लेखक – विजय मिश्र
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। इंडियन एक्सप्रेस, जी न्यूज, दैनिक जागरण, अमर उजाला, नई दुनिया सहित कई प्रमुख समाचार पत्र एवं न्यूज चैनल के साथ काम कर चुके हैं। उदय भूमि में प्रकाशित यह लेख लेखक के निजी विचार हैं।)
(राजनैतिक भ्रष्टाचार ने शुकराना से शुरू हुई व्यवस्था को नजराना होते हुए कब जबराना में तब्दील कर दिया यह बता पाना बेहद मुश्किल है। विकास कार्यों में जबराना व्यवस्था के तहत 25 से 30 प्रतिशत भ्रष्टाचार शुल्क शिष्टाचार के रूप में वसूला जाता है। राजनैतिक भ्रष्टाचार की नजर टेढ़ी हो जाये और वह शिष्टाचार भूल जाये तो भ्रष्टाचार शुल्क 10 से 15 प्रतिशत तक और बढ़ सकता है। बात सिर्फ जीडीए या नगर निगम की नहीं है। नोएडा, ग्रेटर नोएडा और यमुना प्राधिकरण सरीखे संस्थानों में भी यही व्यवस्था चलती है। अंतर बस थोड़े बहुत रेट का होता है। ऐसे में हम यह कैसे मान लें कि आगे से उखलारसी श्मशान घाट हत्याकांड जैसी घटना की पुनरावृत्ति नहीं होगी। हमारा पुलिसिया तंत्र आपदा में अवसर ढूढ़ने में परंपरागत रूप से माहिर है। उखलारसी श्मशान घाट हत्याकांड में मुरादनगर थाने में दर्ज एफआईआर ही इस बात की ताकीद कर रही है कि पुलिस ने आपदा में अवसर ढूढ़ लिया है।)
मुरादनगर स्थित उखलारसी श्मशान घाट में 25 लोगों की हत्या किसने की? क्या इन हत्यारों को सजा मिलेगी? शायद इन सवालों का जवाब हम सभी जानते हैं लेकिन, जवाबदेह शासन प्रशासन और सत्ता तंत्र से ना तो हमें कोई जवाब मिलेगा और ना ही कभी असली हत्यारों को सजा मिलेगी। 25 निर्दोष लोगों की हत्या भ्रष्ट राजनैतिक तंत्र ने की है। फांसी देने से पहले जल्लाद भी मरने वाले की अंतिम इच्छा पूछता है। लेकिन इस राजनैतिक भ्रष्टाचार ने एक झटके में 25 लोगों की हत्या कर दी और वह मानने को भी तैयार नहीं है कि हत्या हुई है। शायद हम कभी उन्हें पकड़ भी ना पाएं। क्योंकि यह राजनैतिक भ्रष्टाचार ऐसा बहुरूपिया है जो हर जगह अपना नाम और चेहरा बदल लेता है।
उखलारसी श्मशान घाट हत्याकांड में ईओ निहारिका सिंह, जेई चन्द्रपाल, सुपरवाइजर आशीष, ठेकेदार अजय त्यागी को मुख्य आरोपी बनाया गया है। लेकिन ये सब तो भ्रष्टाचार तंत्र के छोटे प्यादे भर हैं।
शासन प्रशासन ने राजनैतिक भ्रष्टाचार को बचाने की पूरी कोशिश की है। कोशिश क्या यह कहिये कि राजनैतिक भ्रष्टाचार को पूरी तरह से पाक साफ दिखा दिया है। विपक्षी पार्टियां और आम जनता हो-हल्ला मचा रही है और मुरादनगर नगर पालिका के चेयरमैन विकास तेवतिया को राजनैतिक भ्रष्टाचार के लिए जिम्मेदार बता रहे हैं। विरोध इसलिए भी अधिक है क्योंकि विकास तेवतिया भाजपा से हैं और आरोप लगाने वाले विपक्षी दलों से हैं। लेकिन देर शाम विकास तेवतिया ने भी प्रेसवार्ता करके यह बता दिया कि वह इस घटना के लिए किसी भी तरीके से जिम्मेदार नहीं हैं। अलबत्ता वह तो इस मामले की विस्तृत और निष्पक्ष जांच चाहते हैं। बकौल विकास तेवतिया उन्हें बदनाम करने की कोशिशें हो रही है। विकास तेवतिया को राजनैतिक भ्रष्टाचार का चेहरा बताने के पीछे कई कारण गिनाये जा रहे हैं। कहा जा रहा है कि चेयरमैन के रूप में नगर पालिका के सर्वोच्च पद पर विराजमान हैं। नगर पालिका के साइनिंग आॅथिरिटी भी हैं। नगर पालिका में ईओ के साथ-साथ चेयरमैन हर कार्य के लिए बराबर का जिम्मेदार और जवाबदेह होता है। ऐसे में यदि ईओ कसूरवार है तो चेयरमैन भी बराबर का कसूरवार है। बीते दिनों नगर पालिका के एक दर्जन से अधिक सभासदों ने उन पर भ्रष्टाचार के आरोप भी लगाये थे। बहरहाल यदि इन तर्कों को मान भी लिया जाये तब भी उसे राजनैतिक भ्रष्टाचार का बस एक स्थानीय और छोटा चेहरा भर ही कहा जा सकता है। मुरादनगर जैसी व्यवस्था सभी सरकारी संस्थानों में है। बात नगर निगम की हो या फिर विकास प्राधिकरण की। हर जगह यही व्यवस्था है।
राजनैतिक भ्रष्टाचार ने शुकराना से शुरू हुई व्यवस्था को नजराना होते हुए कब जबराना में तब्दील कर दिया यह बता पाना बेहद मुश्किल है। गाजियाबाद का हर एक जागरूक सख्श बता देगा कि भ्रष्टाचार सिर्फ मुरादनगर नगर पालिका में नहीं है बल्कि पालिका के 10 किलोमीटर के दायरे में स्थित गाजियाबाद नगर निगम और गाजियाबाद विकास प्राधिकरण सहित तमाम संस्थानों में है। विकास कार्यों में जबराना व्यवस्था के तहत 25 से 30 प्रतिशत भ्रष्टाचार शुल्क शिष्टाचार के रूप में वसूला जाता है। राजनैतिक भ्रष्टाचार की नजर टेढ़ी हो जाये और वह शिष्टाचार भूल जाये तो भ्रष्टाचार शुल्क 10 से 15 प्रतिशत तक और बढ़ सकता है। बात सिर्फ जीडीए या नगर निगम की नहीं है। नोएडा, ग्रेटर नोएडा और यमुना प्राधिकरण सरीखे संस्थानों में भी यही व्यवस्था चलती है। अंतर बस थोड़े बहुत रेट का होता है। ऐसे में हम यह कैसे मान लें कि आगे से उखलारसी श्मशान घाट हत्याकांड जैसी घटना की पुनरावृत्ति नहीं होगी। इस भ्रष्टाचार की जांच कर उसे पकड़ने और रोकने की जिम्मेदारी जिस संस्थान पर है हम सभी उस संस्थान की कार्यशौली से भी अवगत हैं।
हमारा पुलिसिया तंत्र आपदा में अवसर ढूढ़ने में परंपरागत रूप से माहिर है। उखलारसी श्मशान घाट हत्याकांड में मुरादनगर थाने में दर्ज एफआईआर ही इस बात की ताकीद कर रही है कि पुलिस ने आपदा में अवसर ढूढ़ लिया है। पुलिस ने एफआईआर में एक अज्ञात नाम को भी आरोपी बनाया है। जानकार बताते हैं कि यह अज्ञात शब्द ही पुलिस व्यवस्था के लिए आपदा में अवसर है। यदि विपक्ष या आम जनता का विरोध बढ़ा और सत्ता प्रतिष्ठान दवाब में आया तो किसी राजनैतिक चेहरे को आरोपी बना दिया जाएगा नहीं तो फिर इसी अज्ञात नाम की आड़ में कड़ी से कड़ी जोड़कर अवसर को भुनाया जाएगा। आरोपियों के नाम काटे और जोड़े जाएंगे। पुराने अनुभव बताते हैं कि ऐसा ही होता आया है। देश प्रदेश ही नहीं गाजियाबाद में पहले भी कई ऐसे हत्याकांड हुए हैं। चंद दिनों बाद यह आक्रोश ठंडा हो जाएगा और राजनैतिक भ्रष्टाचार के साथ मिलकर संपूर्ण भ्रष्टाचार पुन: अपनी गति से चलने लगेगा।
हादसा अगर दैविक हो तो कह सकते हैं कि ईश्वरीय प्रकोप से बचना बेहद मुश्किल होता है और दुर्भाग्यवश ऐसे हादसे होते हैं, मगर उखलारसी हत्याकांड जैसे मामलों में यही सवाल घूमता है कि निर्दोष नागरिकों की जान का आखिर कौन जिम्मेदार है? गत वर्ष 5 जुलाई को भी मोदीनगर में पटाखा फैक्ट्री में आग लगने से 9 लोगों की मौत या यू कहिये कि हत्या की गई थी। इस मामले में भी कार्रवाई के नाम पर बस खानापूर्ति हुई। पिछले महीने गाजियाबाद नगर निगम की बोर्ड बैठक में भाजपा पार्षद एसके माहेश्वरी ने राजनैतिक भ्रष्टाचार के इस चेहरे को उजागर करने की कोशिश की थी। कई ऐसे लोग हैं जो राजनैतिक भ्रष्टाचार पर चोट करने की कोशिश करते हैं लेकिन यह भ्रष्टाचार इतना मजबूत है कि कोई इसे चोटिल नहीं कर पाता। इस भ्रष्टाचार कि एक खासियत और है कि जो विपक्ष में होता है वही इसके खिलाफ बोलता है। लेकिन सत्ता में आते ही वह इस भ्रष्टाचार का चेहरा बन जाता है। राजनैतिक भ्रष्टाचार के समक्ष भाजपा, कांग्रेस, सपा, बसपा सहित सभी राजनैतिक पार्टियां एक जैसी है। ऐसे में मन में यही अनुत्तरित सवाल विचरण कर रहा है कि पता नहीं यह राजनैतिक भ्रष्टाचार और कितने हत्याकांड को अंजाम देगा।
















