लेखक : तरुण मिश्र
(समाजसेवी एवं राजनीतिक चिंतक हैं। राजनीतिक और सामाजिक विषयों पर लिखते हैं। देश-विदेश में आयोजित होने वाले व्याख्यानों में एक प्रखर वक्ता के रूप में जाने जाते हैं। जनसेवक के रुप में प्रख्यात है।)
भारत इन दिनों अंतरिक्ष विज्ञान की दुनिया में लगातार नए कीर्तिमान गढ़ रहा है। हाल ही में भारतीय वायुसेना के ग्रुप कैप्टन शुभांशु शुक्ला ने अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन से सफल वापसी कर पूरे देश का मान बढ़ाया है। उनकी इस यात्रा ने भारत को अंतरिक्ष के क्षेत्र में न सिर्फ एक नई पहचान दी, बल्कि यह भी सिद्ध कर दिया कि अब भारत केवल उपग्रह प्रक्षेपण करने वाला देश भर नहीं रहा, बल्कि मानव अंतरिक्ष यात्रा की महत्वाकांक्षाओं को साकार करने की दिशा में ठोस कदम बढ़ा चुका है। यही कारण है कि जब शुक्ला भारत लौटे तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उनसे मुलाकात कर उन्हें बधाई दी और विस्तार से गगनयान मिशन तथा भारत की वैज्ञानिक प्रगति पर चर्चा की। इस मुलाकात में प्रधानमंत्री ने उन्हें देश के युवाओं के लिए प्रेरणास्रोत बताया और कहा कि भारत का भविष्य विज्ञान और तकनीक के बल पर ही आत्मनिर्भरता की ओर अग्रसर होगा।
शुभांशु शुक्ला की इस सफलता को भारत के इतिहास में स्वर्णाक्षरों में लिखा जाएगा। अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन तक पहुँचना किसी भी वैज्ञानिक या अंतरिक्ष यात्री के लिए बड़ी उपलब्धि होती है। उनका यह अभियान न केवल वैज्ञानिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि भावनात्मक रूप से भी पूरे देशवासियों के लिए गौरव का क्षण है। इस अभियान से भारत की अंतरिक्ष तकनीक और अधिक सशक्त हुई है और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की छवि एक सक्षम अंतरिक्ष शक्ति के रूप में उभरी है। जब वे अपने गृह राज्य उत्तर प्रदेश लौटे तो मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भी उनसे भेंट की। मुख्यमंत्री ने कहा कि शुभांशु शुक्ला ने न केवल उत्तर प्रदेश बल्कि पूरे देश का मान बढ़ाया है और आने वाली पीढिय़ों के लिए यह सफलता प्रेरणा का स्रोत बनेगी। लेकिन इस गौरवमयी क्षण को एक बयान ने विवाद की ओर मोड़ दिया। पूर्व केंद्रीय मंत्री और हमीरपुर से भाजपा सांसद अनुराग ठाकुर ने एक कार्यक्रम में बच्चों से बातचीत के दौरान पूछा कि अंतरिक्ष में जाने वाला पहला व्यक्ति कौन था। बच्चों ने उत्साह से उत्तर दिया-नील आर्मस्ट्रांग। इस पर अनुराग ठाकुर ने कहा कि उन्हें लगता है कि अंतरिक्ष की यात्रा करने वाले पहले यात्री हनुमान जी थे। बस यहीं से विवाद शुरू हुआ। यह बयान तुरंत सोशल मीडिया और राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय बन गया। विपक्षी दलों ने इसे बच्चों को गुमराह करने वाला बताया, जबकि कुछ समर्थकों ने इसे धार्मिक दृष्टांत के रूप में सही ठहराने की कोशिश की। लेकिन सवाल यह है कि जिस समय पूरे देश को शुभांशु शुक्ला जैसी उपलब्धियों पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए था, उस समय एक विवादित टिप्पणी ने चर्चा की दिशा क्यों बदल दी।
रामायण और अन्य धार्मिक ग्रंथों में हनुमान जी के अद्भुत पराक्रम के अनेक प्रसंग मिलते हैं। सूर्यदेव को फल समझकर निगलने की कथा प्रसिद्ध है, वहीं संजीवनी बूटी लाने की कथा भी प्रेरणादायी है। लेकिन कहीं भी यह स्पष्ट उल्लेख नहीं मिलता कि वे चाँद या किसी अन्य ग्रह तक गए हों। इसीलिए वैज्ञानिक दृष्टिकोण रखने वाले विद्वानों और शिक्षाविदों का कहना है कि बच्चों को पढ़ाते समय या सार्वजनिक मंच से ऐसे दावे करना उचित नहीं है जिनका कोई प्रमाण न हो। यदि इतिहास पर नज़र डालें तो अंतरिक्ष की पहली मानव यात्रा 1961 में रूस के यूरी गागरिन ने की थी। उसके बाद 1969 में अमेरिका के नील आर्मस्ट्रांग और बज़ एल्ड्रिन ने चाँद पर कदम रखा। यह विज्ञान के इतिहास का सबसे बड़ा पड़ाव था। भारत के लिए यह गर्व की बात है कि आज शुभांशु शुक्ला जैसे अंतरिक्ष यात्री अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन तक पहुँच रहे हैं और भारत का गगनयान मिशन आने वाले वर्षों में मानव अंतरिक्ष यात्रा का सपना साकार करने वाला है। अनुराग ठाकुर का बयान केवल एक साधारण टिप्पणी होता तो शायद इतना बड़ा विवाद न होता, लेकिन यह ऐसे समय आया जब पूरा देश अंतरिक्ष में अपनी सफलता का जश्न मना रहा था।
इसी वजह से इस बयान को राजनीतिक रंग दिया जाने लगा। विपक्ष ने आरोप लगाया कि बच्चों को विज्ञान के बजाय मिथक सिखाए जा रहे हैं, जबकि भाजपा समर्थक इसे परंपरा और आस्था का प्रतीक बताने लगे। यही “चाँद पर चिकचिक” है, जब विज्ञान की उपलब्धि के बीच बयानबाजी का शोर सुनाई देने लगा। भारत की परंपराएँ और धार्मिक ग्रंथ हमारी सांस्कृतिक धरोहर हैं। रामायण और महाभारत हमें साहस, त्याग और कर्तव्य का संदेश देते हैं। वहीं विज्ञान हमें तथ्यों, प्रयोगों और खोजों के आधार पर आगे बढऩा सिखाता है। दोनों का महत्व अपनी जगह है, लेकिन बच्चों और युवाओं को पढ़ाते समय दोनों के बीच संतुलन बनाए रखना आवश्यक है। अगर उन्हें यह सिखाया जाए कि हनुमान जी का साहस हमें प्रेरित करता है और नील आर्मस्ट्रांग की यात्रा विज्ञान की उपलब्धि है, तो वे समझेंगे कि धर्म और विज्ञान दोनों हमारे जीवन को दिशा देते हैं। लेकिन यदि इन्हें गड्ड-मड्ड किया जाए तो केवल भ्रम फैलता है। अनुराग ठाकुर के बयान से इतर असली मुद्दा यह है कि भारत आज अंतरिक्ष विज्ञान में किस मुकाम पर पहुँच चुका है। चंद्रयान-3 ने भारत को चाँद के दक्षिणी ध्रुव तक पहुँचने वाला पहला देश बनाया। गगनयान मिशन निकट भविष्य में भारतीयों को अंतरिक्ष में भेजने की तैयारी कर रहा है। और अब शुभांशु शुक्ला जैसे अंतरिक्ष यात्री भारत का प्रतिनिधित्व कर दुनिया को यह दिखा रहे हैं कि हमारा देश केवल अनुसरण करने वाला नहीं, बल्कि नेतृत्व करने वाला बन चुका है।

















