वधू पक्ष पर ठीक ठाक दहेज देने का दबाव डाला जाता है। मध्यम वर्गीय परिवारों में शादी के दौरान दहेज में कार देने का चलन भी अब आम हो चुका है। ‘दुल्हन ही दहेज है’ जैसे लुभावने स्लोगन सिर्फ दीवारों पर अच्छे लगते हैं। वास्तव में इस प्रकार के वाक्यो का असल जिंदगी से कोई लेना-देना नहीं है। आजादी के बाद देश में अनेक गलत प्रथाओं को खत्म कर दिया गया है, मगर दहेज जैसी बीमारी जस की तस है।
जिनके पास अथाह धन-दौलत एवं संपत्ति है, वह अपनी बेटियों की शादी में पानी की तरह पैसा बहाना शान समझते हैं। इसका खामियाजा मध्यम वर्गीय उन परिवारों को भुगतना पड़ता है, जिनके पास बेटियों की शादी करने के लिए पर्याप्त बजट नहीं होता। ऐसे में ये परिवार या तो पुश्तैनी संपत्ति को बेच देते हैं या किसी साहूकार से मोटे ब्याज पर कर्ज लेकर बेटी के हाथ पीले करते हैं। अभिनेत्री ट्विशा के ससुरालियों ने अपना बचाव करने की भरसक कोशिश की है। ससुराल पक्ष ने बहू पर नशे की आदी होने तक का आरोप लगा दिया है। उधर, ट्विशा और दीपिका के मामले में महिलाओं के हित में आवाज बुलंद होने लगी है। मशहूर सिंगर और एक्टिविस्ट चिन्मयी श्रीपदा ने समाज की उस सोच पर सवाल उठाए हैं, जो आज भी बेटियों को ‘प्रॉपर्टी या वस्तु’ समझती है और पूछा कि क्या बेटियों को ससुराल में मरने के लिए छोड़ दिया जाए? भाजपा सांसद एवं अभिनेत्री कंगना रनौत और खुशबू पाटनी भी पीछे नहीं रही हैं। उन्होंने भी ट्विशा व दीपिका की मौत पर गुस्सा जाहिर किया है। चिन्मयी श्रीपदा ने सोशल मीडिया पर पोस्ट कर शादी और कन्यादान को लेकर समाज की संकीर्ण मानसिकता को भी निशाना बनाया है।
देश में दहेज प्रथा एक गंभीर सामाजिक बुराई है, जो आधुनिक युग में भी विभिन्न रूपों में मौजूद है। सख्त कानूनों के बावजूद यह प्रथा समाज में गहराई से जड़ जमाए है। यह महिलाओं के खिलाफ हिंसा, उत्पीड़न और लैंगिक असमानता का एक प्रमुख कारण है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़े बताते हैं कि आज भी देश में प्रतिदिन औसतन लगभग उन्नीस मौतें दहेज के कारण होती हैं। कानूनी उपायों के अलावा इस समस्या के समाधान के लिए महिलाओं की शिक्षा, आर्थिक आत्मनिर्भरता और सामाजिक सोच में बदलाव लाना सबसे ज्यादा आवश्यक है। देश के कुछ हिस्सों में विवाह की संरचना और रिश्तेदारी दहेज प्रथा में योगदान देती है। उत्तर भारत में विवाह आमतौर पर पितृसत्तात्मक प्रणाली का अनुसरण करता है, जहां दुल्हन परिवार की एक गैर-संबंधी सदस्य होती है। यह प्रणाली दहेज को बढ़ावा देती है। संभवत: इसलिए क्योंकि विवाह के बाद दुल्हन के परिवार को अलग कर दिया जाता है, जो दुल्हन के लिए एक प्रकार की मृत्यु पूर्व विरासत होती है। दक्षिण भारत में विवाह अक्सर दुल्हन के परिवार के भीतर ही संपन्न होता है। उदाहरण के लिए करीबी रिश्तेदारों या दूर के चचेरे भाइयों के साथ और उसके परिवार से भौगोलिक रूप से कम दूरी पर। इसके अतिरिक्त दुल्हनों को भूमि विरासत में मिलने की संभावना होती है।
















