ओटीटी के युग में डगमगाया सिनेमाघरों का अस्तित्व: पंकज त्रिपाठी और तरुण मिश्र ने जताई चिंता

-फिल्म इंडस्ट्री को बचाने के लिए जरूरी है नीति और नियत में बदलाव: तरुण मिश्र

उदय भूमि संवाददाता
मुंबई। वक्त बदला है और उसके साथ दर्शकों की आदतें भी। पहले जहां नई फिल्में देखने के लिए लोग सिनेमाघरों की ओर दौड़ते थे, अब वे वहीं रुक जाते हैं अपने मोबाइल फोन के सामने। बड़े पर्दे का आकर्षण धीरे-धीरे ओटीटी प्लेटफॉर्म के आरामदायक अनुभव में विलीन होता जा रहा है। इसी गंभीर विषय पर शनिवार को हिंदी सिनेमा के दिग्गज अभिनेता और राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता पंकज त्रिपाठी से जनसेवक तरुण मिश्र ने उनके मुंबई स्थित आवास पर मुलाकात की और फिल्म इंडस्ट्री के वर्तमान संकट को लेकर विस्तार से चर्चा की। तरुण मिश्र ने बातचीत की शुरुआत करते हुए फिल्म उद्योग की उस गहराई से ओर इशारा किया जहां एक ओर ओटीटी का बढ़ता वर्चस्व, दूसरी ओर पायरेसी का साया और तीसरी ओर मल्टीप्लेक्सों की बेलगाम महंगाई तीनों मिलकर सिनेमा हॉल संस्कृति को चौपट कर रहे हैं। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि अगर जल्द ही इस पर कोई ठोस पहल नहीं की गई, तो भारतीय सिनेमा के इतिहास में सिनेमा हॉल का स्थान केवल यादों तक सीमित रह जाएगा। पंकज त्रिपाठी ने इस चिंता को न केवल जायज बताया, बल्कि इसका अनुभव भी साझा किया। उन्होंने कहा कि फिल्मों का असली आनंद बड़े पर्दे पर, दर्शकों के बीच बैठकर महसूस होता है।

सिनेमाघर एक सामूहिक अनुभव होता है, जो किसी भी डिजिटल प्लेटफॉर्म से कहीं अधिक जीवंत और प्रभावशाली होता है। मगर आज जब कोई आम दर्शक सिनेमा हॉल में फिल्म देखने जाता है, तो केवल टिकट ही नहीं, बल्कि खाने-पीने की चीजों पर खर्च कर वह एक पूरी पिकनिक का बजट लगा देता है। परिवार के साथ फिल्म देखना आम आदमी के लिए एक आर्थिक बोझ बन गया है। मुलाकात के दौरान यह भी स्वीकार किया गया कि ओटीटी प्लेटफॉर्म एक सशक्त माध्यम बन चुके हैं, लेकिन यह सुविधा जब सिनेमा हॉलों की कीमत पर हो रही हो, तब इसके प्रभाव का पुनर्मूल्यांकन जरूरी हो जाता है। पंकज त्रिपाठी ने कहा कि सिर्फ ओटीटी पर निर्भर रहने से फिल्म निर्माताओं, कलाकारों, तकनीशियनों और सिनेमा के हजारों कर्मचारियों का भविष्य खतरे में पड़ रहा है। जब फिल्मों की कमाई नहीं होती, तो कलाकारों की फीस से लेकर तकनीकी टीम के मेहनताना तक सब प्रभावित होता है। इस बातचीत का सबसे चिंताजनक पहलू पायरेसी को लेकर था। पंकज त्रिपाठी और तरुण मिश्र दोनों ने एक स्वर में इसे ‘फिल्म इंडस्ट्री का कैंसर’ कहा। आज भी जब कोई फिल्म रिलीज होती है, तो कुछ ही घंटों में उसकी कॉपी ऑनलाइन लीक हो जाती है। इससे न केवल करोड़ों का नुकसान होता है, बल्कि फिल्म के पीछे लगी वर्षों की मेहनत भी मिट्टी में मिल जाती है।

तरुण मिश्र ने एक सुझाव के रूप में कहा कि सरकार को चाहिए कि वह मल्टीप्लेक्स में खाद्य सामग्री की कीमतों को नियंत्रित करे, ओटीटी रिलीज के लिए नियम तय करे और पायरेसी पर कठोर कार्रवाई सुनिश्चित करे। साथ ही सिनेमा हॉल टिकटों के लिए सब्सिडी या ‘फैमिली पैक स्कीम’ जैसी योजनाएं शुरू होनी चाहिए ताकि आम जनता दोबारा सिनेमाघरों का रुख करे। पंकज त्रिपाठी ने बातचीत को एक सार्थक दिशा देते हुए कहा कि अगर सिनेमा हॉल संस्कृति को बचाना है, तो दर्शकों, सरकार, निर्माता, वितरक और अभिनेता सभी को एक साथ मिलकर काम करना होगा। यह सिर्फ एक उद्योग नहीं, बल्कि भारतीय समाज की सांस्कृतिक पहचान है जिसे हर हाल में बचाना होगा। यह मुलाकात सिर्फ एक विचार-विमर्श नहीं थी, बल्कि भारतीय सिनेमा के भविष्य की चिंता में डूबे दो संवेदनशील व्यक्तित्वों का संवाद था। एक अभिनेता जिसने मंच पर खड़े होकर करोड़ों दिलों को छुआ है, और एक जनसेवक जो सिनेमा को समाज का आईना मानते हैं दोनों की बातें इस बात की गवाही थीं कि अगर अब भी नहीं चेते, तो बहुत देर हो जाएगी।

पायरेसी बनी सबसे बड़ी चुनौती, कलाकारों की मेहनत पर पानी
तरुण मिश्र ने कहा कि अब ओटीटी ही नहीं, बल्कि फिल्मों के ऑनलाइन लीक होने से पायरेसी का खतरा और नुकसान भी बढ़ा है। आज भी कई वेबसाइट्स पर फिल्में लीक होकर उसी दिन पहुंच जाती हैं जब वो सिनेमाघरों में रिलीज होती हैं। इससे निर्माता का सारा बजट और मेहनत चौपट हो जाती है। पंकज त्रिपाठी ने इस पर कहा कि पायरेसी न सिर्फ निर्माता को नुकसान पहुंचाती है बल्कि इससे जुड़े तकनीशियन, संगीतकार, लेखक, एडिटर, जूनियर आर्टिस्ट तक प्रभावित होते हैं, क्योंकि उनकी मेहनत की कीमत दर्शकों के टिकट से ही मिलती है।

ओटीटी ने बिगाड़ा दर्शक और सिनेमा हॉल का रिश्ता
तरुण मिश्र ने सटीक शब्दों में वर्तमान स्थिति का आंकलन करते हुए कहा कि आज के समय में दर्शक सिनेमाघरों से दूर होता जा रहा है। ओटीटी प्लेटफॉर्म पर फिल्में घर बैठे मोबाइल में उपलब्ध हो जाती हैं, जिससे दर्शकों का आकर्षण सिनेमा हॉल की ओर नहीं रह गया। इसका खामियाजा फिल्म निर्माताओं, कलाकारों और तकनीशियनों को भुगतना पड़ रहा है। उन्होंने कहा कि फिल्म निर्माण में करोड़ों का निवेश होता है, लेकिन ओटीटी और पायरेसी ने न केवल फिल्म की कमाई को प्रभावित किया है बल्कि इसके कारण सिनेमा हॉलों की भी साख घट रही है। आज का दर्शक यह सोचता है कि जब फिल्म हफ्ते भर में मोबाइल पर मुफ्त या सस्ते में मिल जाएगी तो फिर 1000 रुपये खर्च कर सिनेमा हॉल क्यों जाऊं।

मल्टीप्लेक्स की मंहगाई ने मारा मनोरंजन का बजट
राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता अभिनेता पंकज त्रिपाठी ने भी तरुण मिश्र की बातों से पूरी सहमति जताते हुए कहा कि सिर्फ फिल्म की टिकट महंगी नहीं है, बल्कि मल्टीप्लेक्स में खाने-पीने का खर्च टिकट से भी ज्यादा हो गया है। परिवार के साथ एक फिल्म देखना अब आम आदमी के लिए ‘लग्जरी’ बन चुका है। उन्होंने जोड़ा कि फिल्म का सही आनंद बड़े पर्दे पर, सामूहिक अनुभव में ही आता है, लेकिन जबरदस्त महंगाई और सुविधाओं की कमी ने दर्शकों को सिनेमाघरों से दूर कर दिया है। हम एक तरफ चाहते हैं कि लोग भारतीय सिनेमा को सराहें, लेकिन दूसरी ओर उन्हें सिनेमाघर तक लाने की कोई ठोस रणनीति नहीं बना पा रहे हैं।