लेखक : तरुण मिश्र
(समाजसेवी एवं राजनीतिक चिंतक हैं। राजनीतिक और सामाजिक विषयों पर लिखते हैं। देश-विदेश में आयोजित होने वाले व्याख्यानों में एक प्रखर वक्ता के रूप में जाने जाते हैं। जनसेवक के रुप में प्रख्यात है।)
महिला क्रिकेट टीम की विश्व कप जीत का जश्न सिर्फ ट्रॉफी तक सीमित नहीं रहा; उसने एक नई परंपरा, एक नई आवाज़ और देश के लिए गर्व के गीत को जन्म दिया है। फाइनल के बाद, जब स्टेडियम की उत्सव-हल्लागुल्ला शांत हुआ और दर्शक अपने-अपने घरों की ओर लौट चुके थे, तब मैदान पर बनी वह घेराबंदी- खिलाड़ी, कोच और सहयोगी स्टाफ का एक साथ खड़े होना- ने कुछ ऐसा किया जो अब तक अक्सर केवल कल्पना में ही देखा गया था: एक विजयी गीत का सृजन। वह गीत तभी शिरोभोम हुआ जब पूरी टीम ने एकजुट तौर पर गुनगुनाया: ‘न लेगा कोई पंगा, कर देंगे हम दंगा, रहेगा सबसे ऊपर हमारा तिरंगा ‘। यह पंक्तियाँ न केवल उत्साह का परिचायक थीं, बल्कि एक चेतावनी, एक वादा और आत्मविश्वास का उद्घोष भी थीं- सरल, बोल्ड और सीधे दिल से निकली हुई। खेल के इतिहास में जीत के बाद गीत और जश्न की परंपरा नई नहीं है, पर इस मौके की खासियत यह थी कि यह गीत टीम की आत्मा को लिख रहा था- न कोई पेशेवर थीम साँग, न किसी बाहरी लेखक की गढ़ी हुई पंक्तियाँ; बल्कि खिलाड़ी और स्टाफ द्वारा खुद से पैदा हुआ, अपने अनुभवों, संघर्षों और साझा लक्ष्य का जोरदार घोष। इससे स्पष्ट होता है कि खेल सिर्फ तकनीक और रणनीति तक सीमित नहीं रहता; यह भावनाओं, पहचान और सामूहिक इच्छा का भी स्वर है।
यह गीत, और खासकर उस दोहराई हुई पंक्ति का जादू, इसलिए भी गहरा है क्योंकि इन शब्दों में चुनौती और आश्वासन दोनों हैं। ‘न लेगा कोई पंगा’ में प्रतिद्वंदियों के सामने डर और झिझक की बात नहीं, बल्कि दृढ़ता और आत्मविश्वास झलकता है। ‘कर देंगे हम दंगा’ में कठोरता नहीं, साहस और परिवर्तन की आग दिखती है- वह आग जो मैदान पर शान्ति से जीत को सुनिश्चित करती है। और अंत में ‘रहेगा सबसे ऊपर हमारा तिरंगा’ यह पंक्ति उन मूल्यों का प्रतीक है जिनके लिए टीम खेलती है: देश की गरिमा, राष्ट्र का मान और खेल में उत्कृष्टता। एक पंक्ति में यह भाव समाहित कर देती है कि जीत का आनंद केवल व्यक्तिगत सम्मान का नहीं, बल्कि राष्ट्रीय गौरव का हिस्सा भी है। स्टेडियम के खाली होने के बाद यह गीत सुनना इसलिए भी मार्मिक था क्योंकि वास्तविक सम्मान तब नापता है जब दर्शक चले जाने के बाद भी टीम का एकजुट स्वर बना रहे। यह गीत टीम के भीतर की दीवारों को ढहाकर, सबको एक समान मंच पर लाने का काम करता है- खिलाड़ी और सपोर्ट स्टाफ, रणनीति और भावनाएँ, परिश्रम और उत्सव सब एक सुर में गुनगुनाने लगते हैं। यही वह पल होता है जब खेल के बहाने मानवता और एकता का उत्सव भी दिखाई देता है।
ऐसे गीतों का सामाजिक-पारम्परिक महत्त्व भी बहुत बड़ा होता है। वे सामूहिक स्मृति में घर कर जाते हैं, युवा पीढ़ी के लिए प्रेरणा बनते हैं और अक्सर राष्ट्रीय त्योहारों या मेलों में दोहराए जाते हैं। आगे चलकर यह विजय गीत खेल के आयोजनों, स्कूलों और स्थानीय क्लबों में गूंज सकता है। हर बार जब कोई नई पीढ़ी मैदान पर उतरकर संघर्ष करेगी, इस गीत के शब्द उनके साथ होंगे और उन्हें याद दिलाएंगे कि लक्ष्य तक पहुँचने के लिए जज्बा और जुझारूपन कितना आवश्यक है। यह भी ध्यान देने वाली बात है कि टीम ने यह गीत तभी जारी करने का निर्णय चार साल पहले लिया था। एक लक्ष्य तय कर उसे सुनियोजित तरीके से पूरा करना, और अंत में जीत के साथ उस वादे को पूरा करना- यही परिपक्वता और प्रतिबद्धता का परिचायक है। यह दर्शाता है कि टीम ने केवल खेल की तैयारी ही नहीं की, बल्कि जीत के बाद के भावनात्मक परिदृश्य का भी ख्याल रखा। उन्होंने अपनी पहचान और संस्कृति को गढऩे में समय लगाया, और जब अवसर मिला तो उसे गौरवपूर्ण तरीके से दुनिया के सामने पेश किया। विजय गीत का देश के प्रति एक साफ संदेश भी है: यहां खेल-मनोरंजन के साथ राष्ट्रीय गर्व और एकता का जश्न मनाया जाता है।
यह गीत दर्शकों और खिलाडिय़ों दोनों के बीच की दूरी को मिटा देता है, क्योंकि जो शब्द मैदान पर गाए जाते हैं, वही दिलों में भी गूँजते हैं। एक विश्व कप जीत के बाद भारत जैसे देश में, जहां खेल के साथ राष्ट्रीय भावना गूँजती है, इस तरह के गीत सामाजिक एकता और सांस्कृतिक अभिव्यक्ति का प्रतीक बन जाते हैं। हालांकि यह गीत अभी नया है, पर इसका प्रभाव तुरंत नजर आता है। यह युवा खिलाडिय़ों को प्रेरित करेगा, खेल प्रेमियों को उत्साहित करेगा और खेल के प्रति राष्ट्रव्यापी समर्थन को और भी मजबूत बनाएगा। भविष्य में जब भी कोई बड़ी उपलब्धि हासिल होगी, शायद यही गीत टीम के जश्न का हिस्सा बने या और भी नए गीतों के लिए प्रेरणा बने-हर जीत के साथ एक नई ध्वनि, एक नया उत्सव।
सबसे अहम बात यह है कि इस गीत ने साबित कर दिया कि टीम की असली ताकत केवल उसकी तकनीकी कुशलता नहीं होती, बल्कि उसकी एकता, उसे लक्ष्य पर टिकाये रखने वाली प्रतिबद्धता और भावनात्मक जुड़ाव भी होता है। जब यह सब मिलकर किसी स्वर में बदलते हैं, तो परिणाम न सिर्फ जीत होता है, बल्कि इतिहास रचने वाली स्मृति भी बनती है। इसलिए, जब भी इस पंक्ति को दोहराया जाएगा ‘न लेगा कोई पंगा, कर देंगे हम दंगा, रहेगा सबसे ऊपर हमारा तिरंगा’ – वह केवल एक नारा नहीं होगा; वह एक कहानी होगी, खेल के माध्यम से लिखी गयी, दृढ़ निश्चय और गर्व का गीत होगा। और हर बार जब यह गीत गूँजेगा, वह जीत की याद दिलाएगा, वह जीत जो मैदान पर हासिल हुई और दिलों में घर कर गई।

















