-मुंबई प्रवास के दौरान पंकज त्रिपाठी के आवास पहुंचे तरुण मिश्र, कहा- दुख की इस घड़ी में पूरा समाज आपके साथ
उदय भूमि संवाददाता
मुंबई। हिंदी सिनेमा के सादगीपूर्ण व्यक्तित्व और राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित अभिनेता पंकज त्रिपाठी के जीवन में गत माह एक दुखद क्षण आया, जब उनकी माताजी श्रीमती हेमवंती देवी का निधन हो गया। इस पारिवारिक शोक की घड़ी में उनसे मिलने की इच्छा रखने वाले जनसेवक तरुण मिश्र उस समय बिहार विधानसभा चुनाव में व्यस्तता के कारण उनसे भेंट नहीं कर पाए थे। गुरुवार को मुंबई प्रवास के दौरान तरुण मिश्र ने पंकज त्रिपाठी के आवास पहुंचकर उनसे मुलाकात की, उनके स्वास्थ्य और मनोस्थिति का हाल जाना तथा उन्हें सांत्वना दी। मुलाकात के दौरान माहौल भावुक रहा। तरुण मिश्र ने पंकज त्रिपाठी से व्यक्तिगत रूप से बातचीत कर इस कठिन समय में धैर्य बनाए रखने का संदेश दिया। उन्होंने अभिनेता की सादगी, पारिवारिक मूल्यों और संघर्षपूर्ण जीवन यात्रा की सराहना करते हुए कहा कि ऐसी विभूतियां समाज के लिए प्रेरणा होती हैं।
जनसेवक तरुण मिश्र ने इस अवसर पर कहा कि मां का स्थान दुनिया में कोई नहीं ले सकता। उनका जाना अपूरणीय क्षति है। मैं इस दुख की घड़ी में पंकज त्रिपाठी जी और उनके पूरे परिवार के साथ खड़ा हूं। ईश्वर दिवंगत आत्मा को शांति प्रदान करे और परिवार को इस पीड़ा को सहन करने की शक्ति दे। उन्होंने कहा कि पंकज त्रिपाठी न केवल एक उत्कृष्ट अभिनेता हैं, बल्कि जमीन से जुड़े हुए, सरल और संवेदनशील इंसान भी हैं। ‘उनकी कला और व्यक्तित्व में जो गहराई है, वह उनके संस्कारों और पारिवारिक मूल्यों का परिणाम है। तरुण मिश्र ने बताया कि बिहार विधानसभा चुनाव के दौरान जनसेवा और संगठनात्मक जिम्मेदारियों के चलते वे पहले मुंबई नहीं आ पाए थे।
मन में इच्छा थी कि उस समय ही पंकज जी से मिलूं, लेकिन परिस्थितियां अनुकूल नहीं थीं। आज मुंबई आकर उनसे मिलना मेरे लिए भावनात्मक रूप से जरूरी था। तरुण मिश्र ने कहा कि सार्वजनिक जीवन में रहते हुए भी व्यक्तिगत दुख-सुख में एक-दूसरे के साथ खड़ा होना समाज की सबसे बड़ी ताकत है। मुंबई में हुई यह मुलाकात न सिर्फ एक जनसेवक और अभिनेता के बीच संवाद थी, बल्कि यह मानवीय रिश्तों, संवेदनशीलता और सांत्वना का संदेश भी लेकर आई। मातृशोक से गुजर रहे पंकज त्रिपाठी के प्रति तरुण मिश्र द्वारा व्यक्त की गई सहानुभूति ने यह स्पष्ट किया कि कठिन समय में साथ खड़ा होना ही सच्ची जनसेवा है।

















