-पावन चिंतन धारा आश्रम में मनाया गया गुरु पूर्णिमा महोत्सव
-गुरु बिन पूर्णता नहीं, मेरी पीठ पर उनका हाथ मेरी सबसे बड़ी ताकत है…
गाजियाबाद। गुरू एक ऐसा शब्द है जिसमें मनुष्य जीवन से लेकर पूरा ब्रह्मांड तक समा जाता है। स्वयं भगवान ने भी इस शब्द को सर्वोपरि मानकर गुरु को सम्मान दिया है। गुरु-शिष्य परंपरा का निर्वहन करते हुए, गुरु की महिमा का गुणगान और उनके प्रति अपनी भावांजलि अर्पित करते हुए रविवार को हिसाली गांव स्थित पावन चिंतन धारा आश्रम में परम पूज्य श्रीगुरु प्रो. पवन सिन्हा के सानिध्य में गुरु पूर्णिमा का उत्सव बड़े ही हर्षोल्लास और धूमधाम से मनाया गया। हर व्यक्ति के जीवन में गुरु का होना एक बहुत महत्वपूर्ण उपलब्धि है। गुरु और शिष्य परंपरा का सबसे उत्कृष्ट उदाहरण है- भगवान स्वामी रामकृष्ण परमहंस जी और स्वामी विवेकानंद का संबंध, गुरु के प्रति निश्चयात्मक बुद्धि ही पूर्ण समर्पण की राह का मार्ग प्रशस्त करती है। गुरु बिन इन्द्रिय न सधें, गुरु बिन बढ़े न शान। गुरु मन में बैठत सदा, गुरु है भ्रम का काल, गुरु अवगुण को मेटता, मिटें सभी भ्रमजाल।
सनातन संस्कृति में गुरु को ब्रह्मा, विष्णु और महेश की संज्ञा दी गई है और उनके प्रति विनीत भाव से नमन किया गया है। पावन चिंतन धारा आश्रम में गुरु पूर्णिमा उत्सव की शुरुआत धरा सेवा से हुई। श्री गुरु जी का मानना है कि सेवा और भक्ति से ईश की प्राप्ति होती है और धरा सेवा, प्रकृति का संरक्षण और पल्लवन बहुत महत्वपूर्ण है। शिव सेवा धरा सेवा मुहिम का शुभारंभ करते हुए श्री गुरुजी और श्री गुरु मां डॉ. कविता अस्थाना जी ने आश्रम प्रांगण में गुड़हल, आम, जामुन, बेलपत्र, पीपल, गुलमोहर, नीम, बरगद, अनार आदि के पौधे लगाए। श्री गुरुजी ने इस अवसर पर कहा कि शिवजी की वास्तविक पूजा या सेवा धरा सेवा से जुड़ा हुआ है। जितने भी महादेव के भक्त हैं वे इतने पौधे रोपें कि मानव मात्र की सेवा हो सकें। आश्रम प्रांगण में स्थित गुरु महाराज कुटीर में श्री गुरुजी ने स्वामी रामकृष्ण परमहंस, स्वामी विवेकानंद और मां शारदा देवी का तिलक वंदन किया।
पुष्प, नैवेद्य, वस्त्रादि भेंट के उपरांत राम नाम संकीर्तन की कर्णप्रिय मधुर ध्वनि से पूरा आश्रम गुंजायमान हो गया। इसके उपरांत नारायण क्षेत्र में परम पूज्य प्रो. पवन सिन्हा श्रीगुरुजी ने सभी को सम्बोधित करते हुए कहा कि जीवन में कुछ बड़ा और नया करने के लिए भक्ति और विश्वास बेहद जरूरी है। अगर कोई आपको भक्ति को शुभकामनाएं देता है, तो यह जीवन की सबसे बड़ी शुभकामना है और इससे बड़ी कोई शुभकामना नहीं। मगर ये भक्ति प्राप्त करना सरल नहीं। इस पथ पर आगे ले जाने वाले भगवान, इष्ट और गुरु की अनेक परीक्षाओं से आपको गुजरना पड़ता है। पर एक बार पास होने होने आपके गुरु, आपके इष्ट, आपके भगवान आपको थाम लेते हैं और तब आप उनकी जिम्मेदारी बन जाते हैं। इसके साथ साथ उन्होंने गुरू दीक्षा और गुरु मंत्र में अंतर को स्पष्ट किया और कहा कि गुरु अपनी इच्छा से शिष्य का चुनाव करता है और उसको आने वाले कल के लिए तैयार करता है, जिससे वह राष्ट्र सेवा, देश सेवा कर सके।
इसलिए संशयात्मक बुद्धि को दूर करके गुरु और इष्ट को समर्पित होकर उनके पथ पर चलने का प्रयास करना चाहिए। अंत में उन्होंने सभी बच्चों, युवाओं और वृद्धजनों को प्रेरित करते हुए कहा कि आप सभी में शक्तियां हैं, उन शक्तियों को जाग्रत करें और देश सेवा में समर्पित हो जाएं। गुरु महिमा से ओत प्रोत भजनों ने समां बांध दिया और सभी ने गुरु दर्शन किए और उनसे आशीर्वाद प्राप्त किया! गुरुकृपा ही भगवत कृपा के समान है जो मनुष्य को सुख, सौभाग्य प्रदान करती हैं। गौरतलब है देश के विभिन्न राज्यों – मुंबई, पूना, नागपुर, जयपुर, बनारस, सूरत, अमृतसर, मेरठ, दिल्ली, लखनऊ, गाजियाबाद, गुड़गांव आदि शहरों से श्रद्धालु बड़ी संख्या में आश्रम में उपस्थित रहे।

















