‘नाम में क्या रखा है’: फिल्म ‘घूसखोर पंडित’ पर विवाद के बीच तरुण मिश्र बोले-मनोरंजन को जाति से न जोड़ें

-मनोज बाजपेयी जैसे सशक्त अभिनेता की फिल्म पर बिना देखे विरोध अनुचित
-सेंसर बोर्ड की भूमिका पर सवाल क्यों, क्या हर शीर्षक पर होगा मुकदमा?
-सोशल मीडिया की बहस ने बढ़ाया विवाद, सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा मामला

उदय भूमि संवाददाता
नई दिल्ली। मनोज बाजपेयी अभिनीत आगामी फिल्म ‘घूसखोर पंडित’ की घोषणा 3 फरवरी को होते ही शीर्षक को लेकर विवाद खड़ा हो गया। कुछ संगठनों और ब्राह्मण समाज के प्रतिनिधियों ने फिल्म के नाम पर आपत्ति जताते हुए विरोध प्रदर्शन किए। निर्माता नीरज पांडे और अभिनेता मनोज बाजपेयी के पुतले तक फूंके गए। मामला सोशल मीडिया से उठकर अदालत की चौखट तक पहुंच गया। इसी बीच जनसेवक तरुण मिश्र ने पूरे विवाद पर प्रतिक्रिया देते हुए संयम और विवेक की अपील की है। तरुण मिश्र ने कहा कि नाम में क्या रखा है। किसी फिल्म के शीर्षक के आधार पर किसी समुदाय या व्यक्ति के चरित्र पर उंगली उठाना ठीक नहीं है। फिल्म केवल मनोरंजन का माध्यम होती है, न कि किसी पूरी बिरादरी का प्रतिनिधित्व। उन्होंने कहा कि फिल्मों के किरदारों को वास्तविक जीवन से जोड़ना या उन्हें किसी समाज विशेष का प्रतीक मान लेना गलत परंपरा को जन्म देता है।

उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि अगर फिल्मों के नाम या किरदारों को वास्तविकता मान लिया जाए तो ‘चाची 420’ में कमल हासन का किरदार क्या सभी चाचियों का प्रतिनिधित्व करता है? अमिताभ बच्चन की ‘शहंशाह’ से क्या वे सचमुच शहंशाह बन गए? वर्ष 1994 में बनी ‘बैंडिट क्वीन’ में सीमा बिस्वास ने फूलन देवी का किरदार निभाया था, तो क्या वह स्वयं फूलन देवी हो गईं?  ‘फिल्मों में अभिनेता किरदार निभाते हैं, वे किसी के धर्म, जाति या समाज का अपमान करने नहीं आते। तरुण मिश्र ने मनोज बाजपेयी की अभिनय क्षमता की सराहना करते हुए कहा कि वे हिंदी सिनेमा के उन गिने-चुने अभिनेताओं में हैं जिन्होंने अपने अभिनय से गंभीर और सामाजिक विषयों को प्रभावी ढंग से प्रस्तुत किया है।  ‘मनोज बाजपेयी ने ‘सत्या’, ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’, ‘अलीगढ़’ और ‘द फैमिली मैन’ जैसी परियोजनाओं से यह साबित किया है कि वे हर किरदार में जान डाल देते हैं। ऐसे अभिनेता की फिल्म को बिना देखे विवादों में घसीटना उचित नहीं है। उन्होंने यह भी कहा कि किसी फिल्म या उपन्यास के नाम को पढ़कर पूरी कहानी का अनुमान लगाना गलत है।  ‘अगर शीर्षक देखकर ही लोग निर्णय लेने लगेंगे तो फिर न कोई कहानी पढ़ेगा, न फिल्म देखेगा। कला को समझने के लिए धैर्य और खुले मन की जरूरत होती है।

सोशल मीडिया की भूमिका पर टिप्पणी करते हुए तरुण मिश्र ने कहा कि आज छोटी-सी बात भी डिजिटल मंचों पर इतनी बढ़ जाती है कि वह गंभीर विवाद का रूप ले लेती है।  ‘हर व्यक्ति की अपनी राय होती है, लेकिन जब हम उस राय का विरोध करते-करते आक्रामक हो जाते हैं तो मामला तूल पकड़ लेता है। इसी बहस के कारण यह मुद्दा सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया है। मिश्र ने सेंसर बोर्ड की भूमिका पर भी सवाल उठाए। उनका कहना है कि केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड एक विधिक संस्था है, जिसके सदस्य फिल्म देखकर ही उसे प्रमाणित करते हैं। उन्होंने पूछा यदि हर फिल्म के शीर्षक या विषय पर अदालत में चुनौती दी जाएगी, तो सेंसर बोर्ड की भूमिका क्या रह जाएगी? क्या भविष्य में फिल्मों को रिलीज से पहले जनता या अदालत के सामने प्रस्तुत करना होगा?। हालांकि उन्होंने स्पष्ट किया कि न्यायालय के निर्णय का सम्मान करना हर नागरिक का कर्तव्य है, लेकिन साथ ही यह भी जरूरी है कि कला और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का संतुलन बना रहे।  ‘यदि नाम बदलने से कहानी नहीं बदलती, तो फिर शीर्षक को लेकर इतना विवाद क्यों?।

उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि पहले पायरेटेड सीडी और अब ओटीटी प्लेटफॉर्म के दौर में सिनेमाघरों की दर्शक संख्या पहले ही प्रभावित हो चुकी है। ऐसे में फिल्मों को विवादों में उलझाना उद्योग के लिए नुकसानदेह है। तरुण मिश्र ने अंत में अपील की कि समाज को हर विषय को जाति और बिरादरी के चश्मे से देखने की प्रवृत्ति से बाहर आना होगा। उन्होंने कहा कला समाज का आईना होती है, लेकिन आईने से नाराज होने के बजाय हमें अपनी सोच पर विचार करना चाहिए। फिल्म ‘घूसखोर पंडित’ को लेकर जारी बहस के बीच यह स्पष्ट है कि शीर्षक से अधिक महत्वपूर्ण उसकी कहानी और प्रस्तुति होगी। अब सभी की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि फिल्म किस तरह दर्शकों के सामने आती है और क्या वह अपने कथानक से इस विवाद को शांत कर पाती है।